12 साल की उम्र में ही सुसाइड करना चाहती थीं आल‍िया की बहन

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महेश भट्ट इंडस्ट्री के बड़े नामों में से एक हैं। बतौर डायरेक्टर और प्रड्यूसर बॉलिवुड में उनको काफी सम्मान दिया जाता है। महेश भट्ट उन लोगों में से एक हैं जो हमेशा खुलकर अपने विचार सामने रखते हैं। इस बार भी उन्होंने अपने परिवार से जुड़ा एक ऐसा खुलासा किया कि इसे सुनकर सभी हैरान रह गए।
12 साल की उम्र में ही सुसाइड करना चाहती थीं आल‍िया की बहन
आप को ये बता फिल्म ‘द डार्क साइड ऑफ लाइफ : मुंबई सिटी’ की रिलीज के लिए तैयार हो गई है महेश भट्ट ने सोमवार को फिल्म के ट्रेलर लॉन्च पर इस गंभीर व‍िषय पर बात की.फिल्मकार महेश भट्ट का कहना है कि हमारे देश में मानसिक बीमारी के बारे में जागरुकता की कमी है इन्ही कुछ चर्चा पर बायत किया महेश भट्ट ने |

उन्होंने मीडिया से बात करते हुए आलिया की बड़ी बहन शाहीन भट्ट के बारे में भी बात की। और ये भी कहा की हमारे देश में मानसिक बीमार‍ियों को लेकर जागरुकता बहुत कम है. मैनें अपने घर में अपनी बेटी शाहीन के साथ ये सब होते देखा है. “

उन्होंने बताया कि उनकी बड़ी बेटी शाहीन छोटी उम्र में ही अवसाद का शिकार हो गई थी। यह इस स्तर तक बढ़ गया था कि उसने महज 12 साल की उम्र में सूइसाइड करने की कोशिश की थी |जब वो सुसाइड करना चाहती थी. इस बारे में शाहीन ने भी प‍िछले द‍िनों एक आर्ट‍िकल ल‍िखकर बताया कि कैसे वो 12-13 साल की उम्र के दौरान सुसाइड करना चाहती थी |

शाहीन ने अपने आर्टिकल में लिखा था, “मैंने एक से ज्यादा बार आत्महत्या की कोशिश की. मैं खुद को डरावने विचारों में डुबा चुकी थी. मेरे पास असहनीय और अंधकारमय भविष्य से बचने का यही जरिया था.” शाहीन ने ये भी लिखा की “मुझे चिंता है कि मेरी पहचान हमेशा मेरी बीमारी से जुड़ी रहेगी.और कुछ भी नहीं |

आप को ये भी जानकारी के लिए बता दे की इस बारे में अलिया ने एक इंटरव्यू कहा था, “शाहीन पिछले कुछ समय से अपने डिप्रेशन को लेकर फैमिली में खुली हैं और इसके लिए थैरपी सेशन भी अटेंड कर रही हैं. उन्होंने इन्सोम्निया डिसऑर्डर का भी शिकार हैं और उन्होंने कई रातें बिना सोए बिताई हैं |

आप को ये भी जानकरी के लिए बता दे बता दे की शाहीन 16 साल की हुईं तब तक उनका अवसाद और बढ़ गया। महेश भट्ट ने कहा कि अवसाद मानसिक बीमारी का एक रूप है और इसका इलाज किया जा सकता है। मधुमेह होने पर आपको इंसुलिन शॉट लेना पड़ता है, इसी तरह अवसाद से लड़ने के लिए भी इलाज उपलब्ध है। हालांकि, आज भी अवसाद को लेकर जागरुकता की बहुत कमी है।