छटपटाहट मुख्यमंत्रियों की

ज्ञानेन्द्र शर्मा

प्रसंगवश

स्तम्भ: कोई ऐसा बैरोमीटर नहीं है जो इसका आकलन पेश कर सके कि वर्तमान लाॅकडाउन से एक झटके में पूरी तरह छुटकारा पा लिया जाना ठीक होगा या फिर धीरे—धीरे उसको किनारे किया जाय, उससे नमस्कार की जाय। 25 मार्च के बाद से जबकि लाॅकडाउन लगाया गया था, उससे कई बार छेड़छाड़ की गई और अब जब अगले इतवार को उसकी म्याद पूरी हो रही है, उससे पहले उसमें कई तरह की ढीलें दी गई है। दफ्तर खोले गए, दुकानें खोली गईं और अब रेलेें फिर से चलाने का सिलसिला शुरू हो गया है।

ओड़ से छोड़ तक विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री अपना दर्द बता रहे हैं। भाजपा के मुख्यमंत्रियों के गले जरूर रुॅधे हुए थे परन्तु दूसरों ने सोमवार को प्रधानमंत्री से वीडियो बैठक के दौरान साफगोई में कोई कसर नहीं छोड़ी। ज्यादातार मुख्यमंत्री कह रहे थे कि केन्द्र दिल्ली से अपनी रीति-नीति न थोपे, हमें अपने निर्णय खुद करने दे।

ठीक भी है। हर राज्य की अपनी विशिष्ट समस्याएं हैं जिनसे जूझना और उनका हल निकालना उनकी लोकप्रियता का सीधे—सीधे मापन करेगा। फिर, उन्हें उस केन्द्र को आइना भी तो दिखाना है जो उनकी मदद करने में ‘दुआभाॅती’ करता है। विभिन्न गैर-भाजपाई मुख्यमंत्री केन्द्र से विभिन्न पैकेज मांगते रहे हैं, वित्तीय सहायता की दरकार करते रहे हैं। लेकिन उनका सीधा आरोप रहा है कि शक्ल देखकर केन्द्र उनके लिए अपनी थैली खोलता है।

विभिन्न राज्यों ने लाॅकडाउन के दौरान और उसके बाद के लिए अलग—अलग दिशानिर्देश अपने प्रशासनों को दे रखे हैं। इनके चलते यह भविष्यवाणी करना बहुत मुश्किल है कि लाॅकडाउन के पूरी तरह हटने के बाद उस पार की दुनिया कैसी होगी। पर एक मोटा अनुमान तो कर ही सकते हैं।

मसलन उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने पिछले महीने ही इस आशय के आदेश प्रसारित कर दिए थे कि अगली 30 जून तक, यानी लाॅकडाउन के बहुत बाद तक, सभी तरह की जनसभाओं पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा। बात सभी तरह की जनसभाओं की कही गई है तो जाहिर है कि इसका राजनीतिक व दूसरे ऐसे ही सरोकारों से सीधा सम्बंध होगा। पिछले कुछ दिनों में योगी सरकार ने पेट्रोल, डीजल के दाम बढ़ाए जिसका कि नरेन्द्र मोदी विपक्ष में रहते हुए कड़ा विरोध किया करते थे। फिर तमाम श्रमिक कानूनों में उद्योगपतियों के हितसाधक परिवर्तन लागू कर दिए गए है और जल्दी ही बिजली की दरों में बढोतरी भी संभव है।

अब जिस तरह के आदेश लागू हैं, उनके चलते 17 मई को लाॅकडाउन पूरी तरह हट जाने के बाद भी विरोध प्रदर्शन नहीं हो सकेंगे। राजनीतिक पार्टियाॅ और नेता इनका और दूसरे जलसों का आयोजन नहीं कर सकेंगे।

बहुत से दूसरे भाजपाई राज्य भी अपने यहाॅ श्रमिक कानून परिवर्तन लागू कर चुके हैं और वे उनके संभावित विरोध की इजाजत नहीं देंग-भाजपा से जुड़े हुए श्रमिक संगठनों को भी। बैंकों में छह महीने तक हड़ताल पर केन्द्र सरकार पहले ही रोक लगा चुकी है। कुछ और कल कारखानों में हड़तालें, आंदोलन रुक जाएंगे।

इस महीने की 17 तारीख को लाॅकडाउन हट जाने के बाद बाहर की दुनिया बहुत डरावनी होगी। जो संभव है, उस पर गौर करिए:

नौकरियाॅ कम हो जाएंगी और मजदूरी की दरें भी घट सकती हैं। वेतन में कटौतियाॅ हो सकती हैं। महंगाई भत्ते पहले ही कम कर दिए गए हैं और इस मामले में वरिष्ठ नागरिकों को भी नहीं बक्शा गया है। शैक्षिक कलेंडर पूरी तरह गड़बड़ हो सकता है जिसके चलते शैक्षिक योग्यताओं के पैरामीटर बदलने पड़ सकते हैं।

कोरोना के चलते चिकित्सा की दूसरी तमाम सुविधाओं पर भारी दवाब पड़ सकता है। अदालतों में मुकदमों की लम्बी लाइनें और भी लम्बी हो जाएंगीं। शादी-ब्याह के मामले में जाम लग जाएंगे, कई शादियॉ टूट भी सकती हैं। वरिष्ठ नागरिक और भी दवाब में होंगे। बैंक में जमा पैसे पर ब्याज पहले ही कम कर दिए गए हैं। रेलों में रियायती यात्रा कुछ समय के लिए मुल्तबी हो सकती है।

कई आवश्यक सेवाओं जैसे बिजली, मरम्मत, वॉटर फिल्टर के काम कुप्रभावित हो सकते हैं।
धार्मिक कार्यक्रम आयोजित करना और उनमें भाग लेना मुश्किल हो जाएगा। चार धाम की यात्रा में कई कठिनाइयाॅ आ सकती हैं और अयोध्या में मंदिर निर्माण का काम पिछड़ सकता है। तीर्थयात्राओं के अलावा पर्यटन यात्राएं भी विभिन्न मात्राओं में घटबढ़ सकती हैं।

देश में पहली बार एक साथ कई चुनाव रोक देने पड़ सकते हैं इनमें पहले से स्थगित चल रहे और आगे आने वाले राज्यसभा और विधान परिषद के द्विवार्षिक चुनाव के अलावा पंचायतों के चुनाव शामिल होंगे।

पंचायतों के अक्टूबर-नवम्बर में प्रस्तावित चुनाव नहीं हुए तो सरकार को ऐसे कई कानूनी परिवर्तन करने पड़ सकते हैं जिनके जरिए पंचायतों के तीनों स्तरों पर पहले से कार्यरत जनप्रतिनिधियों के कार्यकाल अभूतपूर्व स्तर पर बढ़ाने पड़ सकते हैं। इससे निचले स्तरों पर राजनीतिक परिदृश्य कई परिवर्तनों के साथ सामने उपस्थित हो जाएंगे।

वर्तमान में पदों पर काबिज लोग ज्यादा मौज कर सकते हैं और दूसरे प्रतीक्षारतों की प्रतीक्षा और लम्बी हो जाएगी। बहुत सारे परिवर्तनों, त्याग-परित्यागों के लिए लोगों को तैयार रहना पड़ सकता है और ऐसे में मुख्यमंत्रियों और उनके साथ ही दूसरे राजनीतिकों की छटपटाहट बढ़ जाना एकदम स्वाभाविक है।

और अंत में, कोरोना बहुत ही स्वाभिमानी और आत्मसम्मान से भरा हुआ वायरस है। वह तब तक आपके घर नहीं आएगा जब तक आप उसे लेने खुद बाहर नहीं निकलते।