गंदी नालियाँ सी बनती जा रही है, मुंबई की खूबसूरत नदियां!

डॉ.धीरज फुलमती सिंह

मुबंई: “तू गंगा की मौज,मै जमुना की धारा”…मीना कुमारी और भारत भूषण के अभिनय से सजी 1952 मे आई “बैजु बांवरा” शायद ही किसी के जेहन से ओझल हो? क्या आप विश्वास कर सकते हैं कि “बैजु बांवरा” फिल्म के इस गाने में दिखाई गई वह गंगा नदी हकीक़त में मुंबई की दहिसर नदी है।

आज भले ही लगभग 12 किलो मीटर लंबी यह दहिसर नदी एक गंदे बदबुदार नाले में तबदिल हो गई हो लेकिन तब इसका पानी बहुत साफ और स्वच्छ हुआ करता था। लोग इसके किनारे बंसी डाल कर मछलियां पकडा करते थे,ये सिर्फ पिकनिक स्थल ही नही थी,ये नदी कभी हजारों मछुआरों की रोजी-रोटी का साधन मुहैया करवाती थी।

इस नदी में कभी मगरमच्छ भी होते थे,इसका पानी पीने के काम आता था। 1957 मे दिलिप कुमार अभिनीत फिल्म नया दौर की शूटिंग भी इसी नदी के किनारे हुई थी। कभी इसके किनारे पर सैलानियों का मजमा जमा रहता था मगर आज तो इसकी गंदगी,बदबू और कीचड़ की वजह से पास से गुजरने पर भी लोग परहेज करते हैं।

भारत के दूसरे इलाकों मे रहने वालो की क्या कहूँ, अधिकांशतः खुद मुंबई वासियों को जानकारी नही है कि मुंबई की सीमा में चार नदियां बहती है। आज इन नदियों को जो भी देखता उन्हे ये गंदे कीचड़ से सने गटर ही नजर आती है। कई लोग जानते नही है तो कईयों को देखने के बाद विश्वास ही नही होता कि ये नदियाँ हैं। कभी मुंबई की गंगा का दर्जा पाई,मीठी नदी की वर्तमान स्थिति देखने, महसूस करने के बाद इसके नसीब पर रोना आता है।

कहने को तो पेपर पर यह आज भी नदी ही कहलाती है,जिसका उदगम स्थल संजय गाधी राष्ट्रीय उदयान में मौजूद कान्हेरी पहाडीयों के पास है। इसकी लंबाई लगभग 21 किलो मीटर है, जिसमे से 14 किलो मीटर यह मुंबई महानगर पालिका के इलाके में बहती है। मुंबई मे इसके किनारे सबसे ज्यादा मैंनग्रोव वन आच्छादित है,यह माहीम के पास अरब सागर में जाकर मिल जाती है। मुंबई में जल भंडार के पास मैनग्रोव के जंगल ही है जो भारी बारिश में मुंबई शहर को डूबने से बचाते हैं।

मुंबई के लिए ये मैंनग्रोव वन ईश्वर का वरदान ही है। जिस तरह से दिनों दिन अंधाधुंध अरब सागर को पाट कर मुंबई की बेशकीमती जमीन की सीमा समुद्र में फैल रही है,अगर ये मैंनग्रोव वन और चारों नदियाँ नही होती तो मुंबई शहर अरब सागर की लहरों में कब का समा जाता ? आज इनकी बदौलत ही मुंबई शहर बचा हुआ है, जिसका एहसास शायद ही किसी मुबईकर को है? मुंबई के नागरिकों को इनका एहसानमंद होना चाहिए।

मुंबई की सीमा में मीठी, दहिसर,पोईसर और ओशिवरा ये चार नदियां बहती है। कभी ये मुंबई की झीलो के लिए जल का मुख्य श्रोत हुआ करती थी। अपने अतीत के लिए बेचेन कभी ये नदियाँ सदानीरा रहती थी, जो आज गंदली और सूखने लगी है। रासायनिक उत्सर्जन ने इन्हे मैला कर दिया है। इनमें बारहों महीने कचरा और मलबा भरा रहता है। अब तो पानी की जगह इनमे कूडा, करकट, मल-मूत्र और कीचड़ प्रवाहित रहता है। दरअसल ज्यादातर मुंबई वासियों ने कभी इनको नदी की नजरों से देखा ही नही। मुंबई वासी कही इन नदियों को नाले के रूप में जानते हैं, तो कही इनको ओपन सीवर(गटर) के तौर पर पहचानते हैं।

आज का मुंबई शहर कुछ सदियों पहले तक सात टापुओ का एक खूबसूरत इलाका हुआ करता था। जो यहा के मुल निवासी कोळी (मछुआरों) समुदाय का वास था,ये अरब सागर में मछली पकड़ कर जिविकोपार्जन करते थे। इन कोळियों की कुल देवी मुंबा देवी है,जिन्हे ये मुंबा आई (माँ) पुकारते हैं। इन्ही मुंबा आई के नाम पर इस शहर का नामकरण मुंबई हुआ है।

इन टापुओ पर सबसे पहले पुर्तगाली आए, यातायात की कठिनाई और विकास की मधिम संभावना की वजह से इन्होने अपनी राजकुमारी की शादी मे बतौर दहेज़ इसे ब्रिटेन के राजकुमार को सौप दिया। एक तरह से देखा जाए तो उन्होंने विवाह के बहाने अपना बोझ उतार कर अंग्रेजों के सर पर रख दिया। दूरदर्शी अंग्रेजी हुकूम ने अरब सागर को कई जगहों से पाट कर इन सात टापुओ के समूह को आपस में जोडा और यहा कलकत्ता की तरह बंदरगाह विकसित किया! समुद्र के रास्ते मुंबई से ग्रेट ब्रिटेन जाना कलकत्ता के मुकाबले सुगम था। मुंबई से जहाजों की मदद से माल ढुलाई और आवागमन आसान और सस्ती थी। धीरे-धीरे अंग्रेजी ने मुंबई में ही अपना केद्र विकसित किया।

मुंबई महानगर के आधुनिक विकास का मूल आधार अंग्रेजों को जाता है। अंगरेजी हुकूमत ने भविष्य की योजनाओं को यहा अमलीजामा पहनाया,जिसकी वजह से आज मुंबई का विकास संभव हो पा रहा है। आज मुंबई में जगह-जगह उग आई बेतरतीब इमारतें और झोपड़ पट्टी मुंबई के विकास और बहाव को अवरुद्ध कर रही है। मुंबई में योजना बद्ध नियमों के तहत बनी ऐसी कम जगहे ही बची है, जहा से बरसात का पानी बेरोक-टोक समुद्र को सीधे मिल जाए।

26 जुलाई 2005 मे आई बाढ़ को कौन भूल सकता है भला ? उस बाढ को याद करके आज भी लोगों के मन मे सिहरन दौड़ जाती है, जब पुरी मुंबई जलमग्न हो गयी थी। चारों तरफ सिर्फ पानी ही पानी नज़र आ रहा था। कभी न रूकने वाली मुंबई दो दिन के लिए ठहर गई थी। शायद ईश्वर इसी बहाने मुंबई के लोगों को चेतावनी देना चाहता था? अपनी नदियों के प्रति बेपरवाह और लापरवाह मुबईकर इस बाढ के बाद काफी संजीदा हो गया था। इंसान स्वभाव से भूलक्कड होता है,कुछ समय बाद गैर जिम्मेदार मुंबईकर इस बाढ की विभिषिका को भूल गए।मुंबई महानगर पालिका ने उस दौरान इन नदियों मे जमा मिट्टी और कीचड़ निकालने का काम बडी तेज गति से योजनाबद्ध तरीके से शुरु तो किया था मगर फिर वही ढाक के तीन पात।

हर साल करोडों रुपये खर्च करके इन नदियों को साफ करने का बीड़ा उठाया जाता है परन्तु साफ-सफाई का यह काम काफी हद तक भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है। एक अनुमान के मुताबिक आज भी मेनग्रोव वनों में 8000 टन प्लास्टिक कचरा भरा हुआ है। कल्पना किजिए कि पूरी मुंबई में कचरे का क्या हाल होगा ? दूसरी तरफ विकास के नाम पर मुंबई भूमाफिया ने मैनग्रोव के जंगलों को तहस नहस कर दिया। जमीने हथिया ली और गगनचुम्बी इमारत खडी कर दी तो कही जमीन कब्जा कर बेतहाशा झोपड़ पट्टी बना ली गई है।

जो आप नही तो कल मुंबई की बारीश मे सबसे ज्यादा मुसीबत पैदा करने वाली है। भविष्य में मुंबई को बरबादी से बचाना है तो इन चारों नदियों को सबसे पहले बचाना होगा। नदी सिर्फ नदी नही होती है,संस्कृति का हिस्सा होती है।अपने मे इतिहास को समाहित रखती है। मुंबई की संस्कृती से यही ख़तरा मुकाबिल है। मुंबई की नदियों को अगर जिंदा रखना है,उद्धार करना है, तो गंगा की तरह एक भागीरथ की सख्त दरकार है।