रक्त प्लाज्मा थेरेपी की खोज, कोविड-19 का उपचार!

प्रशांत कुमार पुरुषोत्तम

नई दिल्ली: सर्वविदित है कि करोना काल का दौर विपत्ति का दौर है। यह तब और कठिन हो गया है जब इसका कोई उपयुक्त उपचार नहीं हो। जब से यह दौर आया तब से कई उपचार पद्धतियों और तकनीकों की चर्चाएँ सुनने को मिली। इसी क्रम में प्लाज्मा थेरेपी की चर्चा हुई।

हाल हीं में भारत के एक महत्त्वपूर्ण संस्थान ने कोविड-19 बीमारी से पीड़ित का उपचार करने के लिए एक साहसिक कदम उठाने की स्वीकृति पायी है। इस संस्थान का नाम श्री चित्रा तिरुनल इंस्टीट्यूट फॉर मेडिकल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी है। यह संस्थान विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी संस्थान विभाग, भारत सकार के अंतर्गत आता है। यह त्रिवेंद्रम(केरल) में स्थित है।

नवीन रक्त प्लाज्मा थेरेपी को तकनीकी रूप से कन्वलसेंट प्लाज्मा थेरेपी कहा जाता है। इस तकनीक में किसी पीड़ित व्यक्ति के उपचार के लिए ठीक हो चुके व्यक्ति द्वारा प्राप्त प्रतिरक्षक शक्ति का उपयोग किया जाता है।

हम जानते हैं कि मानव रक्त एक तरल संयोजी उत्तक है। रक्त में दो तरह के पदार्थ होते हैं। एक प्लाज्मा और दूसरा रूधिराणु। प्लाज्मा रक्त का अजीवित तरल भाग होता है। रक्त का लगभग साठ प्रतिशत भाग प्लाज्मा होता है। इसका नब्बे प्रतिशत भाग जल, सात प्रतिशत भाग प्रोटीन, 0.9 प्रतिशत लवण और 0.1 प्रतिशत ग्लूकोज होता है। अन्य पदार्थ होते हैं। प्लाज्मा का काम पचे हुए भोजन एवं हार्मोन को शरीर मे संवहन करना है।

जब एक रोगजनक (पैथोजन) को कोरोना विषाणु संक्रमगत करता है, तो शरीर की प्रतिरक्षक प्रणाली एंटीबॉडीज उत्पन्न करती है। ये एंटीबॉडीज आक्रमणकारी विषाणु की पहचान कर उसे चिह्नित कर लेते है। श्वेत रक्त कोशिका पहचाने गये विषाणु को संलग्न करती है। फलस्वरूप शरीर संक्रमण से मुक्त हो स्वस्थ हो जाता है।

किसी एण्टीजन की अनुपस्थिति में एक विपरीत प्रकार का प्रोटीन रक्त प्लाज्मा में पाया जाता है। इसी प्रोटीन को एण्टीबॉडी कहते हैं। एण्टीजन भी एक प्रकार काप्रोटीन होता है, जिसे ग्लाइकोप्रोटीन के नाम से जाना जाता है।एण्टीजन के कारण हीं मनुष्यों के रक्त में भिन्नता पायी जाती है।

जो व्यक्ति कोविड-19 से पीड़ित हो हो चुका है, उससे रक्त निकाला जाता है। विषाणु को निष्प्रभावित करने वाले एण्टीबॉडीज के लिए सीरम को अलग किया जाता है और परीक्षण किया जाता है। जब प्लाज्मा में सेफ्राबिनोजेन नामक प्रोटीन निकाल लिया जाता है,तो शेष प्लाज्मा को सीरम कहते हैं। कन्वलसेंट सीरम जो कि सी संक्रामक बीमारी से स्वस्थ हो चुके व्यक्ति से प्राप्त सीरम है और विशिष्ट रूप से उस रोगजनक (पैथोजेन) के लिए एंटीबॉडीज में समृद्ध है, को तब कोविड-19 के पीड़ित को दिया जाता है और इस तरह पीड़ित निषःक्रिय प्रतिरक्षण प्राप्त कर लेता है।

कन्वलसेंट

प्लाज्मा थेरेपी कुछ-कुछ ब्लड ट्रांसफ्यूजन के हीं जैसा होता है। स्वस्थ हो चुके व्यक्ति से एंटीबॉडी को इकट्ठा कर पीड़ीत व्यक्ति में डाल दिया जाता है। यह थेरेपी टीकाकरण से अलग होता है। टीकाकरण जीवनपर्यंत प्रतिरक्षण देता है। निष्क्रिय एंटीबॉडी थेरेपी में इसका प्रभाव तभी तक रहता है जब तक इंजेक्ट किये गये एंटीबॉडीज की धारा में रहते हैं। दी गयी यह सुरक्षा अस्थायी होती है।

इसकी खोज 1890 ई० में जर्मनी के फिजियोलॉजिस्ट इमिल वान वेहरिंग ने की थी। उन्होंने पाया किडिप्थिरिया से संक्रमित एक खरगोश से प्राप्त सीरम डिप्थिरीया संक्रमण को रोकने में सहायक सिद्ध होता है। इस उपलब्धि के लिए वेहरिंग को 1901ई० में सर्वप्रथम नोवेल पुरूस्कार दिया गया। उस समय एंटीबॉडीज ज्ञात नहीं थे।

2009 और 2010 में H1N1 इंफ्लूएंजा विषाणु महामारी के दौरान कन्वलसेंट सीरम का उपयोग उपचार के लिए किया गया था। इस प्रक्रिया का उपयोग 2018 में इबोला विषाणु महामारी के समय में भी किया गया था।

विशेषज्ञ का अनुसार, रक्त सीरम निकालने और पीडित को दिये जाने से पहले संभावित दानकर्त्ता का परीक्षण किया जाता है।प्रथम बात इसमें यहै कि स्वाब टेस्ट निगेटिव होना चाहिए। इसके बाद ठीक हो चुके व्यक्ति को दो सप्ताह तक इंतजार करना चाहिए। या संभावित दानकर्त्ता को कम से कम अट्ठाईस दिनों तक कोई लक्षण नहीं हुआ हो यह देखा जाना चाहिए। इनमें से दोनों अनिवार्य है। एंटीबॉडीज प्राप्तकर्त्ता में कम से कम तीन चार दिन बना रहता है। इस अवधि में पीड़ीत व्यक्ति ठीक हो जाता है।अमेरिका एवं चीन की अनुसंधानात्मक प्रतिवेदन के अनुसार, ट्रांसफ्यूजन के लाभ प्रथम तीन से चार दिनों में प्राप्त हो जाता है, बाद में नहीं।

यह नयी तकनीक है। इस तकनीक से उपचार के समक्ष कुछ चुनौतियाँ भी हैं।जीवित बचे हुए लोगों से उपयुक्त मात्रा में प्लाज्मा प्राप्त करना बड़ा कठिन कार्य है। कोविड-19 जैसी बीमारियों में प्रायः पीड़ीत बुजुर्ग हैं। कुछ ऐसे भी हैं जो हाइपरटेंशन, डायबिटिज और ऐसे हीं अनेक बीमारियों से ग्रसित हैं। यह संशय है कि स्वेच्छा से स्वस्थ हुए सभी व्यक्ति रक्तदान करेंगे।

फिर भी आशा की किरण तो दिखाई दे रहीं है। भविष्य में कोरोना रूपी अंधकार से निपटने में यह किरण भी कम नहीं है। जागरुकता, नवीन अनुसंधान, सहभागिता, समाजिक दूरी और स्वच्छता से काफी हद तक चुनौतियों का अंत किया जा सकता है।