अभी न जाओ छोड़कर

ज्ञानेन्द्र शर्मा

प्रसंगवश

स्तम्भ : सरकार ने एक साथ एक ही सांस में दो घोषणाएं की हैं। उसने कहा है कि वैसे तो अपने माहवारी कलेवर के साथ यह लाॅकडाउन 30 जून तक जारी रहेगा लेकिन बीच बीच में उसमें कई अर्धविराम लगते रहेंगे। सो वह रहेगा भी और नहीं भी रहेगा। सरकार यह भी कहती है कि उसका कड़ाई से पालन होगा पर साथ में यह भी कहती है कि वह प्यार तो करेगा लेकिन कई शर्तों के साथ। सख्ती होगी पर साथ में नरमी भी होगीं। कई शर्तें होंगी लेकिन तमाम बन्दिशों के साथ।

सरकार का दिल अभी भरा नहीं है- जो हालात हैं उनमें भर भी नहीं सकता। सो वे पुरानी बन्दिशें कि दूर दूर रहो, मिलो मगर फासले से, हाथ मिलाओ नहीं, धोतेे रहो, सैनिटाइजर जेब में रखो, सांस से सांस न मिलने दो, बेवजह बोलते नहीं रहो- मुंह बंद रखो वगैरह वगैरह।

दरअसल जो पांचवां लाॅकडाउन आया है, वह पूर्ण लाॅकडाउन भी है और अर्ध लाॅकडाउन भी है। वह लोहे के ताले भी बंदी भी है और अल्युमीनियम की कुंडी की जुंबिश भी। बात सीधी सी है कि सरकार का दिल अभी भरा नहीं है और भर भी नहीं सकता क्योंकि देश-प्रदेश के कई भागों में कोरोना माई अभी विलुप्त नहीं हुई हैं। महाराष्ट्र में तो उनकी रूप इतना विकराल है कि राज्य सरकार तक हिली-डुली पड़ी है।

अब नए नियमों के तहत भगवान को मन्दिरों में जाकर भोग लगाने का मौका अगले हफ्ते से भक्तों को मिल जाएगा। लेकिन धार्मिक और राजनीतिक सभाएं बंद रहेंगी और सिनेमाहाल भी। जो आदेश जारी हुए हैं, वे कई विरोधाभासों से भरे हैं। शापिंग माॅल और होटल तो खुल जाएंगे लेकिन सिनेमाहाल बंद रहेंगे।

रेलें चलेंगी बसें चलेंगी, रिक्शा-टेम्पो चलेंगे लेकिन मेट्रो नहीं चल सकेंगी। सरकारी दफ्तर 100 फीसदी खुलेंगे और चलेंगे लेकिन तीन पालियों में। इसके ज्यादा कुछ अर्थ नहीं होंगे सिवाय इसके कि हजरतगंज में ट्रैफिक जाम कम लगेंगे। सारे के सारे नियम खुद सरकार के निर्धारित नियमों को तोड़ने वाले साबित होने वाले हैं क्योंकि अब आज से जगह जगह जुटने वाली भीड़भाड़ दूरी बनाकर उठने बैठने की सारी कसरतों को बेकार कर देने वाली है। जो हाल रेलवे स्टेशनों और बस स्टैंडों पर हो रहा है, वही सरकारी कार्यालयों में होने लगे तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

अब तक जो लाॅकडाउन हुए हैं, उनमें सबसे लम्बी अवधि पहले लाॅकडाउन की रही थी जो 15 मार्च से 14 अप्रैल तक पूरे 21 दिन चला था और सबसे असरदार रहा था क्योंकि देश के लोगों ने पहली बार उसका स्वाद चखा था और उनके दिलोदिमाग पर महामारी का डर इतना समाया हुआ था कि उसने पूरी सख्ती से सरकार से कदम से कदम मिलाया था।

उसके बाद 19 दिन और फिर 14-14 दिन के तीन लाॅकडाउन और हुए। इन 68 दिनों में लोगों ने जीवन के निर्बंधित तोैर तरीकों के साथ रहना सीख लिया। जो सबसे दुखद पहलू ये लाॅकडाउन लेकर आए, वे सरकार ने ही पैदा किए थे। वह इस बात का कोई पूर्व आकलन नहीं कर सकी थी कि रेलें और परिवहन के दूसरे साधन बंद कर देने से उन लाखों प्रवासी मजदूरों का क्या होगा जो कल-कारखाने बंद हो जाने के बाद अपने गांवों की ओर तुरत फुरत रवानगी चाहते थे।

प्रधानमंत्री ने राष्ट्र को संबोधित किया और उसी दिन आधी रात से लाॅकडाउन लगाने की घोषणा कर दी, जो अनायास था, आश्चर्यजनक था और असमंजसों से भरा था। मजदूर भारी कष्ट में फंस गए और अंततः यही लाॅकडाउन की तैयारियों की सबसे बड़ी असफलता साबित हुई।

सरकार ने 30 जून तक तालेबंदी घोषित की है। पता नहीं पहले की चार तालेबंदियों से देश व प्रदेश के लोग कितने अनुशासित होकर निकलेंगे। कोरोना से निपटने के लिए उन्हें क्या क्या सीख मिली और अपने को बचाए रखने के लिए उन्होंने क्या क्या मंत्र कंठस्थ किए और उनको कैसे अपने जीवन में उतारा, यह पांचवां लाॅकडाउन जल्दी ही सबको बता देगा क्योंकि महामारी से सफलतापूर्वक निपटने में कहीं कहीं आशा की जो किरणें दिखी हैं, वे काल के प्रस्तर पर कितनी देदीप्यमान रह पाती हैं, इसकी परीक्षा लेने वाली दीवार पर टंगी घड़ी टिक टिक करने लग गई है।

अभी कई महत्वपूर्ण पड़ाव आगे आने वाले हैं। अब जो रियायतें दी गई हैं, सामान्य हाल बहाल करने के जो उपाय घोषित किए गए हैं और जीवन को अपनी रफ्तार पकड़ने के लिए उसकी पटरी जिस तरह से लौटाई गई है, वह और 8 जून से जो छूटें दी जाने वाली हैं, वे सब मिलकर इस परीक्षा को छमाही नहीं, सालाना रूप देंगी।

वे यह भी तय करेंगे कि इस पंचम तालेबंदी की कुंजी आमजन के हाथ में देने का फैसला कितना सही था। फिर यह नहीं भुलाया जा सकता कि अभी स्कूल-कालेज खुलने की बारी आनी है, सिनेमाहाल खुलने का नम्बर आने वाला है और फिर अंततः धार्मिक और राजनीतिक जलसों को हरी झण्डी दिखाई जानी बाकी है।

पनघट की डगर आसान नहीं है, महामारी के चेहरे को ढककर उसके पट बंद करने हैं और अपने चेहरे खोलने हैं, तमाम बंदिशों ने पैरों में जो बेड़ियां पहनाई हुई है, उन्हें अभी हटाया जाना है, अपने आपकी रौनक वापस लानी हैै, अज्ञात भयों से पिंड छुड़ाना है और सामाजिक दूरियां खत्म करनी हैं। अभी बहुत कुछ करना है। है ना?

और अंत में,  गुजर जाएगा, गुजर जाएगा, मुश्किल बहुत है
मगर गुजर जाएगा, आखिर वक्त ही तो है, गुजर जाएगा गुजर जाएगा…

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पूर्व सूचना आयुक्त हैं।)