लॉकडाउन पर दोहरी मार

ज्ञानेन्द्र शर्मा

प्रसंगवश

स्तम्भ : जिन लोगों ने यह मान रखा था कि लाॅकडाउन थोड़े समय का कैदखाना है, वे उसकी 90 प्रतिशत विदाई पर खुश जरूर हुए होंगे लेकिन जो लोग इस बात से जरा भी चिंतित होंगे कि कोरोना महामारी का असर बराबर बढ़ रहा है, उनके माथों पर चिंता की लकीरें तालेबंदी खुलने से मिटी नहीं होंगी। ज्यादार लाॅकडाउन विदा ले चुका है और बचे हुए थोड़े से का बड़का सा हिस्सा इस इतवार से अवकाश पर चला जाएगा और खानापूरी के लिए जो थोड़ा सा बचा रहेगा, उसकी अंतिम मियाद फिलहाल 30 जून रखी गई है।

पहली जून से जिस तरह से बंदिशें हटी हैं, बहुतों को नई आजादी जैसा महसूस हुआ है और कुछ थोड़े लोग जो आराम में बेहम मगन थे, थोड़े से डिस्टर्ब हुए। पहली जून से मिली सशर्त आजादी ने कुछ कुछ लोगों को उस आजादी का आभास दिया है जो उन्हें देश में इमरजेंसी खत्म होने के बाद मिली थी। 21 मार्च 1975 को देश को इंदिरा गाॅधी की इमरजेंसी से यह आजादी मिली थी। इसी संभावित आजादी के पूर्वाभास ने बहुतों को बेचैन भी किया था। लाखों मजदूर अपने अपने खेमे से भाग खड़े हुए थे और उन्होंने अत्यंत दर्दनाक माध्यमों से अपने घर-गाॅव की ओर पलायन किया था।

जैसी कि उम्मीद थी, यह बहस तुरंत ही छिड़ गई कि इस लाॅकडाउन के कोई मायने भी थे, इससे कुछ हासिल भी हुआ, इससे क्या देश में महामामारी से लड़ने से लेकर अर्थव्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त करने तक किसी मोर्चें पर कोई उल्लेखनीय सफलता मिली?

एक परिदृश्य तेजी से उभरा। एक राजीव और एक राहुल ने एक साथ तीर निशाने पर तान दिए। उद्योगपति राजीव बजाज और कांग्रेस नेता राहुल गाॅधी ने लगभग एक जैसे स्वर में कहा कि लाॅकडाउन कोरोना का तो कुछ बिगाड़ नहीं पाया लेकिन उसने अर्थव्यस्था जरूर तबाह कर दी है।

बजाज ऑटो के प्रबंध निदेशक राजीव बजाज ने इस बात पर आश्यर्च व्यक्त किया कि एशियाई देश होने के बादवूद भारत की सरकार ने जापान, सिंगापुर और कोरिया की तरफ देखने के बजाय अमेरिका की ओर देखना पसंद किया और इसके विपरीत परिणाम सामने आए।

कांग्रेस के प्लेटफार्म पर बजाज के साथ बोलते हुए राहुल गाॅधी ने कहा कि अब जबकि महामारी के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, लाॅकडाउन खोला जा रहा है, जो घोर अश्चर्यजनक है। बजाज ने अपनी साफगोई के बीच चिंता की एक लकीर उस समय खींची जब उन्होंने कहा कि उन्हें चेतावनी दी गई थी कि लाॅकडाउन पर इस तरह खुलकर बोलने ने उन्हें परेशानी हो सकती है।

लाॅकडाउन की ज्यादातर बंदिशें 30-31 मई को ही खत्म हो गई थीं जबकि कई प्रमुख अन्या अब इस इतवार को खत्म होने जा रही हैं। अब सवाल उठ रहा है कि दो महीने के करीब का लाॅकडाउन किसी काम आया या नहीं? वह जरूरी था या नहीं?

उसके आगे की कहानी कैसी होगी, यह गौर करने लायक बात होगी क्योंकि फिलहाल जो संकेत मिल रहे हैं, उनसे नहीं लगता कि लाॅकडाउन ने महामारी को प्रभावी चोट पहुॅचा पाई है।

आंकड़ें बताते हैं कि अकेले गुरुवार 4 जून को रिकार्ड संख्या में संक्रमण के 9651 नए रोगी देश भर में पाए गए। यह ठीक है कि संख्या में यह आनुपातिक वृद्धि मुख्य रूप से महाराष्ट्र में बढ़े मामलों की वजह से है तो भी पूरे देश के नक्शे में ज्यादा आंकड़ें भरे जाते हैं तो चैंकाने वाली तसवीर तो आखिर उभरकर सामने आती ही है। ऐसे में तालेबंदी हटाने के औचित्य पर सवाल उठने स्वाभाविक हैं और देर सबेर सरकार को किसी नई रणनीति पर मंथन करना पड़ेगा।

राजीव बजाज कहते जरूर हैं कि लेकिन हकीकत तो यह भी है कि अमेरिका में समान रूप से सभी राज्यों में लाॅकडाउन नहीं लगाया गया था। जहाॅ कहीं लगाया भी लगाया था, वहाॅ भी उसका लोगों ने पूरी तरह पालन नहीं किया था जबकि अपने यहाॅ इससे उल्टा था।

जापान, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया और कोरिया जैसे देश बिना लाॅकडाउन के भी ज्यादा सफल रहे। इसकी एक ही वजह हो सकती है और वह यह कि लाॅकडाउन के बजाय उन्होंने ज्यादा सहारा आधुनिक तकनीक का लिया। उनके व कुछ दूसरे देशों के पास हमसे बेहतर चिकित्सा साधन उपलब्ध थे जो महामारी से लड़ने में उनके बहुत काम आए और कहीं कहीं तो निर्णायक साबित हुए।

यह संभव है कि केन्द्रीय सरकार को लाॅकडाउन का और एक संशोधित संस्करण जल्दी लाना पडे़ क्योंकि सबका लक्ष्य तो आखिर एक ही है: कोरोना कोविड- 19 का ग्राफ नीचे को जाय और अर्थव्यवस्था का उपर की ओर।

और अंत में, लाॅकडाउन हट गया तो अब?
दोस्तों की महफिल सजे जमाना हो गया
लगता है खुल के जिए एक जमाना हो गया
मगर संभल के रहना मेरे दोस्त
निहायत महंगा मयखाना हो गया!!

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पूर्व सूचना आयुक्त हैं।)