स्मृति शेष: डीएनए फिंगर प्रिंटिंग के जनक है डॉ. लालजी सिंह

अजीत सिंह

साधारण से गांव में जन्मे डॉ. लालजी सिंह ने अपनी उपलब्धियों से अपना और अपने परिवार को ही नहीं बल्कि क्षेत्र, जनपद और देश को भी गौरवान्वित किया है। साँपों के डीएनए शोध से शुरू हुआ सफर मानव के उपर तक आकर रुका, जिसके कारण विभिन्न बीमारियों के इलाज में भी मदद मिली।

भारत के महान वैज्ञानिक एवं डीएनए फ्रिंगर प्रिंट के जनक डॉ. लालजी सिंह का जन्म आज के ही दिन 5 जुलाई 1947 को जनपद जौँनपुर के कलवारी गांव में सूर्य नारायण सिंह के घर पर हुआ था। डॉ. लालजी की प्रारंभिक शिक्षा गांव से हुई फिर उन्होंने बीएचयू (बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय) से बीएससी, एमएससी और पीएचडी किया इसके बाद शोध करने के लिए लंदन गये।

डीएनए पर डॉ. लालजी के शोध और उपलब्धियों को देखते हुए उन्हें हैदराबाद स्थित सीसीएमबी( सेंटर फॉर सेलुलर एंड मॉलिक्युलर बायलॉजी) का डाइरेक्टर बनाया गया। भारत सरकार ने भी डॉ. लालजी को पद्मश्री सम्मान से नवाजा और वह बीएचयू के कुलपति भी बने। साधारण से गांव में जन्मे डॉ. लालजी सिंह ने अपनी उपलब्धियों से अपना और अपने परिवार को ही नहीं बल्कि क्षेत्र, जनपद और देश को भी गौरवान्वित किया है। साँपों के डीएनए शोध से शुरू हुआ सफर मानव के उपर तक आकर रुका, जिसके कारण विभिन्न बीमारियों के इलाज में भी मदद मिली।

क्रिमिनल केस में डीएनए जांच की सहायता से कानून के बड़े-बड़े निर्णय हुए, भारत में डीएनए (डीऑक्सीराइबोज न्यूक्लिक अम्ल) की तकनीक नई होने के कारण स्वयं डॉ. साहब को न्यायालय में घंटों खड़ा होना पड़ता था। राजीव गांधी हत्याकांड, नैना साहनी मर्डर, बेअंत सिंह हत्या, मधुमिता हत्याकांड की गुत्थी सुलझाने में डॉ. लालजी और उनकी तकनीक की अहम भूमिका थी।

बाद में डॉ. साहब बीएचयू के कुलपति (वीसी) भी बने जिसने उन्हें छात्र से वैज्ञानिक बनाया, अपने पूरे कार्यकाल में वेतन के रूप में एक रुपया लेते थे वो भी इसलिए कि मदन मोहन मालवीय की शर्त थी कि कोई बिना वेतन के बीएचयू में कार्य नहीं करेगा।

बीएचयू के वीसी रहते एक बार उन्होंने देखा कि बच्चे लाइट के चलते रात में लैंप पोस्ट के नीचे पढ़ रहे हैं, तो उन्होंने 24 घंटे खुलने वाली साइबर लाइब्रेरी की स्थापना करा दी। डॉ. लालजी जब तक ​जीवित रहे तब तक उनके मन में अपने जन्म स्थान का प्रेम बना रहा। गांव कलवारी में बड़े-बड़े चिकित्सक आते रहे और लोगों का निःशुल्क इलाज होता रहा। कलवारी में उन्होंने जीनोम फाउंडेशन की स्थापना की।

हम लोगों को गर्व है कि हम लोग उनके गांव और घर परिवार के है और उनकी उपलब्धियों को नजदीक से देखा और महसूस किया है लेकिन मुझे लगता है हम लोग उस महान आत्मा का सच्चा अनुकरण नहीं कर पा रहे हैं, हम लोग दबंग देख कर दबंग हुए, डॉ. इंजीनियर, देख कर वो बने, अधिकारी देख कर अधिकारी बने लेकिन कोई भी युवक डॉ. लालजी बनने का प्रयास नहीं कर रहा है, हो सकता है रास्ता कठिन हो लेकिन उस महान वैज्ञानिक की सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी जब कोई नई पीढ़ी का बालक उन्ही की राह पर चलकर अपने को यह सिद्ध कर देगा कि यह भी उसी जगह से है जहाँ डॉ. लालजी का जन्म हुआ था।

जौँनपुर जनपद भी डॉ. साहब के नाम को भूला रहा है, सरकार और प्रशासन को समझना चाहिए ऐसे लोग समाज के ध्रुव आलोक हैं, जैसे ध्रुव तारा को देखकर दिशा का ज्ञान होता है वैसे इनके नाम को जानकर इनके जैसे बनने की प्रेरणा मिलती है।

हम लोग तो ज्यादा मांग नहीं सकते कम से कम जिला प्रशासन से यह अनुरोध है कि सिकरारा से बरईपार मार्ग को ही डॉ. लालजी मार्ग ही घोषित कर दिया जाए। इसी मार्ग पर उनका घर भी है और इसी रास्ते पर चलकर उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की है। हो सकता है कोई दूसरा बालक रास्ते का नाम ही पढ़—पढ़ के दूसरा लालजी बनने के रास्ते पर चल पड़े।

नमन डॉ. लालजी सिंह को और भगवान का धन्यवाद की आपको हम लोगों की जन्मभूमि का चमकीला सितारा बनाया, आप नई पीढ़ी के मार्गदर्शक बने रहे इस कामना के साथ कि पुनः कोई लालजी हम लोगो को मिलेगा।

(लेखक उ.प्र. राजकीय सेवा में राजपत्रित अधिकारी हैं।)