पर्यावरण परिवर्तन का जैव विविधता पर असर: प्रो.भरत राज सिंह

वरिष्ठ पर्यावरणविद प्रो. भरत राज

विश्व पर्यावरण दिवस-2020 पर विशेष

(उमेश यादव/राम सरन मौर्या): प्रतिवर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है।पर्यावरण के विषय में व्यापक चर्चाएं होती है।पृथ्वी के वातावरण को स्वच्छ रखने के लिये पौध रोपड़,कार्बन पर रोक सहित तमाम मुद्दों पर नीतियां बनती है।वातावरण की स्वच्छता स्वस्थ जीवन के लिये कितनी महत्त्वपूर्ण है इस विषय पर चर्चा की अहम जरूरत है।

हम जानते हैं की पृथ्वी पर जीवन की विविधता और परिवर्तनशीलता है।जैव विविधता आम तौर पर आनुवंशिक, प्रजातियों और पारिस्थितिकी तंत्र के स्तर पर भिन्नता का एक अंश है।स्थलीय जैव विविधता आमतौर पर भूमध्य रेखा के पास अधिक होती है, जो गर्म जलवायु और उच्च प्राथमिक उत्पादकता का परिणाम है। जैव विविधता पृथ्वी पर समान रूप से वितरित नहीं की जाती है, और उष्णकटिबंधीय में सबसे समृद्धरूप में पाई जाती है।

ये उष्णकटिबंधीय वन पारिस्थितिकी तंत्र, पृथ्वी की सतह के 10 प्रतिशत से कम को आक्षादित करते हैं, और जिस पर दुनिया की प्रजातियों में लगभग 90 प्रतिशत शामिल हैं। समुद्री जैव विविधता आमतौर पर पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में तटों पर सबसे अधिक होती है, जहां समुद्र की सतह का तापमान सबसे अधिक होता है, और सभी महासागरों में मध्य अक्षांशीय बैंड में। प्रजातियों की विविधता में अक्षांशीय ढाल हैं। जैव विविधता आम तौर पर हॉटस्पॉट में क्लस्टर करती है, और समय के माध्यम से बढ़ रही है, लेकिन भविष्य में धीमा होने की संभावना होगी।

वरिष्ठ पर्यावरणविद एवं स्कूल आफ मैनेजमेंट साइंसेज (एसएमएस) के महानिदेशक प्रो. भरत राज सिंह बताते है कि जैव विविधता को केवल जीनों, प्रजातियों या आवासों के कुल योग के रूप में परिभाषित नहीं किया जा सकता है, उनके अंतरों की विविधता के उपाय के रूप में भी समझा जाना चाहिए। जीवविज्ञानी अक्सर जैव विविधता को “एक क्षेत्र की जीन, प्रजातियों और पारिस्थितिक तंत्र की समग्रता” के रूप में परिभाषित करते हैं। इस परिभाषा का एक फायदा यह है कि यह अधिकांश परिस्थितियों का वर्णन करने लगता है और पहले से पहचाने जाने वाले जैविक प्रकार के पारंपरिक प्रकारों का एक एकीकृत दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है:

  • प्रजातीय विविधता
  • पारिस्थितिक विविधता
  • आनुवंशिक विविधता और आणविक विविधता
  • कार्यात्मक विविधता – एक आबादी के भीतर विषम प्रजातियों का एक उपाय (जैसे कि विभिन्न उत्पन्न तंत्र, विभिन्न गतिशीलता, शिकारी बनाम शिकार, आदि)।

प्रो. भरत राज सिंह कहते हैं कि पर्यावरण में तेजी से हो रहे परिवर्तन के कारण, मुख्यत कई प्रजातियाँ बड़े पैमाने पर विलुप्त रही है। कभी पृथ्वी रहने वाली पाँच अरब से अधिक प्रजातियों की संख्या में से अधिकांश प्रजातियों के विलुप्त होने का अनुमान लगाया जा रहा है। पृथ्वी की वर्तमान प्रजातियों की संख्या पर अनुमान 10 मिलियन से 14 मिलियन तक है, जिनमें से लगभग 1.2 मिलियन का अभी तक आकड़ा तैयार किया गया है और 86 प्रतिशत से अधिक का अभी तक वर्णित नहीं किया गया है।

विश्व के वैज्ञानिकों ने मई 2016 में, इसका आकलन पुनः आकलन किया है कि पृथ्वी पर 1 ट्रिलियन प्रजातियों का अनुमान है परन्तु वर्तमान में केवल एक-हजार में से एक प्रतिशत को ही वर्णित किया गया है। पृथ्वी पर संबंधित डीएनए बेस जोड़े की कुल मात्रा 5.0 x 1037 है और इसका वजन 50 बिलियन टन है। इसकी तुलना में, जीवमंडल के कुल द्रव्यमान का अनुमान 4 टीटीसी (ट्रिलियन टन कार्बन) जितना है। जुलाई 2016 में, वैज्ञानिकों ने पृथ्वी पर रहने वाले सभी जीवों के लास्ट यूनिवर्सल कॉमन एनस्टर (LUCA) से 355 जीन के एक सेट की पहचान करने की सूचना दी।

डब्ल्यूएचओ द्वारा जारी किए गए डेटा ने 2016 में पीएम-2.5 के स्तर के मामले में दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित लोगों की सूची में शामिल 14 भारतीय शहरों में दिल्ली और वाराणसी को दिखाया। वैश्विक स्वास्थ्य निकाय ने यह भी कहा कि दुनिया में 10 में से नौ लोग सांस लेने वाली वायु जिसमें उच्च स्तर के प्रदूषक होते हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड देश के 300 शहरों के लिए वायु गुणवत्ता डेटा की निगरानी करते हैं।

यह आश्चर्यजनक है कि डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट में केवल 32 शहरों का ही डेटा है। डेटा ने यह भी बताया कि 80 प्रतिशत से अधिक शहरों में सीपीसीबी द्वारा स्थापित राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों (एनएएक्यूएस) से परे प्रदूषण का स्तर था, जो डब्ल्यूएचओ द्वारा वर्णित स्तर से भी बदतर है। नियंत्रण बोर्ड ने यह भी कहा कि पर्यावरण मंत्रालय ने राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के तहत 100 गैर-प्राप्ति शहरों की पहचान की है। हालांकि, एनसीएपी डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट में सबसे अधिक प्रदूषित शहरों में से तीन को दर्शाता है – गया, पटना और मुजफ्फरपुर । वास्तव में भारत की स्थिति बहुत खराब है। अतः सभी शहरों में राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानकों के अनुपालन के लिए एक मजबूत कानून की आवश्यकता है। यह भी देखा गया कि भारतवर्ष में सीएनजी के लिए वाहनों के रूपांतरण के बाद भी वाहनों के प्रदूषण का एक बड़ा योगदान है, फिर भी उत्सर्जन नियंत्रण में नहीं है।

राज्य सरकारों को भी जागना होगा:

प्रो. भरत राज सिंह का कहना है कि भारत को उद्योगों और घरों में बड़े पैमाने पर ऊर्जा संक्रमण, सार्वजनिक परिवहन के लिए गतिशीलता संक्रमण, चलने और साइकिल चलाने की आवश्यकता है, और इस अपशिष्ट प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी कचरा प्रबंधन आवश्यक है।

डब्ल्यूएचओ का अनुमान है कि प्रदूषित हवा के संपर्क में आने से हर साल लगभग 7 मिलियन लोग मरते हैं, जिसमें आधे के लगभग मृत्यु अर्थात 1.2 भारतवर्ष तथा 1.7 चीन की ही सामिल है । 2016 में अकेले परिवेशी वायु प्रदूषण के कारण लगभग 4.2 मिलियन लोगों की मृत्यु हुई, जबकि प्रदूषणकारी ईंधन और प्रौद्योगिकियों के साथ खाना पकाने से घरेलू वायु प्रदूषण के कारण इसी अवधि में अनुमानित रूप से 3.8 मिलियन लोगों की मृत्यु हुई।

प्रो. भरत राज सिंह कहते है कि आज जब कोरोना संक्रमण महामारी विगत दिसम्बर 2019 से चीन से प्रारम्भ होकर विश्व के 180 देशों से अधिक को प्रभावित कर चुके है। भारत में 75 दिनों के लाक-डाउन के पश्चात भी संक्रमण की गति बढ रही है। विश्व में लगभग 70 लाख लोग संक्रमित है और 4 लाख लोगो की मृत्यु हो चुकी है।

अतः आज हमें इस विश्व पर्यावरण दिवस-2020 पर सोचने के लिए बाध्य होना पड़ रहा है कि यदि हम पर्यावरण को संरक्षित करने के लिए प्रभावी व त्वरित कार्यवाही नहीं करते है, तो आनेवाले समय में कोरोना वायरस जैसी संक्रमण की महामारी से निरंतर मानवता के लिए खतरा बना रहेगा और आनेवाली शताब्दी का प्रारम्भ हमारी पीढ़ी के लिए श्रृष्टि एक सपना न बन कर रह जाये। कोरोना संक्रमण की महामारी में लॉक डाउन लागू करने से एक तरफ जहा पर्यावरण में हुए अप्रत्यासित सुधार ने नई सोच को जन्म दिया है; वहीं दूसरी तरफ हमें जैवाविविधिता को बरकरार रखने के लिए भी प्रेरित किया है।

आइये हम सब मिलकर इस पर कार्य करें। सड़कों ,पार्को व घर के सामने पौध रोपित करें और कम से कम वाहनों का उपयोग कर तथा अक्षय ऊर्जा से चलने वाले वाहनों, यंत्रो का उपयोग और अक्षय ऊर्जा से विद्युत उत्पादन कर अपनी आवश्यकता को पूर्ण करे।यही विश्व पर्यावरण दिवस को मनाने का व मानवता की रक्षा हेतु एक सच्चे सिपाही बनने का मौका है।