अपने को दोहराता राजस्थान का इतिहास

ज्ञानेन्द्र शर्मा

प्रसंगवश

स्तम्भ: अस्सी साल के कलराज मिश्रा उत्तर प्रदेश में बनीं सभी भाजपा सरकारों में आम तौर पर नम्बर दो की हैसियत रखते रहे हैं। लेकिन नम्बर एक कभी नहीं हो पाए। दो बार मौके आए लेकिन कुंडली फिट नहीं बैठी। 2012 के विधानसभा चुनाव में वे मुख्यमंत्री के पद के दावेदार नजर आ रहे थे लेकिन भाजपा चुनाव ही हार गई।

इससे पहले 1999 में भी उनका नम्बर आता दिखा लेकिन ऐन मौके पर अटल ने रामप्रकाश गुप्ता के नाम पर उंगली रख दी। अब सीधे-सीधे न सही, राजस्थान में तो वे परोक्ष रूप से नम्बर वन बन सकते हैं और यह संभावना इसलिए भी है कि वहां की रेगिस्तानी राजनीति राष्ट्पति शासन की ओर बढ़ती दिख रही है।

कलराज मिश्रा जितना नाच नचा सकते थे, अशोक गेहलोत की मार्फत कांग्रेस को नचा चुके हैं। आखिर राज्यपाल की कुर्सियों का खेल वे अपने राज्य उत्तर प्रदेश में भाजपा के बड़े नेता के बतौर कई बार देख चुके हैं। कई राज्यपालों की करतूतें राज भवन से बाहर रहकर देखने और उनका प्रतिरोध करते रहने वाले कलराज जी को अब पॉसा पलटने का मौका मिल सकता है।

कौन भूल सकता है 1998 का वो मंजर जब कांग्रेसी राज्यपाल रोमेश भंडारी ने कल्याण सिंह सरकार को उस समय बर्खास्त कर दिया था जब बाकी कांग्रेसियों ने उनकी सरकार को समर्थन देना बंद कर दिया था। यही नहीं भंडारी जी ने बागियों के नेता जगदम्बिका पाल को रातोंरात मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी थी हालॉकि उच्च न्यायालय के बीच में आ जाने के बाद उन्हें उक्त पद का सुख नसीब नहीं हो पाया था।

जब कल्याण सिंह को बर्खास्त किया गया तो अटल जी धरने पर बैठे थे और उनके साथ कलराज मिश्रा भी थे। वे भी भंडारी जी के फैसले का विरोध कर रहे थे। यहॉ उन्हें एक अदद राज्यपाल की हरकतें नजदीक से देखना का मौका मिला था।

ऐसा ही कुछ हुआ था राजस्थान में भी सन् 1967 में। जब कांग्रेसी राज्यपाल डा0 सम्पूर्णानंद ने विपक्ष के दावों को ठुकराते हुए अल्पमत में होने के बाद भी कांग्रेस की सरकार बनवा दी। भारी विरोध हुआ और राजभवन के सामने 5 मार्च 1967 को बड़ा प्रदर्शन हुआ। लेकिन राज्यपाल ने इस सबकी अनदेखी कर दी और विधानसभा को निलम्बित करते हुए राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया। अब वही आसार फिर से राजस्थान में बन रहे हैं।

मुख्यमंत्री अशोक गेहलोत ने 31 जुलाई से विधानसभा का सत्र बुलाने की मॉग की और उनके मंत्रिमण्डल ने इस आशय की सिफारिश भी राज्यपाल से विधिवत की लेकिन राज्यपाल कलराज मिश्रा इस बात पर अड़ गए कि विधानसभा सत्र बुलाने के लिए 21 दिन का नोटिस चाहिए होता है।

मुख्यमंत्री अशोक गेहलोत

उन्होंने मुख्यमंत्री की मॉग के संदर्भ में तीन बिन्दु उठाए:- 21 दिन का नोटिस हो, विश्वास मत आए तो उसका सीधा प्रसारण हो और कि सदन में बैठने की व्यवस्था कोरोना सम्बंधी हिदायतों के अनुरूप हो। राज्यपाल की सारी शर्तों या अनुशंसाओं को तमाम कानूनी विशेष उनके संवैधानिक औचित्य और कानूनी पहलुओं की दृष्टि से पूरी तरह अनुचित मान रहे हैं।

सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने 2016 में नबम रबिया व बरनांग फिलिक्स बनाम विधानसभा उपाध्यक्ष मामले में साफतौर पर व्यवस्था दी थी कि सदन/ विधानसभा का सत्र बुलाने की शक्ति केवल राज्यपाल में निहित नहीं है। कानूनी विशेषज्ञ कहते हैं कि राज्यपाल संविधान के अनुच्छेद 174 और 163 के तहत मंत्रिमण्डल की सिफारिशों को मानने को बाध्य हैं, इसलिए सदन की बैठक बुलाने की जो सिफारिश की गई है, उसे वे ठुकरा नहीं सकते। लेकिन राज्यपाल अड़े हुए हैं।

सदन की बैठक के लिए 21 दिन की नोटिस की अनिवार्यता का विभिन्न विधानसभाओं की प्रक्रिया सम्बंधी नियमावलि में उल्लेख नहीं है। खुद राजस्थान में थोड़े से समय के नोटिस पर विधानसभा सत्र बुलाए जा चुके हैं। राज्यपाल को विशेषज्ञ यह भी स्मरण करा रहे हैं कि खुद उनके राज्य उत्तर प्रदेश में कई बार विधानसभा के सत्र मंत्रिमण्डल के सात से दस दिन के नोटिस तक पर बुलाए जा चुके हैं और राजभवन से इस पर कभी कोई आपत्ति नहीं की गई है।

विभिन्न विधानसभाओं की प्रक्रिया नियमावली यह कहती है कि सत्र आहूत करने की नोटिस सदन के सदस्यों को 14 दिन पूर्व भेजी जाएगी लेकिन यह हर परिस्थिति में अनिवार्य नहीं है। उत्तर प्रदेश की नियमावली की धारा 3/2/ कहती है कि यदि सदन का सत्र अल्पावधि की नोटिस पर बुलाया जाता है या कि इमरजेंसी हालात में बुलाया जाता है तो 14 दिन की नोटिस भेजे जाने की जरूरत नहीं होगी। यही नियम खुद राजस्थान की नियमावली में है।

फिर, सदन के अध्यक्ष को सदन के संचालन के बारे में असीम अधिकार प्राप्त हैं। वे यह अधिकार रखते हैं और इसमें सक्षम भी हैं कि विधानसभा की कार्यवाही का सजीव प्रसारण होना चाहिए या नहीं। आम तो पर विभिन्न विधानसभाओं और संसद की कार्यवाहियों का अध्यक्ष के निर्देष पर पहले से ही सजीव प्रसारण हो रहा है।

विधानसभा में सदस्यों के बैठने के क्रम व उससे जुड़े मसलों पर अध्यक्ष को पहले से ही अधिकार प्राप्त हैं। सामान्यत: ये अधिकार राज्यपाल अपने पास नहीं ले सकते। ऐसा न कोई नियम है और न ही कोई परम्परा। पर लगता है कि राजस्थान में जो खेल खेला जा रहा है, वह कानूनों व नियमों से परे है और निगाहें कहीं और केन्द्रित हैं।

और अंत में, पत्नी पति से: देखो जी करोना से डरना नहीं, लडऩा है और पत्नी से लडऩा नहीं, डरना है क्योंकि दोनों की ही अभी वैक्सीन नहीं बनी है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पूर्व सूचना आयुक्त हैं।)