पहला पितृपक्ष श्राद्ध आज, पितरों के लिए किया गया कर्म ही ‘श्राद्ध’ है

पहला पितृपक्ष श्राद्ध आज, पितरों के लिए किया गया कर्म ही ‘श्राद्ध’ है

लखनऊ: भाग-दौड़ भरी जिंदगी में अक्सर कुछ ‘चीजें’ पीछे छूट जाती हैं तो कुछ विशेष मौकों को याद रखना हम भूल जाते हैं, जबकि सामाजिक और धार्मिक प्राणी होने के नाते ऐसी बातों और चीजों को हमेशा याद रखना चाहिए।

अक्सर देखा जाता है कि आप अपने प्रिय मित्र या रिश्तेदार को या फिर घर वालों को उनके जन्मदिन-शादी की वर्षगांठ आदि मौकों पर बधाई नहीं देते हैं तो लोग नाराज हो जाते हैं, लेकिन वह ‘लोग’ क्या करें जिनकी वजह से आप जिंदगी में कई ‘मुकाम’ तो हासिल करते हैं,परंतु उनको याद नहीं रखते हैं।

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बात हमारे पूर्वजों की हो रही है,जो भले आज इस दुनिया में नहीं हो,लेकिन उनके ऋण से कभी मुक्त नहीं हो सकते हैं। ऐसे महान पूर्वजों को हम भले भूल जाएं,लेकिन हमारे धर्म की खूबी है कि वह हमें पूर्वजों के ऋण से मुक्त नहीं होने देता है। इसी लिए धार्मिक तौर तरीकों से श्रद्धा पक्ष में अपने पूर्वजों को याद करके उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं। एक तरह से श्राद्ध पक्ष पूर्वजों के प्रति सच्ची श्रद्धा का प्रतीक हैं। पितरों के निमित्त विधिपूर्वक जो कर्म श्रद्धा से किया जाता है, उसे ही ‘श्राद्ध’ कहते हैं।

आज से शुरू हो गया श्राद्ध

अबकी बार दो सितंबर से श्राद्ध शुरू हो रहे हैं। हिन्दू धर्म के अनुसार,प्रत्येक शुभ कार्य के प्रारम्भ में माता-पिता, पूर्वजों को नमस्कार या प्रणाम करना हमारा कर्तव्य है। हमारे पूर्वजों की वंश परम्परा के कारण ही हम आज यह जीवन देख रहे हैं, इस जीवन का आनंद प्राप्त कर रहे हैं। इस धर्म में, ऋषियों ने वर्ष में एक पक्ष को पितृपक्ष का नाम दिया, जिस पक्ष में हम अपने पितरेश्वरों का श्राद्ध, तर्पण, मुक्ति हेतु विशेष क्रिया संपन्न कर उन्हें अध्र्य समर्पित करते हैं।

इस दौरान कोई अन्य शुभ कार्य या नया कार्य अथवा पूजा-पाठ अनुष्ठान सम्बन्धी नया काम नहीं किया जाता। शास्त्रों में कहा गया है कि श्राद्ध स्थल चतुर्दिक से आवृत, पवित्र एवं दक्षिण की ओर ढालू होना चाहिए। बहरहाल,अबकी से दो दिन 01 और 02 सितम्बर की पूर्णिमा है। इस लिए श्राद्ध की शुरूआत भी कहीं आज से तो कई जगह कल से शुरू होना बताया जा रहा है।