तौबा-तौबा,गाँव की राजनीति से ईश्वर बचाये!

डॉ.धीरज फुलमती सिंह

मुबंई: उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में स्थित चुरियां मेरा पुस्तैनी गांव है। मेरा जन्म तो यहां मुंबई में हुआ है लेकिन मुझे अपना गाँव बहुत अच्छा लगता है। उसकी खुबसूरती के क्या कहने लाजवाब है। गांव जाने का सबसे बड़ा कारण है कि मैं वहा अपने नाम से नहीं, बल्कि अपने पिताजी के नाम से जाना जाता हूँ, जो कि मेरी असली पहचान है। वैसे तो मेरे गाँव के लोगों का स्वभाव बहुत मोहक, मिलनसार और सहयोगात्मक है। साफ दिल के लोग हैं।

कहते हैं, गांव की राजनीति सबसे छिछले स्तर की होती है, ऐसी राजनीति से ईश्वर बचाये! इसका अनुभव मुझे सबसे पहले तीन साल पहले 2017 में हुआ था। नवंबर का महीना था, ठंड अभी शुरू ही हुई थी। मैं मुंबई में था, मैंने सोचा कि इस साल अपने गांव में गरीब परिवारों में रजाई और कंबल बंटवाया जाए। होल सेल में बढ़िया कंबल उस वक्त 180/- रूपये और रजाई लगभग 675/- रूपये में पड़ रही थी। अपनी संस्था फुलमती फाउंडेशन की ओर से मैंने लगभग तीन लाख रुपयों का इंतजाम भी कर लिया था।

हमारे गाँव में छात्र नेता है, विनय सिंह, बहुत होनहार युवा है। विश्व विद्यालय में महामंत्री भी रह चुका है। बहुत आगे जाएगा, उसका भविष्य बहुत उज्जवल है। बड़ों का बहुत सम्मान करता है। विनय सिंह, विशु सिंह और चंदन सिह हमारे गाँव में अच्छी राजनीति का भविष्य है। विनय को कह कर मैंने सारी तैयारियां करवा ली थी।

अचानक एक दिन मुझे अपने गांव के प्रधान जी के छोटे भाई का फोन आता है कि “आपने छत्तीसगढ़ से सात हजार रूपये का लोन लिया है और उसे चुकाया नही है?” वे हमेशा बड़ी शालीनता और प्यार से बात करते हैं। मैंने उनसे पूछा कि आपको किसने कहा ? उन्होंने बताया कि अभी बैंक वाले का हमको फोन आया था कि उसमें मुखिया जी ने गाॅरंटी दी है इसलिए हमने आपको फोन किया।”

मैंने मुखिया जी की बात पर कहा कि आप मेरे साथ कभी छत्तीसगढ गये हैं? बैंक में जाकर किसी पेपर पर साईन किया है? तो उन्होंने ना में उत्तर दिया। तब मैंने पूछा कि फिर आप गॉरंटी कैसे दे दिये? सात हजार का लोन हो या सात लाख का, मुंह जुबानी गॉरंटी तो कही चलती नहीं है।
मैंने उनका फोन रखा ही था कि मेरे घर से फोन आ गया, “चाचीजी पूछ रही थी कि किसी बैंक से फोन आया था कि धीरज सात हजार का लोन लिये है और चुका नहीं रहे हैं।

अब मेरा माथा ठनकना लाजमी था, ” मैने उनको समझाया” अरे चाची मैं यहा मुंबई में रहता हूँ और सात हजार रूपये का लोन लेने छत्तीसगढ़ क्यों जाऊंगा? मेरी माली हालत इतनी भी बुरी नहीं है कि मैं सात हजार का लोन लूंगा? अरे बैंक से सात हजार का भी लोन कोई लेता है भला? छत्तीसगढ़ जाने आने में ही मेरा कम से कम दस हजार रूपये खर्च हो जाएगा तो फिर मैं सात हजार क्यों लेने जाऊंगा?

अगर लोन लिया भी है तो वह मुझे फोन करेगा, आप को या सरपंच को क्यों करेगा? मुझे तो कोई फोन आ भी नहीं रहा है। अभी इसी उधेडबुन में था कि दुसरे दिन सुबह-सुबह मुखिया जी के मौसेरे भाई का फोन आ गया कि हमारे नाम पर तुमने सात हजार का लोन लिया है, लौटा दो, नहीं तो ठीक नहीं होगा, गांव में आना मुश्किल कर देंगे। जिस दिन भी गांव में कदम पड़े, हाथ पैर दोनों तोड़ दूंगा। परिवार को रस्ते पर ला दूंगा।

इतनी धमकी सुननी ही थी कि मेरा गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया। सोया हुआ राजपूत जाग गया। दोस्त को बुलाया, गाड़ी ली और सीधे विलेपार्ले एयर पोर्ट पहुँच गया, फिर बनारस की टिकट ली, दोपहर दो बजे बनारस टच कर दिया। हवाई जहाज में चढ़ने के पहले ही बनारस में राजनितिक रसूख रखने वाले अपने दबंग दोस्त को फोन किया।

बाबत एयर पोर्ट पहुँचा, गाड़ी तैयार थी, शाम होते-होते, अपने गांव भी पहुँच गया। पहुंचते ही उस वयक्ति को फोन किया कि ले मैं गांव आ गया हूँ, तोड़ मेरा हाथ पैर। फिर उसी वक्त उसके घर गया तो वह नपत्ता था, घर से भागा था। शायद उसके हाथ पांव फुल गये, दो दिन गांव में रहा लेकिन दोनों दिन वह गांव से भागा रहा। मेरे सामने आने की हिम्मत न हुई। उस व्यक्ति का नाम यहा नही जिक्र करूगा क्यों कि पहले से ही उसकी काफी बेइज्जती कर चुका हूँ।

अपनी गलती के लिए उसने और उसके भाई ने माफी भी मांग ली थी। ऐसे में उसे और क्या जलील करना? इस दरम्यान संरपंच जी के भाई आरके सिंह जी जिनको हम स्नेह से शर्मा जी भी कहते हैं, का भी सहयोग क़ाबिल ए तारीफ़ रहा। हमेशा मेरे साथ खडे रहे, मेरा साथ दिया, हिम्मत बढ़ाते रहे। जिस नंबर से फोन आ रहा था, उस नंबर की पुलिस कंपलेंट भी की थी लेकिन उसके बाद से नंबर हमेशा बंद बताता रहा। कुछ कर नही पाया, क्योंकि अपराध इतना संगीन नहीं था कि कुछ किया जा सके? गुमराह करने के लिए ही सिर्फ फोन आया था।

लेकिन तब तक काफी कुछ बिगाड़ हो चुका था, आसपास सात हजार के लोन लेने वाली बात फैल चुकी थी। अब मै कुछ कर भी नहीं पा रहा था। एक दिन गांव के ही पंडित संजय बाबा जी से बात कर रहा था, अपनी व्यथा बता रहा था, ” उन्होंने बताया, बाबू आप समझते नहीं है। यह अपने गांव की राजनीति है, आप गांव में गरीबों को कंबल और रज़ाई बांटने वाले थे, आपके विरोधियों को यह बात कैसे हजम होती?

विरोधी यह साबित करना चाहता होगा कि धीरज यहा रजाई-कंबल बाँट कर बड़का बन रहे हैं और इतना छोटा सा लोन चुका नहीं पा रहे है। यहाँ तो लोगों को टांग खींचने में मजा आता है। आप का विरोधी कैसे शांत बैठता?… लगा दिया आग! दूर बैठ कर अब मजे ले रहा होगा? यहा कोई अपने दुख से दुखी नहीं होता, यहां तो लोग दुसरे के सुख से दुखी होते हैं। धीरज बाबू गांव की राजनीति से आपका पहली बार वास्ता पडा है।

तब का दिन है और आज का दिन। गांव सिर्फ घुमने जाता हूँ, बचपन और पुरखों को याद करता हूँ, खेत-खलिहान देखता हूँ। अपनों से मिलता हूँ और चुपचाप निकल आता हूँ। बाकी चीजों के लिए कान पकड़ लिया हूँ लेकिन हिम्मत मैने आज भी नहीं हारी है। निकट भविष्य में मुझे अपने गांव के विकास के लिए काफी कुछ करना है।

जय हिंद

नोट: आर्टिकल के छाया चित्रकार विनय सिह महामंत्री, मानवेंद्र प्रताप सिंह नीरज (चुरिया)