मेरे चार माहें बच्चे

- in साहित्य
आदित्य राज

कविता

मेरे बच्चे
तुम्हारी ही तरह वो गिरगिटिया दाने भी बड़े हो गए
जिसे तुम्हारे ही साथ मैंने जमीन में बोया था
जिसे बादलों ने चुराया, आया हिलाया, डुलाया-डुबोया

डाल दिया कफन, मेरे बच्चे मैं कैसे तन कर खड़ा रह सकता हूं
ऐ! मेरे चार माहें बच्चे, मैं अपने दूधमुहें बच्चों के साथ
तुम्हारी पीठ पर सवार होकर, गल जाना चाहता हूं
जब मेरी एक आंख, हेर रही होती है

दिल्ली, दूसरा लखनऊ (या कि) पटना…..
एक शब्द आ पड़ता है मेरे कानों में…
भरोसा, पिघले शीशे की तरह चुभता है
डबडबा जाती हैं मेरी आंखें

रोकता हूं.. रोकता हूं, क्योंकि तुम्हारी प्यास की क्षुधा बुझा दी गई है
इसकी गर्माहट जलाएगा, और नमक गलाएगा तुझे।

मेरे बच्चे !
अचानक गायब हो गई, मेरे आंगन से पायलों की झंकार
लोग कहते हैं उस शहर में, मचकती है चौकियां
अनंत बार, मेरे बच्चे मुझे उतनी ही बार

मेरी मुनिया चीखती सुनाई पड़ती है, अभी-अभी
हल्का हो गया मेरे आंगन के सिंदूर का भार
और उतना ही बढ़ गया सुनार के दांत का लालीपन ।

(स्नातकोत्तर छात्र- काशी हिंदू विश्वविद्यालय/ यह कवि की स्वतंत्र भावनाएं है)