चैत की एक रात

- in साहित्य
नीरज कुमार

“दस्तक साहित्य संसार” 

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संस्मरण

रात के बारह बजे हैं, पर मेरे घर में कोई सो नहीं रहा है। अमूनन गांव में लोग पहले ही सो जाते हैं। पर आज ऐसा नहीं है। बाहर बारिश हो रही है, बिजली चमक रही है और पत्थर (ओले) पड़ रहे हैं। नींद के लिए ये वातावरण तो बहुत बाधक नहीं होता है, पर ये बारिश बहुत अलग है। क्योंकि, इस बारिश के बादल जितना पानी लेकर आए हैं, उससे ज्यादा पानी मेरे पापा की आंखें लेकर उमड़ी हैं। मेरे पापा एक किसान हैं!

‌जब गेहूं की बुआई हो रही थी तब मेरी मां ने गुल्लक तोड़ के बीज लाने के पैसे दिए थे। गेहूं खूब लगे, हरे हरे, घने इतने कि खेत में इस तरफ़ से चल कर उस तरफ निकलना मुश्किल। पर जब गेहूं फूटने पर आया तो एक महीने में तीन बार आए बारिश, आंधी और ओलावृष्टि ने तहस- नहस मचा दिया, गेहूं के पौधे गिर गए।

गांव के सारे किसानों ने रबी फसल से अपनी उम्मीदें ढ़ीली कर दीं। फिर अचानक पछुआ हवा चलने लगी तो गेहूं के पौधे उठ खड़े हुए। पापाजी खुश हो कर बताने लगे कि गेहूं फिर से लग गया था ख़ूब बाल आए थे।पर फिर एक बार बादल आए साथ लाए बारिश और पत्थर। सारे किसानों में मातम का माहौल बन गया। गेहूं ने सारे कहर झेलते हुए एक बार फ़िर अपनी ताक़त दिखाई। बाल बाल पके तो खूब मोटे-मोटे, गोटेदार कुल मिलाकर मन खुश कर देने वाली मनी आई।

‌अब कटाई शुरू हुई। लगभग छः सात खेतों के गेहूं की कटाई हुई, बोझे बांधे गए। अब कल सुबह दंवरी होनी थी। हम सब खुश थे कारण ये कि पिछले कुछ सालों में इतनी अच्छी फसल और मनी नहीं आई थीं जितनी इस बार। हम सब रात में खाकर आठ बजे सोने चले गए। अचानक से बारिश का शोर सुनाई देता है सब जग जाते हैं।

चिंता होने लगती है। पर बारह बजते बजते आती है बारिश, आंधी और पत्थर के साथ। खेत में बंधे गेहूं के सैकड़ों बोझे भींग रहे होंगे, पत्थर उन्हें कुचल रहा होगा, सुबह में चारो तरफ़ पानी ही पानी दिखेगा, गेहूं अपने पौधे में ही सड़ जाएंगे सारी खुशियां मातम बन कर रह जाएंगी।

‌ऐसा दृश्य मैंने अपने घर में कभी नहीं देखा था, लाखों रूपयों के आलू और ईंख के नुकसान पर भी नहीं! ‌दादी बारिश देखने का बहाना करके खिड़की के पास जाकर रो लीं… शायद दिल हल्का करने के लिए! ‌पर पापा सबके सामने कमजोर नहीं दिखने की कोशिश में अपनी पलकों पर सारी पीड़ा के सागर का पानी रोके हुए थे! अनायास !

उनके मुख से स्वर फूट पड़ा… “अब भूखमरी कोई नहीं रोक सकता!” ‌पलकों ने उनकी इजाज़त के बिना झपकना चाहा… इसी क्रम में पलकों ने आँसू को धक्का देकर बाहर गिरा दिया…….!!

स्नातकोत्तर छात्र (अंग्रेजी विभाग/काशी हिंदू विश्वविद्यालय )