जमीन, जल, जंगल, जानवर– प्रकृति केन्द्रित विकास की कुछ बातें

के.एन. गोविन्दाचार्य
  • गोवंश हत्याबंदी कानून In Letter and Spirit लागू हो। एक मनुष्य पर एक गोवंश
    का लक्ष्य रखकर प्रयास हो।
  • “गोमाता का निर्देश पत्र” का प्रभावी परिणामकारी क्रिन्यावयन हो। इस हेतु गोसंरक्षण मंत्रालय बने।
  • गंगा जी की अविरलता, निर्मलता के लिए प्राकृतिक प्रवाह सुनिश्चित किया जाय। 70% पानी प्रवाह मे रहे और गंगाजी की बाढ़ के उच्चतम स्तर के दोनो तरफ एक- एक कि.मी. जमीन गंगाजी की जमीन मानी जाय, रेवेन्यू रिकॉर्ड में दर्ज की जाय।
  • प्रकृति विध्वंस या प्रकृति को नुकसान पहुंचाने पर कड़े दंड की व्यवस्था हो। संरक्षण पर वैसे ही प्रोत्साहन भी मिले।

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  • जमीन, जंगल के स्वामित्व के अधिकार की पुनर्समीक्षा हो। प्रकृति के अनुकूल कानून बने।
  •  जल संरक्षण के लिये जखनी जल ग्राम, लापोड़िया गाँव, धुले जिले के सुरेश खानापुरकर सरीखें प्रयोगों के प्रयास को अपने-2 क्षेत्र की स्थिति को समझकर अपनाया जाय।
  • कृषि, मिश्रित फसली, बहुफसली हो। पालेकर कृषि पद्धति, उनकी ही पंचस्तरीय बागवानी पद्धति, बुंदेलखंड की आवर्तनशील कृषि पद्धति आदि प्रयोगों के प्रकाश में प्राकृतिक खेती की तरफ बढाव हो। एतदर्थ नीतियाँ भी, व्यवस्था भी अपनाई जाय। अग्निहोत्र पर जोर दिया जाय।
  • वनाच्छादन और बागवानी को विशेष प्राथमिकता मिले। एतदर्थ वनवासी क्षेत्र के लोगों को इसके लिये विशेष दायित्व मिले। वे दायित्व भी संभाले, लाभार्थी भी वे ही रहें ऐसा कानूनी जामा पहनाया जाय।