देश के लिए मिसाल हैं ये प्रशासनिक अधिकारी

सुधांशु दिवेदी

लखनऊ: यूँ तो तो साक्षात्कार और भेंटवार्ताओं में लोग यही बताते हैं कि वे समाज परिवर्तन और सेवा के लिए प्रशासनिक सेवा में जाना चाहते हैं पर असलियत यह है कि इस सेवा में निहित अपार शक्ति और अकूत धन की संभावनाओं से वे इस ओर आकृष्ट हुए होते हैं पर ऐसा प्रत्येक मामले में नहीं होता। ऐसे सैकड़ों उदहारण हैं जिनमें प्रशासनिक अधिकारियों ने समाज को वह देने का पूरा प्रयास किया जिसका आदर्शवादी दावा वे करते थे बल्कि उससे आगे बढ़कर उन्होंने तमाम नवप्रवर्तनकारी काम किये जिससे लोगों के लिए नई राहें बनीं।

ऐसे कुछ अधिकारियों के कार्यों के बारे में जानना हमारे लिए प्रेरणादायक होगा, खासकर ऐसे समय में जब हमारे शासक और प्रशासक बुरी ख़बरों के लिए ही अधिकतर चर्चा पा रहे हों। वैसे तो आज़ादी से पहले और आज़ादी के बाद ऐसे दर्जनों अधिकारी हुए जिन्होंने भारत में संस्थाओं की नींव डाली और भारत के निर्माण में महान योगदान दिया पर हम विशेषकर समकालीन भारत के कुछ अधिकारियों की बात करना चाह रहे हैं जिन्होंने विशेष जनोन्मुख एजेंडा अपनाया और इसलिए वे आज की पीढ़ी के अधिकारियों के लिए रोल मॉडल हो सकते हैं। शुरुआत मैं ऐसे 10 अधिकारियों से कर रहा हूँ, इनमें कुछ तो बहुचर्चित हैं पर कुछ के नवप्रवर्तनीय कार्यों के कारण सूची में स्थान दिया गया है।

अनिल बोर्डिया

अनिल बोर्डिया

अनिल बोर्डिया प्रौढ़ शिक्षा और अनौपचारिक शिक्षा के क्षेत्र में अपने कामों के लिए बेहद प्रसिद है, उन्होंने बिहार और राजस्थान में शिक्षा के विकास में अतुलनीय योगदान दिया।रिटायरमेंट के पश्चात् भी वे शैक्षिक परिवर्तन की जद्दोजहद से अलग नहीं हुए थे। हाँ मृत्यु ने 2012 में इस अनथक योद्धा के कदम अवश्य रोंक दिए।

5 मई 1934 को इन्‍दौर में जन्‍में बोर्डिया जी की प्रारभ्भिक शिक्षा उदयपुर की विद्याभवन संस्‍था में हुई थी। उच्‍च शिक्षा उन्‍होंने एमबी, कॉलेज उदयपुर और सेंट स्‍टीफन कॉलेज से प्राप्‍त की। शिक्षा के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए वर्ष 2010 में उन्‍हें पद्मभूषण से सम्‍मानित किया गया था। यूनेस्‍को सहित कई अन्‍य अन्‍तर्राष्‍ट्रीय संस्‍थाओं ने भी उन्‍हें समय-समय पर सम्‍मानित किया था। बोर्डिया वर्ष 1957 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी थे। शासकीय सेवा से निवृत होने के बाद वे शिक्षा के क्षेत्र में ही सक्रिय थे। राजस्‍थान में प्राथमिक शिक्षा के लिए लोक जुम्बिश परियोजना के लिए उन्‍हें जाना जाता है। पिछले कुछ समय से वे किशोरों के लिए दूसरा दशक नाम से एक परियोजना चला रहे थे।

डॉ. बी.डी. शर्मा

डॉ. बीडी शर्मा

भारत के महान अधिकारियों में डॉ. शर्मा का नाम अन्यतम है। वे सचमुच भारत की ऋषि परम्परा से थे और अधिकांश समय 1 रुपया महीना वेतन पर रहे और सत्ता कितनी भी प्रचंड हो कभी नहीं झुके। स्व.शर्मा ने प्रशासनिक सेवा का त्याग कर दिया था और वह नौकरी एवं उसके बाद ताउम्र आदिवासियों के अधिकार एवं सम्मान की लड़ाई लड़ते रहे। एक ओर देश के विभिन्न जनसंगठनों के साथ उनका जुड़ाव था, तो दूसरी ओर सरकार द्वारा आदिवासी हितों पर गठित विभिन्न समितियों एवं आयोगों में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।

डॉ. शर्मा अपने प्रशासनिक कैरियर के शुरुआती दिनों से ही आदिवासियों एवं वंचितों के पक्ष में खड़े रहते थे। वह उनके संवैधानिक अधिकारों को लड़ाई लड़ते रहे, जिससे वे कई तरह से वंचित रहे हैं। 1968 में बस्तर कलेक्टर के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने बड़ी ख्याति पाई। 1981 में उन्होंने आदिवासियों और दलितों के लिए सरकारी नीतियों को लेकर उनके और सरकार में मतभेद के कारण प्रशासनिक सेवा को अलविदा कह दिया। लेकिन इसके बाद ग़रीबों, आदिवासियों और दलितों के लिए उनका संघर्ष और तेज हो गया। भारत सरकार ने बाद में ही उन्हें नॉर्थ ईस्ट युनिवर्सिटी का कुलपति बनाकर शिलांग भेजा। वहां भी उन्होंने इस दिशा में काम किया।

1986 से 1991 तक वो अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति आयोग के आखिरी आयुक्त के रूप में काम किया। पर आयुक्त के रूप में जो रिपोर्ट उन्होंने तैयार की उससे देश के आदिवासियों की गंभीर स्थिति को समझने में मदद मिलती है। उस रिपोर्ट की सिफ़ारिशों को आदिवसियों को न्याय दिलाने की ताक़त रखने वाले दस्तावेज़ के रूप में देखा जाता है। 1991 में भारत जन आंदोलन और किसानी प्रतिष्ठा मंच का गठन कर उन्होंने आदिवासी और किसानों के मुद्दों पर राष्ट्रीय स्तर पर कार्य करना शुरू किया। 2012 में छत्तीसगढ़ के सुकमा ज़िले के कलेक्टर को माओवादियों से छुड़ाने में उन्होंने प्रोफ़ेसर हरगोपाल के साथ अहम भूमिका निभाई थी। वह माओवादियों की ओर से वार्ताकार थे। उनकी घनिष्टताकल्याणकारी भूमिका में उतरने वाले वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी एसआर संकरन और वी. युगंधर के साथ लंबे समय तक रही।

भूरिया समिति की रिपोर्ट में भी उनकी भूमिका रही। उन्होंने आदिवासी उप योजना का विचार दिया। जिस पर अमल किया जाने लगा। वन अधिकार कानून, पेसा आदि में उन्होंने बड़ी जिम्मेदारी निभाई। आदिवासी इलाकों में हिंसा और युद्ध की स्थिति से बहुत परेशान होकर उन्होंने 17 मई 2010 को राष्ट्रपति के नाम एक पत्र लिखा था। जिसे एक दस्तावेज के रूप में देखा जाता है। उन्होंने ‘गणित जगत की सैर’, ‘बेज़ुबान’, ‘वेब ऑफ़ पोवर्टी’, ‘फ़ोर्स्ड मैरिज इन बेलाडिला’, ‘दलित्स बिट्रेड’ आदि पुस्तकों का लेखन किया। वह नर्मदा बचाओ आंदोलन, जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय, किसान संघर्ष समिति सहित दर्जनों संगठनों के साथ जुड़े हुए थे।

एस.आर. शंकरन

एसआर शंकरन

नक्सलियों और सरकार के बीच वार्ता कराने के लिये जिस व्यक्ति ने पहल की उनका नाम शंकरन था। शंकरन आईएएस थे। रिटायरमेंट के बाद शंकरन जी किसी मित्र के खाली पड़े घर में अकेले रहते थे। घर में कोई फर्नीचर नहीं था। बिल्कुल फकीरी का जीवन। वस्तुतः उनकी यही ईमानदारी और सादगी ही थी जो उन्हें नक्सलियों तक का विश्वसनीय बनाती थी। आम जनता के आँखों के तारे तो वे थे ही।

शंकरन जी पहले आंध्र में श्रम सचिव थे। उन्होंने पद सम्भालते ही बंधुआ मजदूरी समाप्त करने का अभियान चलाया। ज्यादातर बंधुआ मजदूर बड़े बड़े नेताओं के खेतों में काम करते थे। शंकरन जी के अभियान से पूरे आंध्र प्रदेश में खलबली मच गई। चेन्ना रेड्डी कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री थे। एक दिन मुख्य मंत्री ने शंकरन जी को अपने आफिस में बुलाया और पूछा कि आप यह सब क्या कर रहे हैं? शंकरन जी ने कहा कि कानून लागू कर रहा हूं। मुख्यमंत्री ने कहा कि नहीं जब मैं कहूँगा तब कानून लागू होगा। शंकरन जी ने कहा कि मैं ऐसा नहीं कर सकता। मुख्यमंत्री ने कहा कि फिर आप मेरे साथ काम नहीं कर सकते। शंकरन ने तुरंत इस्तीफ़ा दे दिया और अपना सूटकेस लेकर दिल्ली में केन्द्रीय श्रम सचिव से मिलने आ गये।

कलेक्टर सैमुअल आनंद कुमार (बाएं) ने एस.आर.शंकरन का चित्र अपने कार्यालय गुंटूर में लगाया

शंकरन जी ने केन्द्रीय श्रम सचिव के अर्दली को अपने नाम की पर्ची दी। अर्दली ने शंकरन जी से बाहर बैठने के लिये कहा, कुछ देर बाद कमरे से कुरता धोती पहने एक सज्जन बाहर निकले। शंकरन जी अंदर गये। केन्द्रीय श्रम सचिव ने शंकरन जी से पूछा कैसे आना हुआ? शंकरन ने पूरा मामला बताया। केन्द्रीय श्रम सचिव ने शंकरन जी से पूछा त्रिपुरा जाओगे? शंकरन जी ने कहा जहाँ आप कहेंगे जाऊँगा। केन्द्रीय श्रम सचिव ने अपने अर्दली को बुला कर कहा कि अभी जो सज्जन बाहर गये हैं उन्हें बुला दो। कुछ देर में वो धोती कुर्ते वाले सज्जन वापिस आ गये। वे त्रिपुरा के मुख्य मंत्री नृपेन चक्रवर्ती थे। केन्द्रीय श्रम सचिव ने उनसे शंकरन जी का परिचय कराया और कहा आपको त्रिपुरा के मुख्य सचिव पद के लिये एक ईमानदार आदमी चाहिये था ना? शंकरन को ले जाइए मेरे पास इससे ईमानदार कोई आदमी नहीं है।

शंकरन जी त्रिपुरा के मुख्य सचिव बन गये। शंकरन जी ने कहा मुझे बंगला नहीं चाहिये शंकरन जी को एक पुराने डाक बंगले का एक कमरा पसंद आया। बराबर के दूसरे कमरे में त्रिपुरा के मुख्यमंत्री नृपेन चक्रवर्ती रहते थे। दोनों सुबह बाहर नल के नीचे अपने कपडे धोते थे। बाद में मुख्य मंत्री और मुख्य सचिव दोनों अपने कार्यालय के निकल जाते थे।

शंकरन जी अपना अधिकांश वेतन निराश्रित विद्यार्थियों को उनकी फीस आदि के लिये दे देते थे। जब शंकरन जी रिटायर हुए तो उन्हें जो प्रोविडेंट फंड और ग्रेच्युटी का पैसा मिला वह भी शंकरन जी ने वहाँ के एक अनाथालय को दान दे दिया। शंकरन अपना एक सूटकेस लेकर आंध्र प्रदेश लौट आये और हैदराबाद में अपने एक मित्र के यहाँ रहने लगे।

एन. जयप्रकाश नारायण

एन. जयप्रकाश नारायण

देश के कुछ सबसे जुझारू प्रशासकों में शामिल रहे जयप्रकाश नारायण ने मेडिकल की पढाई पढ़ने के बाद 24 साल की उम्र में चौथी रैंक के साथ सिविल सेवा में प्रवेश किया और हमेशा जनोन्मुखी कार्यों के लिए चर्चित रहे। अंततः उन्होंने महसूस किया सिविल सेवा में सम्पूर्ण बदलाव की ताकत नहीं है। वह ताकत राजनीति में है इसलिए वे 1996 में आईएएस से इस्तीफ़ा देकर राजनैतिक सुधारों के काम में जुट गए किन्तु अपने छोटे से प्रशासनिक अनुभव में उन्होंने बड़े बड़े काम कर डाले। उनका सबसे उल्लेखनीय कार्य था विशाखापत्तनम स्टील प्लांट के विस्थापित लोगों का पुनर्वास और विस्थापितों में से 60000 युवाओं को पूर्ण एवं स्थायी रोजगार की व्यवस्था।

उन्होंने पूर्वी गोदावरी और प्रकाशम जिले में सिंचाई और जल संरक्षण के लिए असाधारण काम किये। उन्होंने आन्ध्र में सहकारी समितियों को मज़बूत किया तथा ग्राम न्यायालय को लोकप्रिय बनाया उन्होंने सूचना अधिकार के प्रयोग द्वारा लोगों के सशक्तीकरण पर भी बहुत काम किया। हैदराबाद में आईटी इंडस्ट्री के विकास में उनकी बड़ी भूमिका रही है। आईएएस से इस्तीफ़ा देने के बाद उन्होंने लोकसत्ता नामक राजनीतिक दल बनाया और फाउन्डेशन ऑफ़ डेमोक्रेटिक रिफार्म नामक संगठन बनाया जो राजनीति से अपराधीकरण और कालेधन को समाप्त करने पर काम कर रहा है। उन्होंने चुनाव भी लड़ा और विधायक भी बने तथा विधानसभा में अपनी सक्रियता से लोगों के सामने आदर्श रखा। वे लोकपाल की ड्राफ्ट कमेटी में भी रहे तथा दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग, राष्ट्रीय सलाहकार परिषद्, राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन, सतर्कता आयोग आदि के भी सक्रिय सदस्य रहे। नारायण अपने पवित्र उद्देश्य में सफल रहें हमलोग यही शुभकामना कर सकते हैं।

अरुणा रॉय

अरुणा रॉय

अरुणा रॉय जो 22 साल की उम्र में भारतीय सिविल सेवा में दाख़िल हुईं पर सिर्फ 24 साल की उम्र में वहां से इस्तीफ़ा देकर अपने मजदूर किसान शक्ति संगठन में लग गईं। यह संगठन सरकारी अभिलेखों की जांच के लिए लोगों के अधिकारों की लड़ाई लड़ता था।

अंततः उनका संघर्ष रंग लाया जब 2005 में सूचना के अधिकार अधिनियम को लागू कर दिया गया। उनको 2000 में सामुदायिक नेतृत्व के लिए रेमन मैग्सेसे पुरस्कार मिला। उन्होंने सामाजिक संघर्ष की प्रेरणा अपने पूर्व सहपाठी और पति बंकर रॉय से ली थी तथा समाजसेवा के लिए इस रॉय दम्पति ने बच्चे न उत्पन्न करने का निर्णय लिया।

यू. सागायम

यू. सागायम

यू. सागायम तमिलनाडु के एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हैं, जो भ्रष्टाचार विरोधी गतिविधियों के लिए व्यापक रूप से जाना जाता है। वे 1991 में सिविल सेवा में आये और अपने भ्रष्टाचार विरोधी रुख के कारण लगातार स्थानांतरित होते रहे। फिर भी उनके जनहितकारी कार्यों में कोई रुकावट नहीं आई। वे अपने प्रत्येक दफ्तर के दरवाजे पर अंकित करवा देते हैं कि रिश्वत को अस्वीकार कर दें और अपना सिर ऊँचा रखें।

उन्होंने 2000 में पानी का दुरूपयोग करने और प्रदूषण फ़ैलाने के कारण चेन्नई के पास पेप्सी प्लांट को सील कर दिया और किसी भी दबाव में नहीं आये। उन्होंने आपूर्ति विभाग में रहते हुए रेस्टोरेंट्स द्वारा प्रयुक्त 5000 हज़ार गैस सिलेंडर जब्त किये जो घरेलू उपयोग के थे। वे तमिलनाडु के पहले अधिकारी थे जिन्होंने वेबसाइट पर अपनी संपत्ति घोषित की। उन्होंने अवैध खनन के मामले में असाधारण कार्यवाहियां कीं। उनके स्थानांतरित होने पर जनता हजारों के संख्या में उतर कर उनका समर्थन करने उतरी।

टी.एस.आर. सुब्रमण्यम

टीएसआर सुब्रमण्यम

टीएसआर सुब्रमण्यम प्रशासनिक सेवा के उन अधिकारियों के लिए असाधारण प्रेरक व्यक्तित्व हैं जो इस सेवा के नियम कानून प्रोटोकाल के दायरे में रहकर सुशासन और पारदर्शिता के लिए समर्पित रहना चाहते हैं। वे 1961 बैच के उत्तर प्रदेश कैडर से सम्बंधित आईएएस अधिकारी थे जो इस सेवा के सर्वोच्च पद (कैबिनेट सचिव) पर 1949 से 1949 तक रहे। पर उसके बाद भी वे अधिकारियों के अधिकारों और सुशासन की स्थापना के लिए लगातार सक्रिय हैं।

अभी 2013 में उनके प्रयासों के परिणामस्वरुप सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय सुनाया कि अधिकारियों की नियुक्ति की एक न्यूनतम अवधि होनी ही चाहिए। उनका कहना है कि लोकसेवक नेता लोगों के निजी कर्मचारी नहीं हैं। टीएसआर ने इस सन्दर्भ में कई महत्वपूर्ण पुस्तकें भी लिखी हैं। इंडिया एट टर्निंग प्वाइंट और जर्नी थ्रू बाबूडम एंड नेतालैंड जैसी पुस्तकें चर्चित रहीं। टीएसआर एचसीएल और शिव नाडर विवि की स्थापना से भी जुड़े रहे हैं तथा सरकार की अनेक महत्वपूर्ण कमेटियों से जुड़े हैं। इनमें से शैक्षिक सुधारों की समिति भी शामिल है।

आर्मस्ट्रोंग पेम

आर्मस्ट्रोंग पेम

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त लिंगदोह के बाद आर्मस्ट्रोंग पेम पूर्वोत्तर के ऐसे दूसरे अधिकारी हैं जो चर्चा में हैं। मणिपुर के दो दुर्गम हिस्सों के बीच सड़क के अभाव में बाशिंदों की जिंदगी नरक बन गई थी। मगर, इस युवा आईएएस ने बिना सरकारी बजट के सौ किमी सड़क बनवा दी।

जिससे स्थानीय लोग इस युवा आईएएस के कायल हो गए। सड़क को पीपुल्स रोड(जनता की सड़क) नाम दिया। जिससे कुल 31 गांवों के लोगों की जिंदगी खुशियों से भर गई। इस आईएएस का नाम है-आर्मस्ट्रांग पेम। 2009 बैच के आईएएस आर्मस्ट्रांग पेमे को मणिपुर के लोग चमत्कारी पुरुष मानते हैं।

ओ.पी. चौधरी

ओपी चौधरी

2005 बैच के ओपी चौधरी ने (श्री चौधरी राज्य गठन के पश्चात् राज्य से होने वाले हिंदी माध्यम के पहले आईएएस हैं) छत्तीसगढ़ में दंतेवाड़ा की तस्वीर बदलने की पहल की है। उन्होंने कॉर्पोरेट जगत सहित विभिन्न स्त्रोतों से लगभग 100 करोड़ रु. इकठ्ठे किए और इस पैसे से आदिवासी बच्चों के लिए 150 एकड़ जमीन पर शैक्षणिक केंद्र का निर्माण शुरू करवाया है लेकिन माओवादियों के इलाके में काम करने वाले चौधरी को लेकर उनके परिजन चिंतित रहते हैं।

चौधरी कहते हैं कि कई बार परिवार वालों को अपनी सुरक्षा के प्रति आश्वस्त करना मुश्किल हो जाता है। यही नहीं उन्होंने यहाँ के बच्चों को अच्छे विद्यालयों की प्रवेश परीक्षाओं में मदद करने के लिए नन्हें परिंदे अभियान शुरू किया है उन्होंने बेरोजगारी से लड़ने और स्किल डेवेलपमेंट के लिए लाइलीवुड कॉलेज की स्थापना की जिससे हजारों लोग रोजगार पा चुके हैं। शिक्षा के अधिकार का गरीब उपयोग कर सकें इसके लिए उन्होंने सरकारी होस्टल्स की व्यवस्था कराई हैं वे शिक्षा के प्रसार द्वारा गरीबी और नक्सलवाद से लडाई लड़ने के पक्षधर हैंं।

संजीव चतुर्वेदी

संजीव चतुर्वेदी

देश में अनेक ऐसे अधिकारी हैं जो अपनी ईमानदारी की वजह से भ्रष्ट सरकारों के हमेशा निशाने पर रहते हैंं इन्हीं में से एक हैं 2002 बैच के आईएफएस अधिकारी संजीव चतुर्वेदी। संजीव चतुर्वेदी मूलत: हरियाणा काडर के अफसर हैं। पहली पोस्टिंग इन्‍हें कुरुक्षेत्र मिली, जहां इन्‍होंने हांसी बुटाना नहर बनाने वाले ठेकेदारों पर एफआईआर दर्ज करवाई।

बतौर सीवीओ,एम्‍स में संजीव ने अपने दो साल के कार्यकाल में 150 से ज्‍यादा भ्रष्‍टाचार के मामले उजागर किए। केंद्र में बीजेपी की सरकार आने के बाद संजीव को सीवीओ पद से हटा दिया गया, जिस पर काफी विवाद भी हुआ। 2007-08 में संजीव ने झज्जर में एक हर्बल पार्क के निर्माण में हुए घोटाले का पर्दाफाश किया, जिसमें मंत्री और विधायकों के अलावा कुछ अधिकारी भी शामिल थे। 2010 में उन्होंने राज्य सरकार से तंग आकर केंद्र में प्रति नियुक्ति की अर्जी दी थी। उन्हें सार्वजनिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार के मामले उजागर करने के लिए 2015 में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार दिया गया है।

(क्रमश:)

(लेखक समसमायिक मामलों के जानकार हैं।)