ये जो पॉलिटिक्स है

ज्ञानेन्द्र शर्मा

प्रसंगवश

स्तम्भ: जो कभी भी कुछ भी करा दे, उसे पॅालिटिक्स कहते हैं। पूरी दुनिया के अच्छे-अच्छे, जाने-माने लोग हार जाते हैं जब उन्हें पॉलिटिक्स को सीधे-सीधे परिभाषित करना हो। दरअसल पाॅलिटिक्स यानी राजनीति वह कला है जिसे लोग अपने अपने फायदे के हिसाब से परिभाषित करते हैं। कहा जाता है कि राजनीति जिसके सिर सवार होती है, उसके पैर स्थिर नहीं रहते।
पिछले दो तीन दिन में कई राजनीतियाॅ अलग-अलग रंग लेकर उभरी हैं।

सबका लक्ष्य एक ही हैं-  जो कुछ अपने पास है, वह बचाना है और जो सामने वाले के पास है, उसे छीनना है। इसीलिए पश्चिम बंगाल में विपक्ष में बैठी भारतीय जनता पार्टी ने विधानसभा के चुनाव की निर्धारित तिथि के पूरे छह महीने पहले ही अपना चुनाव अभियान प्रारम्भ कर दिया है, अपने पत्ते खोल दिए हैं। भारतीय जनता पार्टी इसी लय में बिहार में भी समय से बहुत पहले राजनीति शुरू कर चुकी है। कांग्रेस के लोग दोनों राज्यों में अपनी अपनी गोटों को सही बिठाने में जुट गए हैं।

आज यानी 30 मई को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने दूसरे कार्यकाल का पहला साल बहुत मुश्किल हालात में पूरा कर रहे हैं। लेकिन वे कहते हैं कि कोई आपदा हमारा भविष्य तय नहीं कर सकती। अब विपरीत समय है तो मोदी जी रैलियाॅ नहीं कर पा रहे हैं वरना अभी रामलीला मैदान में वार्षिक समारोह उनके भाषण से सुसज्जित होकर मनाया जा रहा होता।

वैसे भी मोदी जी के भाषण सुनने में सभी को आनंद आता है और वे भाषण देते भी खूब हैं। इकोनोमिक टाइम्स ने हिसाब लगाकर बताया है कि मोदी जी ने 26 मई 2014 को पहली बार प्रधानमंत्री बनने के बाद 2017 तक हर महीने करीब 19 भाषण दिए थे। उनकी तुलना में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने हर महीने 11 भाषण दिए। अब इन भाषणों के आंकडों में जल्दी ही और परिवर्तन होगा क्योंकि अगले छह महीनों में बिहार और बंगाल की विधानसभा के चुनाव होने हैं।

लेकिन लोगों को हैरानी इस बात की है कि भाजपा ने प. बंगाल के चुनाव की रणभेरी अभी से क्यों बजा दी है जबकि वहां चुनाव को पूरे छह महीने बाकी हैं। वहां की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जब मुख्यमंत्री के तौर पर 9 साल की पारी पूरी कर रही थीं तब भाजपा उनके खिलाफ चार्जशीट लगा रही थी। उसने नारा दिया ‘आर नोई ममता’ यानी ‘ अब ममता और नहीं’। क्यों नहीं? इसलिए कि सब मोर्चों पर वह फेल हो गई हैं।

अम्फान चक्रवात पर फेल, प्रवासियों पर फेल, गरीबों को राशन पर फेल, महिलाओं को सुरक्षा पर फेल और घुसपैठ रोकने में फेल। ममता की त्रिणमूल कांग्रेस कहती है कि अभी तो ऐसे राजनीतिक अभियान शुरू करने के लिए बहुत समय है, अभी से क्यों? समय आने दीजिए, हम सब बातों का जवाब देंगे। अभी प्रदेश में चक्रवात से दक्षिणी बंगाल अस्तव्यस्त पड़ा है, कोरोना महामारी कहर ढाए पड़ी है और प्रवासी मजदूरों की भीषण समस्या है। पिछला चुनाव 27 मई 2016 को खत्म हुआ था और इस तरह अगला चुनाव होना है 26 मई 2021 तक। फिर इतनी जल्दी क्यों मची है? ऐसी ही जल्दी भाजपा पहले बिहार में दिखा चुकी है।

ममता बनर्जी वो शख्सियत हैं जिन्होंने पश्चिम बंगाल में 34 साल से शासन कर रही मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को चित कर दिया था और 20 मई 2011 को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन हुई थीं। 5 जनवरी 1955 को पैदा हुई ममता का पहला कार्यकाल 2011 से 2016 तक चला और दूसरा 2016 से अभी चल रहा है। सूती साड़ी और हवाई चप्पल पहन कर एकदम सादा जीवन बिताने वाली ममता के नाम 1984 में देश की सबसे कम उम्र सांसद बनने का रिकार्ड बना था। तब उन्होंने मार्क्सवादी के धुरंधर नेता सोमनाथ चटर्जी को हराया था। तब से उन्होंने अपनी राजनीति में पीछे मुड़कर नहीं देखा है।

और अंत में, एक चुनावी घोषणा, चुनाव दो चरणों में होंगे,
पहले वो आपके चरणों में होंगे, फिर आप उनके चरणों में होंगे।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पूर्व सूचना आयुक्त हैं।)