सच है दुनियावालों कि हम हैं अनाड़ी

ज्ञानेन्द्र शर्मा

प्रसंगवश

सरकार ने मार्च से मई के बीच कुल 68 दिन के चार लॉकडाउन लगाए, हम घरों में कैद रहे और अनुशासन में बंधे रहे पर जैसे ही मई खत्म हुआ, जून ने दस्तक दी और हम आजाद हुए, हमने तमाम तरह की जंजीरेें तोड़ दीं, उनसे बाहर आ गए और बेफिक्री की अपनी पुरानी आदतों पर वापस लौट आए। सडक़ों पर भीड़ लौट आई और उसके साथ ही लौट आया धुॅआ-धक्कड़। 

हमें आजादी ऐसी मिली कि बस पूछिए मत। हमने सारी हिदायतें, सावधानियॉ, चेतावनियॉ अंधेरे कोने में उठाकर फेंक दीं। अभी तक प्रधानमंत्री की बात सुन ली जा रही थी पर 30 जून को जब उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति को रोकना, टोकना और समझाना होगा, जब उन्होंने कहा कि जिस तरह लोगों की लापरवाही से संक्रमण के मामले बढ़ रहे हैं, वह चिंता का विषय है, तो किसी ने ध्यान नहीं दिया।

पटना के पालीगंज में एक विवाह में सारे नियम-बंधन तोड़ दिए गए और इसका सबने अंजाम भुगता। गुरुग्राम से शादी करके लौटे लोगों की ऐसी चेन बनी कि 110 लोग कोरोना से संक्रमित हो गए। खुद शादी के दो दिन बाद दूल्हे की मौत हो गई। मतलब यह कि 50 की सीमा पार करके उससे दुगुने से ज्यादा बाराती शादी में पहुॅच गए और जो होना था, वही हुआ।

शादियों की इन दिनों धूम सी मच गई। पंडितों ने शायद यह बताया कि अभी विवाह कर लो-करा लो वरना फिर मलमास लग जाएगा और शादी-ब्याह वर्जित हो जाएंगे, सो लोग उमड़ पड़े। धड़ाधड़ ब्याह हुए और ज्यादातर समारोहों में नियमों और हिदायतों का खुला उल्लंघन किया गया।

दो ढाई महीने के लॉकडाउन ने कई कमाल किए थे। लॉकडाउन खुलने पर हमने लिखा था कि जिन कुछ लोगों को घर में इतने दिनों बंद रहना पसंद नहीं आया था, वे भी खुश थे कि सडक़ें सुहानी लग रही हैं, आसमान धुॅए से मुक्त है, दम नहीं घुट रहा है, अपराध घटे हैं, अनुशासन है और देशवासियों द्वारा अपने बीच शांति से एका कायम करने का अद्भुत संयम दिखाया गया है।

केन्द्रीय सरकार के मंत्रियों की तरह उत्तर प्रदेश के मंत्रियों ने भले ही कोई करतब न दिखाए हों, अपनी अकर्मण्यता से वे बाहर भले ही नहीं निकल पाए हों, विपक्षी नेता इस महामारी के काल में अपने को सही दिशा में भले ही न दौड़ा पाए हों लेकिन उनकी इस कमी को केन्द्र में प्रधानमंत्री मोदी ने और राज्य में मुख्यमंत्री योगी ने बखूबी ढक मूंदकर लॉकडाउन को एक सर्वमान्य राष्ट्रीय कार्यक्रम का रूप देने में सफलता पाई थी।

लॉकडाउन खुलने के दुष्परिणाम सबको सामने दिखे। उत्तर प्रदेश में 1 जून को संक्रमित लोगों की संख्या 396 थी जो 15 जून को बढक़र 603, 27 जून को बढक़र 962 और 30 जून को बढक़र 1033 हो गई। एक महीने में संक्रमितों की संख्या 396 से बढक़र 1033 हो गई। एक दिन में मरने वालों की संख्या भी 5 से बढक़र 19 हो गई। कारण स्पष्ट हैं। लॉकडाउन के रहते हालात नियंत्रण में थे पर जैसे ही वह खुला और लोगों को लगा कि वे आजाद हो गए, हालात बद से बदतर होते चले गए।

सरकार भी कम गुनहगार नहीं थी। यह समझ से परे है कि परिषदीय स्कूलों को पहली जुलाई से क्यों खोल दिया गया। जब नोएडा में 1 जुलाई से स्कूल खेालने का आदेश पहुॅचा तो लगभग उसी समय जिला प्रशासन ने रात में कर्फ्यू लगाने की घोषणा कर दी। हालात कफर््यू के लायक थे तो छोटे बच्चों के स्कूल क्यों खोले गए? एक तरफ तो सरकार ने यह घोषणा की कि सभी स्कूल कालेज, प्रशिक्षण संस्थान 31 जुलाई तक बंद रहेंगे तो परिषदीय स्कूलों को 1 जुलाई से खोलने का क्या औचित्य था, किसी के समझ में नहीं आया।

बार-बार यह कहा जाता रहा है कि कोरोना से कहीं ज्यादा लॉकडाउन से अर्थव्यवस्था पर विपरीत प्रभाव पड़ा है और शायद यही वजह थी, इसी का प्रैशर था कि सरकार ने 25 मार्च को लगाया गया लॉकडाउन 31 मई को खोल दिया जबकि बहुत से लोग अब भी मानते हैं कि लॉकडाउन कम से कम 30 जून तक लागू रखा जाना चााहिए था।

लॉकडाउन से जो नुकसान होना था, वह हो ही चुका था। प्रवासी मजदूरों को भारी कष्ट झेलने पड़े। कई कल -कारखाने बंद पड़े रहे, सामान्य गतिविधियॉ ठप हो गईं क्योंकि विभिन्न दफ्तर बंद हो गए, बसें, रेलेें, हवाई जहाज और परिवहन के तमाम सामान्य साधन ठप हो गए। लोगों को बहुत दिक्कतें हुईं।

लेकिन आज हम क्या यह सोचने को मजबूर नहीं हैं कि हम लोग फिर से कैदखानों में भेज दिए जाने लायक हैं!

और अंत में, यों चेहरे पर उदासी ना ओढि़ए साहब,
वक्त तकलीफ का जरूर है लेकिन
कटेगा मुस्कराने से ही!

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पूर्व सूचना आयुक्त हैं।)