दो शहरों वाला देश

ज्ञानेन्द्र शर्मा

प्रसंगवश

स्तम्भ : पिछले पॉच दिनों की भारी अशांति ने कोरोना से पहले से कराह रहे अमेरिका को हिलाकर रख दिया है। इस हिंसा ने अमेरिका के अंतःकरण में छिपे घोर नस्लभेद को फिर से सतह पर लाकर न केवल उसका असली चेहरा उजागर कर दिया है बल्कि उसमें फिर से लाल स्याही भर दी है। इस शताब्दी के प्रारम्भ में 11 सितम्बर 2001 को अमेरिका पर अल कायदा के आतंकवादियों ने एक भीषण प्रत्यक्ष हमला किया था। फिर दूसरे मोड़ पर कोरोना ने उसको सर्र्वााधक प्रभावित होने का तगमा देकर दुनिया का सिरमौर होने का उसका घमंड चूर-चूर कर दिया और अब नस्ल आधारित हिंसा ने उसे एक और करारा झटका दिया है।

कोरोना महामारी से अमेरिका दुनिया का सबसे अधिक प्रभावित देश बनकर निकला है। पूरे विश्व में करीब 63 लाख 16 हजार लोग इससे प्रभावित हुए हैं और इनमें से अकेले अमेरिका के 18 लाख 43 हजार लोग शमिल हैं। एक लाख 6 हजार से अधिक अमेरिका लोगों को इस महामारी ने लील लिया। 9/11 के प्रत्यक्ष हमले से ठीक विपरीत इस महामारी ने बिना अपनी शक्ल दिखाए, उसे तार-तार कर दिया।

9/11 के हमले को अमेरिका और पूरी दुनिया के लोगों ने टेलीविजन के परदों पर सजीव देखा था जब अलकायदा के आतंकवादियों ने एक के बाद एक चार हमले अमेरिका पर किए थे, उसके ट्विन टावर उड़ा दिए थे। करीब 3 हजार लोग मारे गए और 25 हजार घायल हो गए थे। अग्निशमन के काम में लगे 343 लोग भी मारे गए थे। यह अमेरिका पर दुश्मन का आमने-सामने से किया गया प्रत्यक्ष हमला था और उसकी जमीन पर किया गया लगभग असंभव सा लगने वाला जबर्दस्त प्रहार था। लेकिन कोरोना का हमला तो सर्वथा अप्रत्यक्ष था और जैसा कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा भी कि यह अदृश्य दुश्मन द्वारा किया गया था।

अल कायदा के प्रत्यक्ष और कोरोना के अदृश्य हमले ने अमेरिका को ऐसी चोटें पहुॅचाईं जिनका न तो उसे कोई संदेशा था और न ही पूर्वानुमान। और अब अमेरिका की सड़कों पर फैली नस्लवादी अतिरेक से जन्मी हिंसा ने उसके चेहरे पर लगे जातिवाद के काले धब्बों को फिर से उभार दे दिया।

मिनियापोलिस की एक घटना ने, जिसमें एक अश्वेत नागरिक पर श्वेत पुलिसमैन ने इतनी क्रूरता दिखाई कि उसकी हिरासत में ही मौत हो गई और उसके बाद 140 शहरों में जो हिंसा फैली, उससे निपटने के लिए प्रशासन को कर्फ्यू लगाना पड़ गया, नेशनल गार्ड को लगाना पड़ा। यही नहीं अमेरिकी राष्ट्रपति के ठिकाने व्हाइट हाउस के सामने इतना जबर्दरूत प्रदर्शन हुआ कि सुरक्षा कर्मियों को अमेरिकी राष्ट्रपति, उनकी पत्नी और बेटे को बंकर में ले जाकर छिपाना पड़ा। यह बंकर 9/11/2001 के बाद फिर चर्चा में आया है। उस समय इसका उपयोग तो नहीं हुआ था लेकिन उसे तैयार कर दिया गया था। संयोग की बात यह थी कि उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति व्हाइट हाउस में नहीं थे।

अमेरिका में करीब 13 प्रतिशत अश्वेत या नीग्रो रहते हैं जबकि श्वते लोगों की आबादी 72 प्रतिशत है। 2010 में उनकी आबादी 4 करोड़ के करीब बताई गई थी। ये अश्वेत ज्यादा अफ्रीका से अमेरिका आकर बसे थे। सालों साल उन्हें उचित शिक्षा नहीं मिली, अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं नहीं मिलीं, रोजगार के पर्याप्त अवसर नहीं मिले और नतीजन उनके आर्थिक हालात लचर ही बने रहे।

एक मोटे अनुमान के अनुसार दूसरों की तुलना में कोरोना से अश्वेत लोग ढाई गुना अधिक मरे हैं और जो जीवित बचे हैं उनमें से ज्यादातर को रोजगार से वंचित होना पड़ा है। अश्वेत नेता कहते हैं कि हमारे साथ एक महामारी नस्लभेद की चिपकी हुई है तो दूसरी पुलिस उत्पीड़न की।

मिनियोपोलिस में 25 मई को जॉर्ज फ्लॉयड नाम का जो अश्वेत पुलिस के हाथों मारा गया था, उसकी वकील जैसमीन रैण्ड कहती हैं कि जैसे हम कोरोना से लड़ने को एक हुए हैं, वैसे ही हमें रंगभेद से लड़ने को एक होना पड़ेगा। उनका कहना है कि नस्लभेद कहीं ज्यादा भीषण महामारी है। अमेरिका में बहुत बड़ी संख्या में भारतीय व पाकिस्तानी रहते हैं। वहॉ करीब 6 प्रतिशत आबादी एशियन अमेरिकियों की है। इनकी संख्या लगभग 2 करोड़ है।

वैसे भी बहुत से अश्वेत नेता यह कहते हैं कि गैर-श्वेतों के साथ पग पग पर भेदभाव होता है। वास्तव में अमेरिका में दो ही शहर हैंः एक गोरों का और दूसरा कालों का।

और अंत में, अश्वेत नेता मार्टिन लूथर किंग ने एक बार कहा था- दुखड़ा यह नहीं है कि बुरे लोग, हमारा उत्पीड़न करते हैं,हमारे साथ अत्याचार करते हैं, असली कष्ट यह है कि इस सब पर अच्छे लोग चुप रहते हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पूर्व सूचना आयुक्त हैं।)