ताना-बाना बुनते मन में पैठी तरुणाई

- in कविता, साहित्य
सूर्य कांत शर्मा

काश कि अब दो जीवन होते
एक का ताना-बाना बुनते मन में पैठी तरुणाई से।
एक का ताना-बाना बुनते मस्तिष्क में बैठी गहराई से।
अब भी देखते माँ के कदमों में जन्नत की पुरवाई।

और पिता की आंखों में देखते, आकाशी ऊंचाई।
अब भी साकार करते, आरुणि और एकलव्य की सच्चाई।
और पूछते, गुरु द्रोण से उनकी ही गुरुआई।
अब भी पगते,और डूबते मनमीत के मनुहार में और सहेजते।

उनकी लावण्यमयी तरुणाई, काश!!!
कि अब दो जीवन होते, एक का तानाबाना बुनते।
मन में पैठी, तरुणाई से।
एक का ताना-बाना बुनते मस्तिष्क में बैठी गहराई से।