इस्लामोफोबिया के मूल में क्या है ?

सुधांशु दिवेदी

स्तम्भ:  इस्लामोफोबिया का यह दौर नया है पर इसका इतिहास नया नहीं है। इसका इतिहास हज़ार साल पुराना है, तब का है जब अरबी कबीले इस्लामी भाईचारे के मज़बूत तलवार से लैस होकर एशिया, अफ्रीका व यूरोप में प्रविष्ट होना शुरू हुए। 1453 में कुस्तुन्तुनिया के ऐतिहासिक पतन के पश्चात लगभग आधे यूरोप पर मुसलमानों का शासन हो गया और अफ्रीका व एशिया के अधिकांश हिस्से पर वे काबिज़ हो गए।

चीन व दक्षिण पूर्वी एशिया के कुछ हिस्से को छोड़कर वे सम्पूर्ण एशिया पर काबिज़ हो गए जिसमें भारत, ईरान, तुर्की, मिस्र की महान राष्ट्रीयताएँ भी शामिल थीं। उस समय ईसाईयों के अलावा कोई उनसे मज़बूत मोर्चा नहीं ले पाया। ईसाई लोगों ने अनेक धर्म युद्ध किये और अपने सबसे पवित्र स्थलों को बचाने का प्रयास किया पर अंततः वे भी इस्लाम की बढ़त को रोक नहीं पाए।

यूरोपीय पुनर्जागरण के पश्चात यूरोप का उत्थान हुआ और धीरे-धीरे प्रत्येक महाद्वीप पर ईसाई झंडे दिखाई देने लगे और धीरे-धीरे इस्लामी साम्राज्य सिकुड़ने लगा और उसका स्थान इसाई लोगों ने ले लिया जो उपनिवेशवाद व साम्राज्य वाद के साथ-साथ नई तकनीक व नई सामाजिक प्रगतिशीलता से लैस थे। विश्वयुद्धों के बाद शक्ति संतुलन अमेरिका के पक्ष में झुक गया हालाँकि नास्तिक ईसाईयों का देश सोवियत संघ उसको बैलेंस करता था। फिर भी ईसाईयों का रुतबा बहुत बड़ा था।

…तेल व गैस के अपने संसाधनों के बूते मुस्लिम विश्व खाड़ी के देशों के नेतृत्व में फिर से उठ रहा था। केंद्रीय स्थान पाने का प्रयास कर रहा था। पाकिस्तान के एटॉमिक बम व अमेरिकी विरोध में ईरान की सफल ईरानी क्रांति ने मुसलमानों को नए पंख लगा दिए थे। उनमें से वहाबियों जैसे कुछ तबके मुस्लिम पुनरुत्थानवाद के वाहक बन के उभर रहे थे और एक बार फिर पूरी दुनिया को इस्लाम मे दीक्षित करने की उनकी पुरानी आकांक्षा हिलोरें मारने लगी थी।

ये मुस्लिम अमेरिका व यूरोप के लोगों से नफ़रत रख रहे थे क्योंकि उन्होंने तकनीक के बल पर इस्लाम की पवित्र भूमि को कथित रूप से आक्रांत कर रखा था। इन लोगों ने दुनिया मे पेट्रो डॉलर के बूते अखिल इस्लाम वाद का प्रसार शुरू किया। अलकायदा बनाया 9/11 किया और उसके बाद दुनिया पूरी तरह से बदल गयी। फिर हुआ आईएसआईएस और अफ्रीका व एशिया के ऐसे दर्जनों गुट जो आईएसआईएस के क्लोन हैं। इन चीजों व इस मनोवृत्ति ने इस्लाम के प्रति दुनिया भर में भय, जुगुप्सा जैसी कई तरह की भावनाएं पैदा कीं जिसे इस्लामोफोबिया का नाम दिया गया।

दुनिया भर में मुसलमानों के खिलाफ घृणा व भय का वातावरण अब एक सामान्य घटना है। अमेरिका जैसी सुपर पॉवर के राष्ट्रपति ट्रम्प जब बयान देते हैं कि पश्चिम व मुसलमान साथ साथ नहीं रह सकते तो स्थिति की गंभीरता समझ में आती है।

भारत में मुस्लिम विरोध के सबसे बड़े प्रतीक को जब भारत के लिए अपरिहार्य बता कर पेश किया जाता है और चुनावी राजनीति उनको अविजित योद्धा बना देती है तो पता चलता है कि इस्लामवाद का भय कितना गहरे तक पैठ चुका है। यही नही स्वतंत्रता, समानता व बंधुत्व को अपने सामाजिक पैटर्न में एकीकृत कर चुके यूरोपीय देशों में जब इस्लामोफोबिया घर बना लेता है और वहाँ भी तमाम देशों में दक्षिणपंथी सरकारें आ जाती हैं तो लगने लगता है कि अब यह एक वैश्विक हकीकत है और शायद सबसे डिसाइडिंग पॉलिटिकल फिनॉमिना भी।

इन सबके मूल में क्या है, कौन सा विचार या मताग्रह हावी है, कोई ठोस चीज है भी या फिर केवल और केवल यहूदी व अमेरिकी प्रोपेगैंडा है?

विपिन चंद्र पाल

सैमुअल हटिंगटन के सभ्यताओं के संघर्ष वाले फार्मूले से भी पहले भारत में विपिन चंद्र पाल ने इस्लाम, हिन्दू व ईसाइयत के संभावित टक्कर की बात की थी। वस्तुतः दुनिया के गैर इस्लामी लोग अपने को अधिक प्रगतिशील ताकत मानते हैं और एक 1400 साल पुरानी पुस्तक में किसी भी संशोधन से इनकार कर रही आक्रामक कौम से ये लोग आशंकित हैं। इस्लामोफोबिया के मूल में यही मूल भावना है।

जैसा कि कुछ मुस्लिम विद्वान कहते हैं। वस्तुतः इस्लाम पैगंबर मुहम्मद को आखिरी पैगंबर और इस्लाम को आखिरी और इकलौता सही धर्म बताता है जो इंसान को ईश्वर तक ले जाता है। इस्लाम को न मानने वालों को काफिर और भटका हुआ मानने की अवधारणा, मुसलमानों को खुद को औरों से बेहतर मानने की वजह दे देती है। यहीं से असंतोष और हिंसा का रास्ता खुलता है और हिंसा से डर का। इस्लाम को इकलौता सच्चा धर्म मानने के साथ-साथ यह भी माना गया है कि एक दिन यह पूरी दुनिया में फैल जाएगा और सभी काफिर घुटने टेक देंगे। इस बात को मुसलमान अपने पक्ष में देखते हैं और गैर-मुसलमान अपने खिलाफ। इस विचार को जहां भी ज़ोर देकर सामने रखा जाता है या इस पर अमल किया जाता है हिंसा के लिए ज़रूरी परिस्थितियां पैदा होने में देर नहीं लगती…और दुर्भाग्य से इस्लाम के उदय के बाद से ही हिंसा की यह परिस्थितियां कहीं न कहीं बनी रही हैं।

इस्लामोफोबिया की समकालीन परिस्थितियां 1979 की ईरानी इस्लामी क्रांति से शुरू हुईं और इसमें आग में घी डालने का काम अफगानिस्तान में सोवियत हस्तक्षेप ने किया। दोनों जगहों पर अमेरिकी प्रतिक्रिया ने इस्लामी प्रतिक्रिया को बढ़ाने में कारक व उत्प्रेरक दोनों की भूमिका निभाई। ईरान की इस्लामी क्रांति वस्तुतः एक शिया क्रांति थी जिसने मध्य पूर्व में बहुत हलचल पैदा की और मुस्लिम समुदाय के भीतर एक विश्वास पैदा हुआ कि हम एक महाशक्ति के खिलाफ खड़े हो सकते हैं।

ईरान की प्रतिक्रिया में सऊदी अरब और उसके साथी सुन्नी देशों में दुनिया भर में वहाबी कट्टरता को फैलाने का मिशन अपना लिया ताकि मुस्लिम जगत की कमान सऊदी अरब के ही पास रहे। अफगानिस्तान से कम्युनिस्ट शासकों व सोवियत सेना के खिलाफ जिस मुजाहिदीन का गठन किया गया उसने न केवल एक और महाशक्ति सोवियत यूनियन को शिकस्त दी बल्कि अब तो वे पूरे दुनिया में जिहाद का सपना देखने लगे क्योंकि अब तो उन्होंने अमेरिका व सोवियत यूनियन दोनों को देख लिया था।

इसी दौरान तालिबान, अल कायदा जैसे आतंकी गुट बने और 9/11 ने तो दुनिया ही बदल दी। वैश्विक आतंकवाद, विस्थापन आदि का एक नया दौर शुरू हुआ। अफगानिस्तान, सीरिया, फिलिस्तीन, लेबनान, यमन, इराक, ट्यूनीशिया, लीबिया जैसी जगहों से भारी संख्या में मुस्लिम शरणार्थी पैदा हुए जिनने उदार अप्रवासी नीति वाले यूरोपीय देशों की तरफ रुख किया। इन शरणार्थियों मे बड़ी संख्या में कट्टरपंथी भी थे जिन्होंने शरण देने वालों देशों में भी जिहाद व अखिल इस्लामी रायता फैलाना शुरू कर दिया।

यही नहीं वे जो अपने मूल देशों में करते थे (आत्मघाती हमले वगैरह) वही इन शांत देशों में भी आज़माने लगे। इससे इन देशों व पूरी दुनिया को यह यकीन होने लगा कि मुस्लिम लोग मिल जुल कर रहने में यकीन नही रख सकते क्योंकि काफिरों के अंत और आखिरी आदमी को मुसलमान बनाने की लड़ाई के प्रति वे कटिबद्ध हैं।…इस भावना को वहाबी कट्टरवाद से खाद पानी भी मिलती रही, जबकि सच यह था कि पूरी मुस्लिम जनसंख्या का 5प्रतिशत भी ये वहाबी नहीं थे पर थे साधन संपन्न थे। सऊदी, कतर जैसे देशों ने 500 अरब डॉलर प्रतिवर्ष से अधिक धन मुस्लिम कट्टरपंथ के प्रसार में झोंक रखा है। तुर्की, ईरान, पाकिस्तान की सेनाएँ ऐसे लोगों की मदद करती हैं और प्रशिक्षित भी करती हैं।

भारत में इस्लामोफोबिया तो अपने सबसे वृहद व विकट रूप में है क्योंकि यह विश्व का एकमात्र देश है जो इस्लाम के अनुयायियों ने विभाजित करके एक अलग इस्लामी देश (पाकिस्तान) बनाया था और इस विभाजन के दौरान भारतीय उपमहाद्वीप के एक टुकड़े को विवादित ही छोड़ दिया गया (कश्मीर)….और अंततः स्वतंत्रता कामी उसके शासक को पाकिस्तानी आक्रमण से अपनी रक्षा हेतु भारत के साथ विलय करना पड़ा ….. किंतु जो भारत व पाकिस्तान दोनों के लिए आँख का बाल हो चुका है।

ऊपर से इस विभाजन ने भारत के हिंदुओं में एक स्थायी टीस पैदा कर दी कि मुस्लिम कौम पहले तो एक हज़ार सालों तक हिंदुओं पर (बेरहम) शासन करने फिर इस महान देश का विभाजन करा देने की जिम्मेदार (व अपराधी) कौम है। हालाँकि ये हिन्दू अपनी मूर्ख मासूमियत में यह भूल जाते हैं कि यदि मुस्लिम कट्टरपंथी अलगाववाद का शिगूफा छोड़ा था तो कट्टरपंथी हिन्दू संगठन भी अपने धतकरम से उन शिगूफों को प्रमाण में बदलने के बराबर दोषी थे।

प्रतीकात्मक फोटो

रही बात उनके शासन की तो 1000 साल के इस शासन के बावजूद हिन्दू बहुसंख्यक ही बने रहे और इस पूरे काल के दौरान भारत दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था (चीन के साथ) बना रहा तो उनका शासन इतना अराजक नही था जितना 200 साल शासक रहे अंग्रेजों का… यह सच है कि मुस्लिम दुनिया भर में सबसे तेज गति से अपनी जनसंख्या बढ़ा रहे हैं पर इसका कारण उनकी धार्मिक जाहिलियत है न कि चार बीवियाँ (यह मूर्ख तर्क इनको पता नही कौन कम अक्ल पकड़ा दिया है)…भारत को धर्मनिरपेक्ष देश बनाने का फैसला भारत के लिए वरदान था क्योंकि पाकिस्तान व अफगानिस्तान की गति आप लोग देख ही रहे हैं।

प्रतीकात्मक फोटो

ऐसे में हिन्दू व मुस्लिम दोनों तरह के कट्टरपंथी लोगों से कहना चाहता हूँ कि इस देश से 15-20 करोड़ मुसलमानों को कहीं भगाया नही जा सकता है और जब 1000 साल के मुस्लिम शासन में भारत दार उल इस्लाम नही बना तो अगले 2000 साल तक भी नही बनेगा और न ही उसके आगे भी। तो समझदारी इसे में है कि दोनों कौमें एक साथ रहने और अपनी साझी विरासत को आगे बढ़ाने व भारत को एक विविधता पूर्ण महान देश व महाशक्ति बनाने के उपक्रम में लगें। मुसंघी व संघी दोनों इस्लामोफोबिया से अपने को अलग करें तभी उनकी आने वाली नस्लें शांतिपूर्ण व समृद्ध जीवन जी सकेंगी।

इसके लिए आवश्यक होगा कि मुस्लिमों के बीच से ही ऐसा प्रगतिशील आंदोलन फूटे जो पूरी दुनिया की आशंकाओं को समझ कर उसका निवारण करे। संवाद के सेतु बनाये। ऐसे छिट पुट प्रयास तो शुरू हो चुके हैं पर आवश्यकता होगी मार्टिन लूथर जैसे किसी बड़े सुधारक की जो मुसलमान आबादी को नई शताब्दी की जरूरतों के मुताबिक़ ढालने में मददगार हो सके।

(लेखक समसमायिक मामलों के जानकार हैं।)