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अटल सरकार भी नहीं जोड़ सकी देश की नदियां, अब मोदी के सामने चैलेंज

एजेंसी/ ken-betwaनई दिल्ली। नदियों को जोड़ने की परियोजना कोई नई नहीं है.. सबसे पहले यह विचार 158 साल पहले एक अंग्रेज आर्थर थॉमस कार्टन ने रखा था। समय गुजरने के साथ इन डेढ़ सौ वर्षों में भी नदियों को आपस में जोड़ने की अवधारणा सिरे नहीं चढ़ सकी। अटल बिहारी वाजपेयी के समय भी नदी जोड़ो परियोजना पर जोरशोर से पहल की गई लेकिन यह तब भी अमल में नहीं आ सकी। नरेंद्र मोदी सरकार के दौरान भी इस दिशा में प्रयास हुए हैं लेकिन इस दिशा में ठोस प्रगति नहीं दिखाई दे रही है।

जल संसाधन एवं नदी विकास मंत्री उमा भारती का हालांकि कहना है कि नदियों को जोड़ने की योजना पर काम हो रहा है। केन बेतवा नदी जोड़ो परियोजना पर कार्य पर्यावरण मंजूरी के स्तर पर है। साथ ही अन्य नदियों को जोड़ने की 30 परियोजनाओं पर विचार विमर्श चल रहा है क्योंकि हम राज्यों के साथ आमसहमति के आधार पर काम को आगे बढ़ाने के पक्षकार हैं। इनोवेटिव इंडिया फाउंडेशन के सुधीर जैन ने बताया कि 1858 में सर आर्थर थॉमस कार्टन ने विदेशी माल ढुलाई का खर्च कम करने के लिए दक्षिण भारत की नदियों को जोड़ने का सुझव दिया था। इसके बाद, सन 1972 में डॉ. के एल राव ने गंगा और कावेरी नदी को जोड़ने का सुझाव दिया। लगभग 30 सालों तक प्रस्ताव विचार एवं परीक्षण के दौर से गुजरा और अंतत: आर्थिक तथा तकनीकी आधार पर अनुपयुक्त होने के कारण खारिज हुआ।

साल 1982 में नेशनल वाटर डेवलपमेंट एजेंसी (एनडब्ल्यूडीए) का गठन हुआ। इस एजेंसी ने नदी जोड़ योजना के प्रस्ताव में नौकायन और सिंचाई इत्यादि घटकों को सम्मिलित कर पुनः प्रस्ताव तैयार किया। उस प्रस्ताव पर हाशिम कमीशन के प्रश्नचिन्ह लगाने के कारण मामला एक बार फिर ठंडे बस्ते में चला गया।

इसके बाद 2002 में जनहित याचिका दायर हुई। उस पर उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए सुझाव के अनुसार एनडब्ल्यूडीए ने देश की 37 प्रमुख नदियों को जोड़ने का प्रस्ताव तैयार किया। अनुमान लगाया गया है कि नदी जोड़ों योजना के पूरा होने पर 25.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र (17 लाख हेक्टेयर हिमालय क्षेत्र में और 8.5 लाख हेक्टेयर दक्षिण भारत में) में सूखे का असर कम होगा। बहरहाल, मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा, ‘नदियों को आपस में जोड़ने के विषय पर 8 फरवरी को एक उच्च स्तरीय बैठक बुलाई गई थी जिसमें इसके विभिन्न आयामों एवं इस दिशा में हुए काम की प्रगति पर विचार किया गया।

इसके तहत दमन गंगा पिंजाल लिंक नहर के साथ ही ताप्ती नर्मदा लिंक नहर पर भी काम को आगे बढाया गया है। इसके साथ ही पंचेश्वर सारदा लिंक नहर पर भी काम किया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि केन बेतवा नदी जोड़ो परियोजना को पहले सिंतबर तक शुरू होना था लेकिन पर्यावरण एवं वन मंजूरी के विषय को लेकर इसकी अवधि को बढ़ा कर दिसंबर कर दिया गया हालांकि अभी तक यह शुरू नहीं हो पाई है।

दमन गंगा पिंजाल लिंक नहर के साथ ताप्ती नर्मदा लिंक नहर की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार हो गयी है और इसे गुजरात और महाराष्ट्र सरकारों को भेजा जा चुका है लेकिन अभी तक इसे अंतिम रूप नहीं दिया जा सका है। साउथ कोयल सुवर्णरेखा एवं शंख साउथकोयल लिंक नहर परियोजना को लेकर ओडिशा सरकार की कुछ आपत्तियां हैं। इसी तरह से शंकोष महानदी लिंक, शंकोष तीस्ता गंगा, गंगा दामोदर सुवर्णरेखा, सुवर्णरेखा महानदी लिंक को लेकर भी संबंधित राज्यों से इसे आगे बढ़ाने का आग्रह किया गया और सुझाव मांगे गए हैं।

इस योजना से काफी मात्रा में बिजली पैदा होने का अनुमान व्यक्त किया गया है। इसमें तीन स्थानों ‘गंगा – सुवर्णरेखा जलमार्ग, सुवर्णरेखा – महानदी जल मार्ग और गोदावरी – कृष्णा जलमार्ग पर भंडारण जलाशयों बांध के बनने के बाद बाढ़ की विभीषिका घटेगी। हिमालय और ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र की बाढ़ की विभीषिका में 20 से 30 प्रतिशत की कमी आएगी।

नदी जोड़ो योजना को तीन अलग-अलग कालखण्डों में प्रस्तावित किया गया है। पहला प्रस्ताव सन 1858 में सामने आया था। उसका उद्देश्य दक्षिण भारत की नदियों द्वारा विदेशी माल की किफायती ढुलाई था और तब कावेरी विवाद का अस्तित्व नहीं था एवं दक्षिण भारत की नदियों में पर्याप्त जल प्रवाह था। दूसरा प्रस्ताव कावेरी नदी जल विवाद अभिकरण के गठन के 18 साल बाद सन 1972 में सामने आया। उसका संबंध, मुख्य रूप से कावेरी जल विवाद को समाप्त करना था। अधिकांश नदियां बारहमासी थीं।

नदी जोड़ो संबंधी तीसरा प्रस्ताव सन 2005 में आया। इस समय तक पानी की कमी और सूखा संभावित इलाकों की समस्याएं दस्तक देने लगी थीं। 2005 से 2014 तक का समय योजना विचार विमर्श के दौर में गुजर गया। इस अवधि में देश के दस राज्यों के सूखा सम्भावित जिलों में स्थिति गम्भीर हो गई।

नदियों को कृत्रिम रूप से जोड़ने के महाप्रयोग के तहत केंद्र सरकार ने केन बेतवा परियोजना, दमनगंगा पिंजाल, पार तापी नर्मदा लिंक नहर समेत 35 परियोजनाओं को आगे बढ़ाने की पहल की गई है।

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