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आबोहवा में जहर घोल रहे ‘नेता’: मायावती

BSP-Supremo-Mayawati-4लखनऊ। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की अध्यक्ष मायावती अपनी चुनावी सभाओं में कह रही हैं कि नरेंद्र मोदी यदि प्रधानमंत्री बने तो देश में तबाही आ जाएगी। दूसरी ओर मोदी के खास सिपहसालार अमित शाह ‘बदला लेने’ जैसा विवादित बयान दे चुके हैं। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की ओर इशारा कर कहती हैं कि मौत के सौदागर देश में जहर की खेती करना चाहते हैं। वहीं माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) महासचिव प्रकाश करात मोदी के प्रधानमंत्री बनने को लोकतंत्र के लिए त्रासदी बता चुके हैं। समाजवादी पार्टी (सपा) भी सियासी शब्दबाण छोड़ने में पीछे नहीं है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भाजपा पर केंद्र की सत्ता में आने के लिए सांप्रदायिकता की राजनीति करने का आरोप लगाने के साथ आशंका जता रहे हैं कि भाजपा देश खासकर उत्तर प्रदेश के माहौल को बिगाड़ सकती है। वह मुजफ्फरनगर में दंगों के लिए भी भाजपा पर आरोप लगा रहे हैं  तो उनके मंत्री आजम खां भी पीछे नहीं हैं। एक कदम आगे चलकर वह कारगिल की पहाड़ियों को हिन्दू नहीं  बल्कि मुसलमान सैनिकों द्वारा जीतने की बात कह चुके हैं। बाद में जब मामला गरमाया तो अपने ही बयान से मुकर गए। सियासी जीत के लिए शब्द बाण छोड़ने में राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ंिसंधिया से लेकर सहारनपुर के कांग्रेस प्रत्याशी इमरान मसूद तक शामिल हैं  जिनके हाथों में तलवार भले ही नहीं हो  लेकिन जुबान में पेट्रोल जरूर भरा नजर आ रहा है। वसुंधरा ने तो यहां तक कह दिया कि चुनाव खत्म होने दें  देखते हैं किसके टुकड़े होते हैं। वामपंथी दल पहले ही आशंका जता चुके हैं कि संघ और भाजपा के लोग सत्ता हासिल करने के लिए देश को साम्प्रदायिकता की आग में झोंक सकते हैं। सियासत में आरोप-प्रत्यारोप नई बात नहीं है  लेकिन संसद के गलियारों में एक-दूसरे से गलबहियां करने वाले नेता चुनाव आते ही जैसे एक-दूसरे के खिलाफ जहर उगल रहे हैं  उससे सियासत और जहरीली होती नजर आ रही है। कहते हैं शब्दों की मार सबसे ज्यादा घातक होती है। बात के जरिये ही व्यक्ति सम्मान पाता है और वाणी की वजह से अपमानित भी होता है। 16वीं लोकसभा में पहुंचने के लिए छिड़ी लड़ाई जिस तरीके से पहले आपसी ‘तू तू-मैं मैं’ के बाद अब विवादित और भड़काऊ बयानों पर आ गई है  बुद्धिजीवियों के मुताबिक वह लोकतंत्र के हित में नहीं है।

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