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कई राजनैतिक दलों की खड़ी फसल काट ले गया मुजफ्फरनगर दंगा

newslogoमुजफ्फरनगर। उत्तर प्रदेश के पश्चिमी अंचल में स्थित मुजफ्फरनगर जिले में हुई साप्रदायिक हिंसा में कई लोगों की जानें गयीं और लाखों के माल का नुकसान हुआ। इस सबसे ऊपर दो सप्रदायों के बीच विश्वास और सौहार्द का वातावरण भी साप्रदायिक हिंसा की आग में झुलस गया। इस दंगे के पीछे कोई भाजपा को गुनहगार मान रहा है तो कोई सपा को। 22 लोकसभा सीटों वाले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस दंगे से यदि किसी दल को सबसे अधिक नुकसान हुआ है तो वह है उप्र में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी को। जिसे यह दंभ है कि वह ही मुसलमानों की सच्ची और एकमात्र रहनुमा है। इसके अलावा भी कई राजनीतिक दल ऐसे हैं जिनकी खड़ी फसल को मुजफ्फरनगर दंगों की आड़ में कोई और काट ले गया।
मुजफ्फरनगर दंगों से पश्चिमी उप्र में मुस्लिम-जाट गठजोड़ टूट गया है। इस गठजोड़ के टूटने से कई राजनीतिक दलों के सियासी सपने भी बिखर गये हैं। समाजवादी पार्टी को तो अब इसका अहसास होने भी शुरू हो गया है क्यों कि दंगे के बाद एक-एक करके उससे जुड़े जाट नेताओं में पार्टी से किनारा करने की होड़ मच गयी है। वहीं सपा से जुड़े इस अंचल के मुस्लिम नेताओं को भी अब इस दल में अपना राजनीतिक भविष्य अंधकार में दिख रहा है। वहीं सपा के बाद यदि किसी दूसरे राजनीतिक दल पर सबसे ज्यादा संकट है तो वह है राष्ट्रीय लोकदल। रालोद का पश्चिमी उप्र के अलावा शेष उप्र तो क्या देश में अन्य कहीं भी कोई अस्तित्व नहीं है। जाट-गूर्जर, राजपूत और मुस्लिमों का गठजोड़ के बल पर ही किसान नेता चौधरी चरण सिंह निर्विवाद नेता बनकर उभरे थे। लेकिन अब उन्हें के पुत्र एवं केन्द्रीय मंत्री चौधरी अजित सिंह के सामने जो चुनौती आ खड़ी हुई है, ऐसी तो कभी उन्होंने सोची भी नहीं होगी। इस बार उनका पृथक हरित प्रदेश का चुनावी मंत्र भी शायद ही काम आये।
अब जरा पश्चिमी उप्र की राजनीतिक दलों की 2009 के लोकसभा चुनाव में रही स्थिति पर नजर डालते हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में यहां सबसे ज्यादा सात सीटें जीतकर बहुजन समाज पार्टी नम्बर वन की स्थिति में थी। जबकि रालोद व भाजपा की चार-चार सीटें आयी थीं और कांग्रेस को दो ही सीटों से संतोष करना पड़ा था। 2012 के विधानसभा चुनाव में भी सपा को पश्चिमी उप्र से दो दर्जन से अधिक सीटें जीती थीं। पश्चिमी उप्र का महत्व को समझ्ाते हुए ही सपा ने सरकार बनने पर इस अंचल को मंत्रिमण्डल में प्रमुखता दी और आजम खां, राजेन्द्र चौधरी, शाहिद मंजूर, कमाल अख्तर, रामसकल गूर्जर, चितरंजन स्वरूप, महबूब अली व राजेन्द्र सिंह राणा को मंत्री पद से नवाजा। इतना ही नहीं रालोद से नाता तोड़कर आयीं अनुराधा चौधरी, साहब सिंह सहित कई और नेताओं को राज्यमंत्री का दर्जा देकर लालबत्ती दी। लेकिन मुजफ्फरनगर दंगे ने सब किए कराये पर पानी फेर दिया।
दंगे के बाद सपा को लोकसभा चुनाव में पिछले प्रदर्शन को ही दोहराने के लाले पड़ने के आसार हैं। इसकी बानगी उस समय दिखी जब कद्दावर नेता सोमपाल शाóात ने सपा से चुनाव लड़ने से इनकार करते हुए टिकट लौटा दिया और फिर पूर्व विधायक डॉ. महक सिंह और पूर्व विधायक डॉ.अजय कुमार ने सरकार पर भेदभाव पूर्ण कार्रवाई का आरोप लगाते हुए पार्टी छोड़ने की घोषणा कर दी। वहीं सपा के मुस्लिम नेताओं का झुकाव बसपा और कांग्रेस की ओर साफ देखा जा सकता है। पश्चिमी उप्र में सपा की जो स्थिति अब है उस पर भाजपा नेत्री उमा भारती का वह कथन बिल्कुल सटीक बैठता है जो उन्होंने विधानसभा में सत्र के दौरान अपने सम्बोधन में कहा था। उमा भारती ने सपा सरकार की तुष्टिकरण की नीति आलोचना करते हुए कहा था कि ’कहीं ऐसा न हो कि दुविधा में दोनों गए, राम मिले न रहीम‘। वास्तव में सपा की स्थिति अब कमोबेश ऐसी ही दिख रही है।
वहीं बसपा के दोनों हाथों में लड्डू दिख रहे हैं। हालांकि जाट, गुर्जर और राजपूतों में उसकी उतनी पैठ नहीं है लेकिन यदि मुस्लिम मतदाताओं ने अब यदि सपा के स्थान पर बसपा का चयन किया तो उसकी लोकसभा सीटें में इजाफा हो सकता है। जबकि इस बार लोकसभा चुनाव में रालोद के लिए अपना अस्तित्व बचाने की चुनौती होगी। इसके अलावा भाजपा को ध्रुवीकरण का लाभ मिलता साफ दिख रहा है और कोई आश्चर्य नहीं होगा यदि उसकी झ्ाोली में पश्चिमी उप्र की 22 लोकसभा सीटों में से आधी यानि 11 सीटें आ जायें। उधर, कांग्रेस भी अपनी सीटों में वृद्धि कर सकती है।

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