अद्धयात्मदस्तक-विशेषफीचर्ड

चमत्कार और आनंद बाहर नहीं, हमारे भीतर ही हैं…..

rupanadशंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का पावन संदेश

भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म के मूल श्रोत वेद तथा इतिहास और पुराणों में श्रद्धा का अत्यंत महत्व बताया गया हैं योगशास्त्र में लिखा है – श्रद्धा जननीव योगिनं पाति। जिसका अर्थ है – माता जैसे शिशु का पालन करती है, वैसे ही योगी का पालन उसकी श्रद्धा करती है। भगवतगीता के अनुसार सभी मनुष्यों में श्रद्धा होती है। कहा गया है – सत्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत। श्रद्धामयोयं पुरूषो यो यच्छद्ध स एवं सः। मनुष्य का जैसा अंतकरण होता है, तदनुरूप ही उसकी श्रद्धा होती है। पुरूष श्रद्धामय है, जो जैसी श्रद्धा वाला है, वह वैसा ही है। वेदान्त ग्रंथों में बताई गई षटसम्पश्रियों में श्रद्धा भी निरूपित है। वहां श्रद्धा का लक्षण बताया गया है – गुरू वेदान्तवाक्येषु विश्वास श्रद्धा अर्थात गुरू और वेदान्त के वचनों में विश्वास ही श्रद्धा है, जो गुरू के वेदान्तानुकूल वचन हैं, उन पर विश्वास मोक्षमार्ग में सहायक है।
    कुछ लोग श्रद्धा के संबंध में भ्रम के कारण अंध श्रद्धा को ही श्रद्धा मान बैठते हैं और उसको महत्व देने लगते हैं वहीं कुछ लोग श्रद्धा को ही अंध श्रद्धा कहते हैं ओर जो प्रत्यक्ष सिद्ध है, उसी पर विश्वास आवश्यक बताते हैं किंतु अंध श्रद्धा और वास्तविक श्रद्धा में अंतर समझ्ाना आवश्यक है। जिस श्रद्धा के पीछे प्रमाण है, वह वास्तविक श्रद्धा है और जिसके पीछे प्रमाण नहीं है, वह अंध श्रद्धा है। जैसे किसी की माता ने कहा कि शक्कर कड़वी होती है। चूंकि माता ने कहा है कि शक्कर कड़वी है, इतने मात्र से यदि बेटा शक्कर की मिठास जानते हुये भी शक्कर को कड़वी मान ले तो यह प्रत्यक्ष विरुद्ध होने के कारण अंध श्रद्धा कही जाती है। किंतु धर्म और ब्रम्ह प्रत्यक्ष का विषय नहीं है। इनका ज्ञान शब्द से होता है। आप्त द्वारा उच्चरित शब्द को ही प्रमाण माना जाता है। सबसे बड़ा आप्त ईश्वर है, जिसके शब्द श्रुति स्मृति हैं। जिस विश्वास के पीछे श्रुति स्मृति का प्रमाण है, वह प्रमाणिक श्रद्धा, वास्तविक श्रद्धा है। इसके विरुद्ध जिस किसी के वचनों पर विश्वास अंध श्रद्धा है, जैसे इह वटे यक्षः। लोगों ने कहना आंरभ कर दिया है कि इस वृक्ष में यक्ष है तो लोग उसे मान बैठते हैं, जबकि इसके पीछे कोई प्रमाण नहीं।
    हमारे शास्त्र में चार पुरूषार्थों का वर्णन है – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इसमें धन को अर्थ कहा गया है और इन्द्रियों की तृप्ति को काम। इसी तरह जो परलोक में हमारी सहायता करता है, उसे धर्म कहते हैं और ब्रम्ह साक्षात्कार को मोक्ष कहा जाता है। धर्म और ब्रम्ह दोनों ही शाóेक समाधिगम्य हैं अर्थात इन दोनों का ज्ञान शाó के अतिरिव्त किसी और साधन से नहीं होता। यज्ञ करने से, माता पिता की सेवा करने से, ध्यान करने से, इन्द्रिय निग्रह रूप तपस्या आदि से स्वर्ग मिलता है। यह बातें शक्ति के अतिरिव्त किसी और साधन से नहीं जानी जा सकती हैं। इसलिए यह माना जाता है कि श्रुति, स्मृति, सदाचार और आत्मा की प्रियता ही धर्म का लक्षण है।

श्रुतिः स्मृतिः सदाचारः स्वस्थ्य प्रियमात्मनः। एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद धर्मस्य लक्षणम।

यदि हम आत्मा की प्रियता को ही धर्म मान बैठें और वह प्रियता यदि सदाचार के विपरीत है तो प्रियता धर्म नहीं हो सकती। इसी तरह सदाचार भी स्मृति और स्मृति भी श्रुति के अनुकूल होने चाहिये। धर्म के सम्बन्ध में परम प्रमाण श्रुति ही है। उसी प्रकार ब्रम्ह के सम्बन्ध में भी श्रुति ही प्रमाण है।
    यदि हम केवल अपनी प्रियता को ही धर्म समझ लें तो भूत-प्रेत पिशाचादि पर भी श्रद्धा धर्म मानी जाएगी किन्तु वह एक आसुरी सम्पदा है। आजकल आसुर श्रद्धा बढ़ रही है। लोग किसी के भी चमत्कारों से प्रभावित होकर उस पर श्रद्धा करने लग जाते हैं और वह व्यव्ति जो भी शास्त्र विरुद्ध बोलता है, उसी को धर्म मान लेते हैं। यदि उसका प्रतिवाद किया जाए तो उनका उत्तर होता है-हमने चमत्कार देखा हैं, हमारी इच्छाएं पूरी हुई हैं। इसलिये हम उसके वचन को प्रमाण मनते हैं आदि। परन्तु यह सभी विचार भ्रामक हैं।
    वस्तुतः चमत्कार और आनंद बाहर नहीं हैं अपितु अपने भीतर ही हैं। इस बात को निम्न दृष्टांतों से समझा जा सकता है। पहले दृष्टांत को देखें- कहते हैं कि व्यव्ति वन में ्रमण करते हुए थक गया तो एक छायादार पेड़ के नीचे बैठा। वहां उसे प्यास लगी। प्यास लगने पर उसके मन में इच्छा जागी कि ठंडा पानी मिल जाता तो अच्छा होता। इसे चमत्कार ही कहना होगा कि उसके ऐसा सोचते ही ठंडा पानी आ गया। फिर उसे भूख लगी। जैसे ही उसने इच्छा की कि भोजन मिल जाए तो भोजन मिल गया। भोजन ग्रहण करते ही आलस आने लगा तो मन में अगली इच्छा जागृत हुई कि बिस्तर मिल जाए तो विश्राम कर लूं। बिस्तर भी आ गया। ऐसा सुन्दर बिस्तर कि लेटते ही नींद आ गई। संध्या का समय हो गया। नींद खुली तो अंधकार छा रहा था। यह देख उसने सोचा घोर जंगल है, कहीं अंधेरे में सिंह न आ जाए। सोचते ही सिंह आ गया। सिंह को देखकर सोचने लगा कि यह कहीं हमें खा न ले। इतना सोचते ही सिंह ने उसे खा लिया। कारण यह था कि जिस वृक्ष के नीचे वह थकने पर आकर बैठा था, वह कल्प वृक्ष था। कल्पवृक्ष के नीचे बैठकर जो भी संकल्प लिया जाता है, वह पूर्ण होता है। इसीलिए वह जो-जो भी सोचता था, वह तत्काल पूर्ण होता था। वस्तुत वह कल्पवृक्ष हमारी अंतरात्मा ही है। हमारी इच्छाओं की पूर्ति अपने संकल्प से होती है। नासमझी से उसको हम किसी व्यव्ति पर आरोपित कर देते हैं। बाहरी व्यव्ति तभी हमारे लिये चमत्कारी सिद्ध होता है, जब हमारा उससे संबंध जुड़ जाता है। ठीक उसी तरह जैसे आनंद की उपलब्धि अन्तकरण की एकाग्रता और पवित्रता से होती है किन्तु हम उसे विषयों पर आरोपित कर देते हैं। इसकी प्रक्रिया यूं है – जब हमारे मन में किसी विषय को प्राप्त करने की इच्छा होती है तो वह इच्छा जब तक पूर्ण न हो जाए, मन में कांटे जैसी चुभती है। जैसे-जैसे वह गहरी होती है, दूसरी इच्छाओं को दबा देती है। पूर्व पुण्यों के फलस्वरूप जब इच्छित विषय प्राप्त होते हैं तो हमारी वह इच्छा समाप्त हो जाती है और मन में प्रसन्नता से सात्विकता आ जाती है। इच्छा के पूर्ण होने से मन अगली इच्छा के उदित होने के पूर्व तक निसंकल्प हो जाता है। इस अंतराल में स्वच्छ अन्तकरण में परमानंद स्वरूप आत्मा का प्रतिबिम्ब पड़ता है। उसको देखकर सुख की अनुभूति होती है। हम उस सुख का कारण विषय को मान बैठते हैं। यदि उस विषय में सुख होता तो बाद में भी उसकी सन्निधि से आनंद मिलना चाहिए था, परन्तु वैसा फिर अनुभूत नहीं होता।
     दूसरा दृष्टांत है कि कोई एक किसान खेत में काम कर रहा था। श्रान्त होकर समीप के एक सरोवर में स्नान करने लगा। सरोवर अत्यंत स्वच्छ था। उसका जल पारदर्शी था। किसान ने देखा कि सरोवर के भीतर एक मणि चमक रही है। उसने बार-बार गोता लगाकर उस मणि को पकड़ना चाहा पर मणि उसके हाथ न आई। निराश होकर वह सरोवर के बाहर खड़ा हुआ। इतने में एक महात्मा आए। उन्होंने उसकी उदासी का कारण पूछा। उसने कहा कि सरोवर में मणि दिखती है पर बार-बार गोता लगाने पर भी हाथ में कंकड़ पत्थर ही आते हैं मणि नहीं। महात्मा ने कहा जैसा हम कहते हैं, वैसा करो तो मणि मिल सकती है। मणि के लिये तुम सरोवर के तट के इस पेड़ पर चढ़ो और फिर उस डाली पर बढ़ो, जो सरोवर की ओर गई है। किसान ने वैसा ही किया। डाली के अग्र भाग में चील का एक घोंसला था, जिसमें मणि रखी थी। उसे मणि मिल गई।
    दृष्टांत यह है कि सरोवर एक विषय है। आत्मा मणि है। विषय सरोवर में आत्मा मणि की छाया दिखाई देती है। जिसे पाने के लिये व्यव्ति आतुर है। विषय सरोवर में कोई चाहे कितना भी गोते लगाए आत्मामणि अर्थात आत्मा का आनंद अनुपलब्ध ही रहता है। एतावदा यह सिद्ध हो गया कि आनन्द का श्रोत हमारे भीतर है, जिसको हम विषयों में आनंद आरोपित कर देते हैं।
    इसलिये यह बात ्रम सिद्ध है कि विषयों में आनंद है। वस्तुतः आनन्द अपने भीतर है। उसी प्रकार चमत्कार भी अपने भीतर है। देखा जाए तो किसी के भी माध्यम से चमत्कार का अनुभव तभी हाता है जब हम उससे सम्बन्ध जोड़ते हैं। सम्बन्ध के बिना किसी की भी कृपा का अनुभव नहीं होगा। इसलिये यह सिद्ध होता है, जिससे सम्बन्ध से कृपा का अनुभव हुआ और हमारी इच्छा पूरी हुई वह आत्मा ही उसका केन्द्र है।
    हमें मिथ्या चमत्कारों के चक्कर में न पड़कर धर्माचरण से, निष्काम कर्मयोग से, ईश्वर की निष्काम भव्ति से, सत्संग से, आहार-बिहार की शुद्धि से, मन को ही परिमार्जित करना चाहिये। यही सात्विक श्रद्धा है और यही मानव मात्र के लिए कल्याणकारी है।

 

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