दस्तक-विशेष

चुनावी अखाड़े में नेता ईजाद कर रहे नए-नए शब्द

polपटना। लोकसभा चुनाव के मद्देनजर शहर की चौड़ी सड़कों से लेकर गांवों की पगडंडियों पर चलते हुए नेता सुबह से शाम तक वोट मांगते घूम रहे हैं। राजनीतिक दल एक-दूसरे की आलोचनाओं के साथ व्यंग्यबाण छोड़कर मतदाताओं को आकर्षित करने का प्रयास कर रहे हैं  जिससे नेताओं के शब्दकोश में नए-नए शब्दों का इजाफा होता देखा जा रहा है। एक ओर जहां नेता प्रतिदिन नए शब्द गढ़ रहे हैं  वहीं तुकबंदियों के सहारे बीमारियों और समाज विज्ञान के शब्दों का भी ख्ुाल इस्तेमाल कर रहे हैं। बिहार में सत्तारूढ़ जनता दल (युनाइटेड) के नेता भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता नरेंद्र मोदी को इशारों-इशारों में ‘मिस्टर भांजु’ कह रहे हैं तो वहीं प्रदेश के विपक्ष के एक बड़े नेता के लिए ‘अफवाह मास्टर’ का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। कई राजनीतिक दल ‘मोम पुरुष’ और ‘रावणी अहंकार’ कहकर भी एक-दूसरे पर हमला कर रहे हैं। इस चुनावी समर में नेताओं पर ‘तुच्छ प्रवृत्ति’  ‘विलेन’ जैसे शब्दों का चलन आम हो गया है। वैसे चुनावी अखाड़े में ‘माल महाराज के  मिरजा खेले होली’  ‘बुरी नजर वाले  तेरा मुंह काला’  ‘मुंगेरी लाल के हसीन सपने’ जैसे मुहावरों का प्रयोग आम है  परंतु इस चुनावी मौसम में देहाती मुहावरे भी नेताओं की जुबां में चढ़े हुए हैं। बिहार में चुनाव के दौरान गंवई मुहावरों के जरिए भी विपक्षियों पर निशाना साधा जा रहा है। ‘आन्ही के आगे बेना के बतास’  चलनी के बियाह में खुरपी के गीत’ जैसे मुहावरों के जरिए भी हमले तेज किए जा रहे हैं। बक्सर संसदीय क्षेत्र में नेता प्रचार के दौरान ‘अगली भइल पिछली  पिछली परधाइन’  ‘अनकर मुड़ी बैल बराबर’  ‘आपन दिया बार के मस्जिद में दिया बारीं’ जैसे जुमले का प्रयोग कर एक-दूसरे पर व्यंग्य कस रहे हैं। चुनाव के पूर्व टिकट पाने के लिए नेताओं ने दलबदल के सारे रिकर्ड तोड़ दिए और इन दलबदलुओं के लिए भी तुकबंदी गढ़ी जा रही है। दलबदलुओं के लिए ‘कनियों के मौसी  दूल्हो के मौसी’  ‘कमाय धोती वाला खाय टोपी वाला’ जैसी उक्तियों का जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं। इस दौरान अलग-अलग बीमारियों का भी राजनीतिकरण कर दिया गया है। ‘राजनीतिक रतौंधी’  ‘राजनीतिक बधिरपन’  ‘वोकल डिहाइड्रेशन’  ‘मेंटल डायरिया’ जैसे नए शब्द भी गढ़ लिए गए हैं।

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