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जीएसटी : कमोडिटी एक्सचेंज ई-कॉमर्स नहीं…

नई दिल्ली:  वस्तु एवं सेवा कर व्यवस्था में ई-कॉमर्स की परिभाषा का दायरा इतना बड़ा है कि वह अमेजन और फ्लिपकार्ट मार्केटप्लेस प्लेटफार्म से आगे बढ़कर कमोडिटी एक्सचेंज तक को अपने दायरे में ले लेती है। एसोचैम ने यह बताते हुए सरकार से स्पष्टीकरण की मांग की है ताकि जीएसटी के लागू होने के मद्देनजर व्यापारियों में अनिश्चिता दूर हो सके। एसोचैम ने विभिन्न संबंधित मंत्रालयों को भेजे पत्र में कहा, “‘इलेक्ट्रॉनिक कॉमर्स’ शब्द का दायरा बहुत व्यापक है और केवल इलेक्ट्रॉनिक मार्केटप्लेस सेवा प्रदाताओं जैसे अमेजन और फ्लिपकार्ट तक ही सीमित नहीं है। यह उन सभी व्यवसायों को अपने दायरे में लेता है, जहां वस्तुओं/सेवाओं की आपूर्ति डिजिटल या इलेक्ट्रॉनिक नेटवर्क के माध्यम से होती है।”

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पत्र में कहा गया है कि इसके कारण ई-कॉमर्स की ‘अनियंत्रित व्याख्या’ की संभावना है, जिसके कारण फ्यूचर और कमोडिटी एक्सचेंज को इलेक्ट्रॉनिक ई-कॉमर्स के अंतर्गत रखा जा सकता है। चैंबर ने कहा, “हमारे विचार में इस तरह की व्याख्या इलेक्ट्रॉनिक वाणिज्य व्यापार के विशेष प्रावधानों के उद्देश्य के अनुरूप नहीं होगी।”

चैंबर ने ध्यान दिलाया है, “ई-कॉमर्स ऑपरेटर और कमोडिटी एक्सचेंज के बीच कानूनी और परिचालन संबंधी भेद है। कमोडिटी एक्सचेंजों को उनकी कानूनी क्षमता के मुताबिक इलेक्ट्रॉनिक कॉमर्स ऑपरेटर या आम भाषा में इलेक्ट्रॉनिक वाणिज्य ऑपरेटर नहीं माना जा सकता।”

जीएसटी को इस साल जुलाई से लागू किया जाना है। ऐसे में एसोचैम ने सरकार से इस सर्वाधिक महत्वपूर्ण कर सुधार को लागू करने से पहले ई-कॉमर्स के मुद्दे पर स्पष्टीकरण जारी करने की मांग की है। इसके साथ ही बैंकिग, दूरसंचार, बैंकिंग सेवाएं, निर्यात, रत्न और आभूषण कारोबार, एमएसएमई क्षेत्र (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग) को जीएसटी में किस श्रेणी के तहत रखा जाएगा, इसे लेकर सरकार से स्पष्टीकरण जारी करने की मांग की है।

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एसोचैम के महासचिव डी. एस. रावत ने कहा, “एसोचैम जीएसटी को निर्बाध तरीके से लागू होने की उम्मीद करता है, ताकि उपभोक्ताओं, व्यापार और उद्योगों के बीच आत्मविश्वास की भावना में वृद्धि हो और जीएसटी हमारे सुधारों का सबसे बड़ा प्रदर्शन बन सके।”

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