अद्धयात्म

तप सेवा सुमिरन का सिद्धांत

तप

Meditationतप के मायने-भूख से मरना नहीं है। तप द्वारा पांच स्तरों में से दो स्तरों (शारीरिक, इन्द्रियों) पर प्रभु की सत्ता का प्राकट्य करना है। तप से पहले यह जानना है कि भोजन से वजन है शक्ति नहीं, दवाइयों से कुछ समय के लिए रोगों को दबाया जा सकता है, लेकिन रोगों को मिटाया नहीं जा सकता। 

जब साधक यह जान जाता है तो उसके अंदर तप के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न होती है। जिज्ञासा उत्पन्न होते ही भगवान या तो स्वत: उसके जीवन में आते हैं या किसी को भेजते हैं। यह वह वैज्ञानिक प्रणाली है जिसके द्वारा दो स्तरों की सफाई होकर शरीर रोग मुक्त होता है और इंद्रियों के स्तर पर सत्य का प्राक्ट्य होता है।

जो तप करै कुमारि तुम्हारी
भाविउ मेटि सकहिं त्रिपुरारी।।

यह उपदेश करके नारदजी ने उमाजी को तप की साधना के माध्यम से शिव की प्राप्ति कराई है। इसी तप के द्वारा नैमिषारण्य में मनु और शतरूपा को राम पुत्र के रूप में मिले हैं। लेकिन तप की साधना की कैसे जाये यह बताया गया है-

करहिं अहार शाक फल कंदा
सुमिरहि ब्रह्म सच्चिदानंदा।।

सुबह से दोपहर तक आकाश तत्व, दोपहर से पहले वायु तत्व पत्ती के रूप में फिर अग्नि तत्व फलों के रूप में एवं रात्रि में पूर्ण भोजन का प्राविधान है। सावधानी-जब व्रतों का प्राविधान हो तो अन्न, शक्कर, दूध या इससे बनी कोई चीजें, चिकनी एवं चिपकने वाली चीजें कूट्टू, सिंघाड़ा, आलू , अरबी आदि चीजों से बचना ही सच्चा व्रत है।

सेवा

यह मानसिक स्तर की साधना है। इसके तीन प्रकार हैं-दशांश चतुर्थांश, समय एक घंटा।
दशांश-इसमें हमें अपनी आमदनी का दस प्रतिशत भगवान का निकालना होता है।

दशांश इसलिए हम दस इंद्रियों से भगवान से सुख चाहते हैं।

चतुर्थांश-

इसमें हमें अपनी खुराक से एक चौथाई भाग भगवान को निकालना होता है। जो भी हम खाएं उससे पहले प्रभु का भाग निकालें। निकला हुआ भोजन एक साफ पेपर पर घर के बाहर रख दें। कौन खा रहा है, क्या हो रहा है इसके बारे में चिंतन करना हमारा काम नहीं। पांच तत्वों से शरीर की रचना हुई है, जिसमें आकाश तत्वूपवास में मिलता है, शेष चार तत्व हमें भोजन से प्राप्त होते हैं। इसलिए हमें अपनी खुराक का चौथाई भाग भगवान के लिए निकाला है। समय का एक घंटा- दिन में चैबीस घंटे होते हैं। उनमें से एक घंटा हमें निस्वार्थ भाव से सेवा के लिए निकालना है। कोई भी सेवा का चयन हम कर सकते हैं।

सुमिरन

यह बौद्धिक स्तर की साधना है। इसमें हमें प्रांरभ में बीस-बीस मिनट दिन में तीन बार आंख बंद करके बैठना है। इसकी दो बाधाएं होती हैं- लय और विक्षेप। लय अर्थात नींद आना, विक्षेप अर्थात मन का भागना। यदि हमारी तप सेवा ठीक से चलेगी, तो सुमिरन अपने आप होने लगेगा। 

-गुरु-तत्व सन्देश से साभार

तप पर अनूठा प्रयोग स्वीडन की उपवास यात्रा

सन 1954ई. में ग्यारह स्वीडनवासियों की गोथेनबर्ग से स्टाकहोम तक की लगभग 300 मील की यात्रा 10 दिन में सम्पन्न होने की घटना विश्व के समाचार पत्रों ने शीर्ष पक्तियों में प्रकाशित की। धूप और वर्षा में लगभग 30 मील प्रतिदिन पैदल चलते हुए इन व्यक्तियों ने पूरी यात्रा अवधि में लेशमात्र भोजन नहीं लिया।
सादे जल के अतिरिक्त न यात्रियों ने किसी प्रकार के अन्य पेय, रस, औषधि, टिकिया अथवा विटामिन नहीं लिये। इस उपवास-यात्रा में स्वीडन में ही नहीं वरन सारे संसार में सनसनी फैल गई। सर्वसाधरण तो क्या, चिकित्सा वैज्ञानिक भी इस तथ्य को नहीं समझ सके कि 10 दिन तक विशेषकर कठोर परिश्रम करते हुए बिना भोजन लिए कैसे यह हो सकता है।
गोथेनबर्ग-स्टाकहोम की अभियान यात्रा को अपने प्रारम्भिक काल से ही विश्वभर में अभूतपूर्व प्रसिद्धि मिली। लेकिन विश्व चेतना ऐसी बात स्वीकार नहीं कर पा रही थी। अनेक डॉक्टरों ने अपना मत प्रकट किया कि ये यात्री स्टाकहोम कभी नहीं पहुंच सकेंगे और मार्ग में दमतोड़ देंगे।
बाद में जब उन 11 यात्रियों ने विजयपूर्वक स्टॉक होम में प्रवेश किया तो वहां लाखों व्यक्तियों ने उनका स्वागत किया। यात्रा समाप्त होने के तुरंत बाद डॉक्टरी परीक्षण तथा उसके कुछ सप्ताह व कुछ महीनों बाद के परीक्षणों में किसी भी हानि के लक्षण नहीं पाए गये। केवल सभी का वजन लगभग 20 पाउण्ड अर्थात प्रतिदिन दो पाउंड कम हुआ। सबसे अधिक रोचक तथ्य यह रहा कि रक्त में प्रोटीन का स्तर (सीरम अल्ब्यूमिन) सामान्य रहा। यद्यपि 10 दिन तक शरीर में कोई प्रोटीन नहीं पहुंची थी। सभी उपवासकर्ताओं ने बताया कि उपवास करने के बाद वे जीवनी शक्ति तथा कार्य क्षमता को बढ़ा हुआ अनुभव कर रहे हैं।

 

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