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नेहरू की सीट, सपा का गढ़, अब होगी योगी की असली परीक्षा

उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ और डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य MLC बन गए हैं. ऐसे में योगी की गोरखपुर और केशव मौर्य की फूलपुर लोकसभा सीट खाली हो गई है, जहां अब उपचुनाव होना है. बीजेपी के लिए इन सीटों को हर हाल में जीतने की चुनौती है, तो वहीं विपक्ष की चुनौती उपचुनाव के जरिए दोबारा से अपनी खोई हुई सियासी जमीन को वापस पाने की है.

नेहरू की विरासत

इलाहाबाद जिले की फूलपुर लोकसभा सीट कांग्रेस की विरासत वाली सीट मानी जाती है. देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू फूलपुर लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व किया करते थे. उन्होंने फूलपुर लोकसभा सीट से 1952, 1957 और 1962 में जीत हासिल और संसद पहुंचे. सियासत ने ऐसी करवट बदली कि पिछले कई दशक से फूलपुर का संसदीय चुनाव जातिगत समीकरण के जरिए तय होता आ रहा है.

मोदी लहर में बीजेपी का खुला खाता

बीजेपी पहली बार मोदी लहर में 2014 के लोकसभा चुनाव में फूलपुर सीट पर अपनी जीत का परचम लहराने में कामयाब रही है. केशव प्रसाद मौर्य बीजेपी उम्मीदवार के तौर 2014 में फूलपुर सीट से सांसद बने, लेकिन मार्च 2017 में यूपी के डिप्टी सीएम बनने का बाद उन्हें फूलपुर से इस्तीफा देना पड़ा है. ऐसे में फुलपुर सीट पर अब उपचुनाव है.

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एसपी-बीएसपी से ज्यादा बीजेपी को मिले थे मत

लोकसभा चुनाव 2014 के मिले मतों के लिहाज से देखा जाए तो कुल 9,60,341 मतों में से बीजेपी के केशव मौर्य को 5,03,564 एसपी को 1,95,256 बीएसपी को 1,63,710 और कांग्रेस को 58,127 मत मिले थे. ऐसे में तीनों पार्टियों के मतों को मिला भी दें तो बीजेपी के बराबर नहीं होता.

फूलपुर उपचुनाव एक चुनौती

फूलपुर संसदीय सीट का उपचुनाव सत्ताधारी बीजेपी और विपक्षी दलों के लिए जीतने की चुनौती है. उपचुनाव के जरिए 2019 का माहौल बनाने का काम करेगी. इसीलिए बीजेपी कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहती, उन्होंने मजबूत उम्मीदवार की तलाश भी शुरु कर दी है. दूसरी ओर बीजेपी को घेरने के लिए एसपी और बीएसपी सहित विपक्षी दल रणनीति बनाने में जुटे हैं.

योगी के दो मंत्री चाहते हैं अपनी पत्नी के लिए टिकट

सूत्रों की माने तो योगी सरकार के दो मंत्री हैं, जो फूलपुर सीट से अपनी-अपनी पत्नी के लिए टिकट की जुगत में हैं. इसमें डिप्टी CM केशव प्रसाद मौर्य चाहते हैं कि फूलपुर से वो सांसद रहे हैं ऐसे में उनकी पत्नी को टिकट मिले. दूसरे मंत्री नंदगोपाल नंदी हैं, जिनकी पत्नी इलाहाबाद की मेयर हैं. नंदी फूलपुर संसदीय सीट पर अपनी पत्नी के लिए हाथ पांव मार रहे हैं. जबकि बीजेपी आलाकमान फूलपुर से ऐसे उम्मीदवार की तलाश में है, जो विपक्ष के किले को भेदकर जीत बरकरार रख सके.

फूलपुर का जातिगत समीकरण  

फूलपुर में जातीय समीकरण काफी दिलचस्प है. इस संसदीय क्षेत्र में सबसे ज्यादा पटेल मतदाता हैं, जिनकी संख्या करीब सवा दो लाख है. मुस्लिम, यादव और कायस्थ मतदाताओं की संख्या भी इसी के आसपास है. लगभग डेढ़ लाख ब्राह्मण और एक लाख से अधिक अनुसूचित जाति के मतदाता हैं.

एसपी का मजबूत गढ़

दरअसल फूलपुर सीट पर एसपी का भी मजबूत जनाधार है. यही वजह है कि 1996 से लेकर 2004 तक समाजवादी पार्टी का उम्मीदवार लगातार जीतता रहा है. फूलपुर लोकसभा सीट से कुर्मी समाज के कई सांसद बने हैं, इनमें प्रो. बी.डी. सिंह, रामपूजन पटेल (तीन बार), जंग बहादुर पटेल (दो बार) एसपी के टिकट पर सांसद रह चुके हैं. इसके बाद एसपी ने 2004 के लोकसभा चुनाव में अतीक अहमद को फूलपुर से प्रत्याशी बनाया जो विजयी रहे, लेकिन इसके बाद 2009 के चुनाव में बीएसपी के टिकट पर पंडित कपिल मुनि करवरिया चुने गए और 2014 में केशव प्रसाद मौर्य.

कुर्मियों को वर्चस्व का संकट

कुर्मी बिरादरी के लिए यह एक बड़ा झटका था और अब उन्हें महसूस होने लगा है कि उनका फूलपुर संसदीय क्षेत्र में अब तक का वर्चस्व समाप्त होने लगा है. अपने खोये हुए वर्चस्व को पुनः प्राप्त करने के लिए इस बार कुर्मी पूरी ताकत के साथ एकजुट होने के जुगत में हैं.

जीत बरकरार रखना आसान नहीं

यूपी में बीजेपी की लहर 2014 के लोकसभा या 2017 के विधानसभा चुनाव जैसी नहीं दिख रही. ऐसे में बीजेपी को घेरने के लिए ये भी कयास लगाया जा रहा था कि एसपी और बीएसपी एक हो सकते हैं, लेकिन अभी तक इस तरह कुछ होता नजर नहीं आ रहा है. विधानसभा चुनाव के दौरान जो बीजेपी का माहौल था, वह काफी बदल चुका है. योगी के 6 महीने के कार्यकाल को देखा जाए तो उनके पास गिनाने को कुछ खास उपलब्धियां भी नहीं हैं. ऐसे में बड़ा सवाल है कि बीजेपी फूलपुर को किस तरह से बरकरार रख पाएगी.

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