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भारत की संस्कृति का मूल सन्देश- वसुधैव कुटुम्बकम्

इसी शिक्षा पर बनाया गया ‘भारतीय संविधान का अनुच्छेद 51’ ही संसार को विनाश से बचाने का एकमात्र उपाय -डॉ. जगदीश गाँधी

डॉ. जगदीश गाँधी, संस्थापक-प्रबन्धक
सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ

महान विचारक विक्टर ह्नयूगो ने कहा है कि ‘‘इस दुनियाँ में जितनी भी सैन्यशक्ति है उससे कहीं अधिक शक्तिशाली वह एक विचार होता है, जिसका कि समय आ गया हो।’’ आज जिस विचार का समय आ गया है वह विचार है भारतीय संस्कृति का आदर्श ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ तथा उसकी शिक्षाओं पर आधारित भारतीय संविधान का ‘अनुच्छेद 51’ जिसके द्वारा विश्व को तीसरे विश्व युद्ध की आशंका एवं परमाणु बमों की विभीषिका से बचाया जा सकता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 के अनुसार भारत का गणराज्यः (क) अन्तर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि करेगा (ख) राष्ट्रों के बीच न्यायसंगत और सम्मानपूर्ण संबंधों को बढ़ाने का प्रयत्न करेगा, (ग) संसार के सभी राष्ट्र अन्तर्राष्ट्रीय कानून का सम्मान करें ऐसा प्रयत्न करेगा तथा (घ) अन्तर्राष्ट्रीय विवादों का मध्यस्थता द्वारा समाधान हो, इसका प्रयत्न करेगा। प्रत्येक बालक को बाल्यावस्था से ही यह संकल्प दिलाना चाहिए कि ‘एक दिन दुनियाँ को एक करूँगा, धरती स्वर्ग बनाऊँगा और विश्व शांति का सपना एक दिन सच करके दिखलाऊँगा’। साथ ही बालक को सीख दी जानी चाहिए कि ईश्वर एक है, धर्म एक है तथा मानव जाति एक है। सभी पवित्र पुस्तकों-गीता, त्रिपटक, बाइबिल, कुरान, गुरू ग्रन्थ साहिब, किताबे-अकदस का ज्ञान क्रमशः कृष्ण, बुद्ध, ईशु, मोहम्मद, नानक तथा बहाउल्लाह के माध्यम से युग-युग की आवश्यकतानुसार सम्पूर्ण मानव जाति के मार्गदर्शन के लिये एक ही परमात्मा ने भेजा है।

एक ही परमात्मा के द्वारा भेजी गई इन पवित्र पुस्तकों गीता, त्रिपटक, बाइबिल, कुरान, गुरू ग्रन्थ साहिब, किताबे-अकदस की मूल शिक्षायें समस्त मानव जाति को मुख्यतया एकता की शिक्षा देती हैं, साथ ही गीता द्वारा न्याय, त्रिपटक द्वारा समता, बाइबिल द्वारा करूणा, कुरान द्वारा भाईचारा, गुरू ग्रन्थ साहिब द्वारा त्याग तथा किताबे-अकदस द्वारा हृदय की एकता की शिक्षायें युग-युग की सामाजिक आवश्यकताओं के अनुसार एक ही परमात्मा ने भेजी है। सभी बालकों के मस्तिष्क व हृदय में परिवार एवं स्कूली शिक्षा के द्वारा न्याय, समता, करूणा, भाईचारा, त्याग तथा हृदय की एकता के इन सभी ईश्वरीय गुणों को बाल्यावस्था से ही रोपित करना चाहिए, ताकि हर बालक पूर्णतया गुणात्मक व्यक्ति बन सके। किसी भी पूजा स्थल में की गई प्रार्थना को सुनने वाला परमात्मा एक ही है इसलिए एक ही छत के नीचे अब सब धर्मों की प्रार्थना होनी चाहिए। हमारा ‘सम्पूर्ण विश्व की एक संसद’ बनाने का सुझाव है जो कि ‘विश्व का संचालन’ सुचारू रूप से करने के लिए (1) बाध्यकारी कानून बना सकंे, और जिसके द्वारा (2) विश्व की सरकार एवं (3) विश्व न्यायालय का गठन किया जा सके। न्याय के तराजू के एक पलड़े में विश्व में भारी संख्या में निर्मित घातक परमाणु बम रखे हैं तथा दूसरे पलड़े में विश्व के दो अरब पचास करोड़ बच्चों का असुरक्षित भविष्य दाँव पर लगा है। विश्व के बच्चे सुरक्षित विश्व तथा सुरक्षित भविष्य की अपील वर्ल्ड जुडीशियरी से कर रहे हैं।  हेग, नीदरलैण्ड में इण्टरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्ट्सि का मुख्यालय स्थित है। इस अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के निर्णय किसी देश के लिए बाध्यकारी नहीं है। अतः संसार के मानव मात्र की एकता के लिए एवं विभिन्न देशों के आपसी मतभेदों का निष्पक्ष एवं सर्वमान्य समाधान करने के लिए – ‘विश्व संसद’, ‘विश्व सरकार’, बाध्यकारी कानून एवं ‘विश्व न्यायालय’ की अविलम्ब आवश्यकता है। इसके साथ ही बच्चों को एक विश्व भाषा, राष्ट्र भाषा व मातृ भाषा के साथ-साथ पढाई जानी चाहिए, और इसके अतिरिक्त उनमें स्त्री-पुरूष की समानता, धर्म और विज्ञान के सामन्जस्य, पारिवारिक एकता, सामाजिक एकता एवं विश्व एकता के विचारों का बीजारोपण किया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त सम्पूर्ण विश्व की मानव जाति व संसार को बचाने का और कोई विकल्प नहीं है।

महापुरुषों ने कहा है

1. राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने कहा है कि ‘‘भविष्य में विश्व की शांति, सुरक्षा एवं सुव्यवस्थित प्रगति के लिये विश्व के सभी राष्ट्रों के एक महासंघ की आवश्यकता है। इसके सिवाय विश्व के पास आधुनिक युग की समस्याओं को हल करने का और कोई उपाय नहीं है।’’

2. भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कहा है कि ‘‘या तो विश्व एक हो जायेगा या फिर नष्ट हो जायेगा।’’

3. भारत के राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा है कि ‘‘संसार को एक केन्द्रीय संसद की स्थापना करनी होगी जिसके आगे बल प्रयोग के सभी कारकों का समर्पण किया जायेगा और सभी स्वतंत्र राष्ट्रों को सम्पूर्ण विश्व की सुरक्षा के हित में अपनी संप्रभुता के कुछ अंश का परित्याग करना होगा।’’

4. अमेरिका राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी ने कहा है कि ‘‘हमें मानव जाति को महाविनाश से बचाने के लिए विश्वव्यापी कानून बनाना एवं इसको लागू करने वाली संस्था को स्थापित करना आवश्यक होगा और विश्व में युद्ध और हथियारों की होड़ को विधि विरूद्ध घोषित करना होगा।’’

5. इंग्लैण्ड के प्रधानमंत्री विन्सटन चर्चिल ने कहा है कि ‘‘जब तक हम विश्व सरकार का गठन नहीं कर लेते तब तक हमारे लिए संभावित तृतीय विश्व युद्ध को रोकना असम्भव है।’’

6. यू0एस0एस0आर0 के राष्ट्रपति मिखाईल गोर्बाचोव ने कहा कि ‘‘विश्व सरकार की आवश्यकता के बारे में जागरूकता तेजी से फैल रही है। एक ऐसी व्यवस्था जिसमें विश्व समुदाय के सभी सदस्य भाग लेंगे।’

इन दूरदर्शी विश्व नेताओं ने महायुद्ध रुकवाये

1. राष्ट्रपति श्री वुड्रो विल्सन ने ‘लीग ऑफ नेशन्स’ की स्थापना की:  वर्ष 1914 से 1918 में हुये, प्रथम विश्व युद्ध के समय अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति श्री वुड्रो विल्सन ने विश्व के नेताओं की एक बैठक आयोजित की, जिसके फलस्वरूप ‘लीग ऑफ नेशन्स’ की स्थापना हुई और प्रथम महायुद्ध समाप्त हुआ।

2. राष्ट्रपति श्री फ्रैन्कलिन डी. रूजवेल्ट ने ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ की स्थापना की: वर्ष 1938 से 1945 में हुये, द्वितीय विश्व युद्ध के समय अमेरिका के ही तत्कालीन राष्ट्रपति श्री फ्रैन्कलिन डी. रूजवेल्ट ने विश्व के नेताओं की एक बैठक बुलाई जिसकी वजह से 24 अक्टूबर, 1945 को ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ (यू.एन.ओ.) की स्थापना हुई। संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के समय भारत सहित विश्व के 51 देशों ने सर्वसम्मति से इसके चार्टर पर हस्ताक्षर किये इसके कारण दूसरा महायुद्ध समाप्त हुआ।

3. फ्रांस के प्रधानमंत्री श्री राबर्ट शूमेन ने ‘यूरोपीय यूनियन’ की स्थापना की: वर्ष 1950 में, फ्रांस के प्रधानमंत्री श्री राबर्ट शूमेन ने यूरोपीय देशों के नेताओं की एक बैठक बुलाने की पहल की। इस पहली बैठक में 76 यूरोपीय संसद सदस्यों ने प्रतिभाग किया जिसके परिणामस्वरूप यूरोपीय देशों ने अपनी एकता, शांति एवं समृद्धि के लिए यूरोपीय यूनियन व 28 यूरोपीय देशों की एक ‘यूरोपीय संसद’ और 18 देशों की एक ‘यूरो’ करेंसी बनाई। इसके कारण यूरोपीय युद्ध समाप्त हुआ। यदि इन महान दूरदर्शी विश्व के तीन मार्गदर्शक नेताओं ने विश्व के देशों को परस्पर नजदीक लाने व विश्व के युद्धों की भयावहता से मुक्त कराने का प्रयास न किया होता तो आज विश्व की क्या स्थिति होती? 

अब चौथे दूरदर्शी विश्व नेता की आवश्यकता 

इन तीन महापुरूषों द्वारा जब ये कदम उठाए गए थे तब की तुलना में आज विश्व के हालात कहीं अधिक भयावह व विनाशकारी है। 1938 से 1945 तक हुये द्वितीय महायुद्ध के दौरान हिरोशिमा एवं नागासाकी पर बमवर्षा के बाद से विशेषतया संसार के दो अरब पचास करोड़ बच्चों का तथा मानव जाति का भविष्य निरंतर असुरक्षित होता जा रहा है। मानवता को अब एक चौथे दूरदर्शी विश्व नेता की आवश्यकता है जो विश्व संसद, विश्व सरकार व विश्व न्यायालय का गठन करके संसार के बच्चों व मानवजाति को संभावित महाविनाश से बचा सके और धरती पर ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की स्थापना कर सके। अर्थात विश्व की एक न्यायपूर्ण व्यवस्था बनायी जा सके ताकि इसी भौतिक संसार में प्रत्येक व्यक्ति को स्वर्ग जैसा आनंद मिल सके। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ही हैं विश्व के ऐसे चौथे दूरदर्शी नेता हैं जिनके अथक प्रयास से सारी दुनिया को एकता के डोर से बाँधा जा सकता है। भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी अनेक विदेश यात्रा के दौरान दुनिया के कई देशों में न केवल ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भारतीय संस्कृति के गौरव को फिर से स्थापित किया है, बल्कि उन्होंने छोटे और बड़े देशों, ताकतवर और कमजोर देशों को भी एक समान बने रहने की बात कही है। उन्होंने समानता आधारित समाज और विश्व के दर्शन को फैलाया है। ऐसा लगता है, जैसे भारत फिर से विश्व को राजनीति और नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाला राष्ट्र बनने की ओर कदम बढ़ा रहा है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तरफ आज न सिर्फ भारत के लोग, बल्कि दुनिया के लोग भी बहुत ही आशा भरी निगाहों से देख रहे हैं। उन्होंने इन तीन सालों में कई ऐसे कार्य किए जिससे देश-दुनिया में उनकी साख बढ़ती चली गई और वे सवा सौ करोड़ लोगों की आकांक्षाओं के साथ ही दुनिया की भी उम्मीद बन गए हैं। हमें पूर्ण विश्वास है कि भारत के प्रधानमंत्री के रूप में विश्व को अपना चौथा महानतम राजनेता मिल गया है। वे ही वे चमत्कारिक व विश्व को मार्गदर्शन देने वाले चौथे दूरदर्शी नेता हैं जिनके अंदर विश्व के सभी देशों के राष्ट्राध्यक्षों की बैठक बुलाकर यूरोपीय संसद की तरह ही ‘विश्व संसद’ का गठन करने का अदम्य साहस है। वास्तव में उनके ही पास विश्व को एक करने का सपना, दृढ़ इच्छाशक्ति, विश्वास, दिव्य विचार व दूरदर्शिता हैै। इसलिए हमें पूर्ण विश्वास है कि उनके ही अथक प्रयास एवं दूरदर्शिता से विश्व के 2.5 अरब बच्चों के साथ ही आगे जन्म लेने वाली पीढ़ियों एवं विश्व की सारी मानवजाति को तृतीय विश्व युद्ध की विभीषिका से बचाने के लिए विश्व संसद, विश्व सरकार और विश्व न्यायालय का गठन किया जायेगा।

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