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मां कूष्माण्डा की साधना करने से समाप्त होते हैं शारीरिक कष्ट

दस्तक टाइम्स/एजेंसी-
maa kusmandaया देवी सर्वभू‍तेषु कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
देवी दुर्गा के चौथे स्वरूप में नवरात्र पर्व पर मां कूष्माण्डा की आराधना का विधान है। आदिशक्ति दुर्गा के कूष्माण्डा रूप में चौथा स्वरूप भक्तों को संतति सुख प्रदान करने वाला है। कहते हैं जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, तब इन्हीं देवी ने ब्रह्मांड की रचना की थी। शब्द कूष्माण्डा का संधि विच्छेद कुछ इस प्रकार है के कुसुम का अर्थ है फूलों के समान हंसी (मुस्कान) और आण्ड कर का अर्थ है ब्रहमाण्ड अर्थात वो देवी जो जिन्होंंने अपनी मंद (फूलों) सी मुस्कान से सम्पूर्ण ब्रहमाण्ड को अपने गर्भ में उत्पन्न किया है वही है मां कूष्माण्डा।
मां कूष्माण्डा की उपासना से भक्तों के समस्त रोग-शोक मिट जाते हैं। इनकी भक्ति से आयु, यश, बल और आरोग्य की वृद्धि होती है। मां कूष्माण्डा अत्यल्प सेवा और भक्ति से प्रसन्न होने वाली हैं। इनकी आराधना करने से भक्तों को तेज, ज्ञान, प्रेम, उर्जा, वर्चस्व, आयु, यश, बल, आरोग्य और संतान का सुख प्राप्त होता है । इनको साधने से भक्तों के सभी प्रकार के रोग, शोक, पीड़ा, व्याधि समाप्त होती है तथा हृदय में शुद्ध रक्त का संचार होता है। मां कूष्माण्डा की साधना या उपासना करने से शारीरिक कष्ट समाप्त होते हैं । यदि मनुष्य सच्चे हृदय से इनका शरणागत बन जाए तो फिर उसे अत्यन्त सुगमता से परम पद की प्राप्ति हो सकती है।

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