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मान-अपमान से परेसान हैं हमारे प्रधानमंत्री

GGइस बात में जरा भी दो राय नहीं हैं कि भारत के प्रधानमंत्री मान-अपमान से परेसान हैं। जब सब जगह कयास लगाये जा रहे थे कि राहुल गांधी द्वारा दागियों को बचाने वाले अध्यादेश को बकवास और फाड़कर फेंक देने योग्य कहा तब प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह न्यूयॉर्क में थे और लगा था कि वे भारत आकर अध्यादेश वापिस होते ही प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र दे देगें। पर ऐसा नहीं हुआ।

विमान पर पत्रकारों के प्रश्नों के जबाव में मनमोहन सिंह ने संकेत दे दिया था कि उन्हें सामान्यतः क्रोध नहीं आता, बात स्पष्ट थी, न क्रोध आयेगा, न आवेश बढ़ेगा, न मान-अपमान का थर्मामीटर ऊपर-नीचे होगा और सचमुच उनने त्यागपत्र नहीं दिया।
याद आता है संतों का जीवन जिन्हें क्रोध दिलाने हेतु उनपर थूका जाना और गंगा से स्नान करके लौटते समय उन पर कूड़ा डालने के प्रसंगों में संतों ने न विरोध किया, न क्रोध और पुनः स्नान करने गंगा जी गये। यह सिलसिला जब 5-6 बार हो गया फिर भी संत ने बुरा नहीं बोला तब थूकने या कूड़ा फेंकने वाला ही संत के चरणों पर गिरकर माफी मांगने लगा, उनका सच्च भक्त हो गया।
मनमोहन सिंह का संतत्व स्पष्ट है, क्योंकि अगर कोई और होता तो अध्यादेश वापिस लेकर त्यागपत्र दे देता कि एक युवक ने उसकी फजीहत करा दी वे अब प्रधानमंत्री नहीं रहना चाहते और फिर उनका वजन बढ़ता, मान-मनौब्बल चलता पर वे पहले ही से मने मनाये थे, वे तो आडवाणी जी से भी ऊंचे निकले जो बात-बात में त्यागपत्र देते हैं और बाद में मान जाते हैं। दोनों में दो फर्क है कि मनमोहन प्रधानमंत्री है और आडवाणी प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं, दूसरा मनमोहन ने क्रोध को जीत लिया, जबकि आडवाणी को जमकर क्रोध आता है।
वास्तव में मान-अपमान महूसस करने का विषय है, मनमोहन सिंह तो तब भी आवेश में नहीं आये जब पड़ोसी मुल्क के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने उन्हें ‘देहाती औरत’ कहा, वे पाकिस्तान पर तब भी क्रोधित नहीं हुये जब उसकी सेना हमारे दो जवानों के सिर काटकर ले गर्इं। मनमोहन सिंह आज भी क्रोधित नहीं कि पिछले 10 दिनों से पाकिस्तानी लोग हमारे केरन सेक्टर में बंकरों पर कब्जा किये बैठे हैं, जिसमें 15 घुसपैठिये मारे गये हमारे5 जवान घायल हैं, मुठभेड़ गुरूवार की सुबह तक जारी थी।
प्रधानमंत्री जी पाकिस्तान से एक ही जुमला बोलते हैं कि ‘वह हमारे धैर्य की परीक्षा न लें’ भगवान् जाने इनके धैर्य की परिधि कितनी विशाल है जो बार-बार कहती है ‘अब मारा तो मारा आगे मारोगे तो देख लेंगे।’
वर्तमान संदर्भ में राहुल गांधी अगर केवल अध्यादेश वापिस लेने की बात भर करते तो ठीक था, अध्यादेश वापिस हो जाता, परन्तु उनका भाव ऐसा था मानो उनके सामने प्रधानमंत्री एक मामूली प्यादा हो और हाथ जोड़कर खड़ा रहकर बोल रहा हो मेरे आका क्या हुआ है।
मनमोहन सिंह ने अध्यादेश ही नहीं शीतकालीन सत्र में इसी आशय वाले बिल को भी वापिस करने का निर्णय लेकर देशवासियों की भावनाओं के अनुरूप कार्य किया, परन्तु इतनी सहनशीलता, इतनी सहिष्णुता, इतनी शालीनता संत के लिये तो ठीक है, परन्तु प्रधानमंत्री के पद की गरिमा के अनुरूप इसलिये नहीं कि पद से चिपके रहने का मोह उन्हें स्ट्रांग प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि दब्बू बनाता है।

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