वृक्ष, वनस्पति औषधि के रूप में हमारी सेवा करते हैं

हृदयनारायण दीक्षित

स्तम्भ : भूमि और सभी प्राणी परस्पर अन्तर्सम्बन्धित हैं। यह नेह मां और पुत्र जैसा है। वैदिक साहित्य में इस सम्बंध का अनेकशः उल्लेख है। वैदिक ऋषि पृथ्वी को बार-बार नमन करते हैं। अथर्ववेद (भूमि सूक्त, 12.26 व 27) में कहते हैं, “इस भूमि की सतह पर धूलिकण हैं, शिलाखण्ड व पत्थर हैं। इसके भीतर स्वर्ण, रत्न आदि खनिज तत्व हैं। हम इस पृथ्वी को नमस्कार करते हैं। इस भूमि में वृक्ष वनस्पति स्थिर रहते हैं। वृक्ष वनस्पति औषधि रूप में हमारी सेवा करते हैं। जो पृथ्वी वनस्पति धारिणी, धर्मधारक और सबका पालन करती है, हम उसे नमन करते हैं। उसकी स्तुति करते हैं।” अथर्ववेद को अंधविश्वास से युक्त बताने वाले भूमि सूक्त का प्रत्यक्ष भौतिक दर्शन नहीं देखते।
भूमि का अंधाधुंध उत्खनन पर्यावरण विनाशी है। ऋषि कवि अथर्वा भूमि के प्रति आदरभाव के गीत गाते हैं। बार-बार उसे मां कहते हैं। ऐसे आदरभाव से युक्त अभिजन पृथ्वी को क्षति नहीं पहुंचाते। भूमि सूक्त (वही 34 व 35) में यह आदरभाव बहुत गहरे प्रकट हुआ है। कहते हैं “हे सबकी आश्रयदाता भूमि! हम दायें या बाएं करवट लेते या पैर फैलाते, पीठ के बल शयन करते हैं, आपको कष्ट न हो, आप हमसे रूष्ट न हों। कृषि कार्य सहित तमाम अवसरों पर हम आपको खोदते हैं। आपको कष्ट न हो।” इन दोनो मंत्रों में पृथ्वी जीवमान प्राणी जैसी है।
ऋग्वेद में दीर्घजीवन की अभिलाषा है। इस अभिलाषा में स्वस्थ जीवन भी जुड़ा हुआ है। रूग्ण दशा में दीर्घजीवन भार बन जाता है। ऋषि की इच्छा है कि हम दीर्घजीवन में लगातार सूर्य देखते रहें लेकिन अथर्ववेद के भूमि सूक्त में सूर्य प्रकाश के समक्ष भूमि देखते रहने की प्रीतिकर स्तुति है “हे भूमि! हम स्नेही सूर्य के समक्ष आपका विस्तार देखते रहें। आयु वृद्धि के साथ नेत्र ज्योति शिथिल न हो।” (वही 33) आयु वृद्धि में दृष्टि कमजोर होती है। ऋग्वेद के ऋषि सूर्य देखते रहने की अभिलाषा करते हैं। अथर्ववेद के ऋषि सूर्य प्रकाश में भूमि का विस्तार देखते रहने के इच्छुक हैं।
आनंद वैदिक पूर्वजों की अभिलाषा है। प्रकृति का उल्लास ऋतुओं में प्रकट होता है। भारत भूमि में प्रकृति का अंतस् 6 ऋतुओं ग्रीष्म, वर्षा, हेमंत, शिशिर, शरद् व बसंत में व्यक्त होता है – ग्रीष्मस्ते भूमे वर्षाणि, शरद, हेमंतः शिशिरो वसंतः। इन सभी ऋतुओं के दिन रात हमारे लिए आनंददाता हों।” (वही 36) ऋषि समूची पृथ्वी का स्तोता है लेकिन उसकी स्तुति का केन्द्र जम्बूद्वीप भरतखण्ड है। स्वाभाविक ही उसके सामने 6 ऋतुओं वाली भारतभूमि है। कहते हैं, “इस धरती में यज्ञ होते हैं। यज्ञ मण्डप बनते हैं। यहां ऋग्वेद, साम व यजुर्वेद के मंत्र गूंजते हैं। इसी भूमि पर प्राचीन काल में लोकमंगल के इच्छुक ऋशि तपसिद्ध वाणी द्वारा सात सत्रों वाले ज्ञान यज्ञ करते थे।” (वही 38 व 39) अथर्वा पूर्वकालीन ज्ञान यज्ञ सत्रों का उल्लेख करते हैं। यह समय अथर्ववेद के पहले का है। संभवतः अथर्ववेद के समय ऐसे सत्र नहीं हो रहे हैं। अथर्ववेद का समय तो भी उल्लास और ज्ञान से भरापूरा है। अथर्वा इस उल्लास के घटक बताते हैं, “यस्या गायन्ति नृत्यन्ति भूम्यां – इस भूमि पर गीत गाए जाते हैं, नृत्य होते हैं।” (वही 41) सामंत काल में गीत और नृत्य लोकजीवन का भाग नहीं थे। अथर्ववेद के समय गीत और नृत्य का स्थल ‘भूमि’ है, यह भूमि जन सामान्य का रंगमंच है। बताते हैं कि यहां युद्ध भी हैं और युद्ध के नगाड़े भी हैं। यह पृथ्वी हम सबको शत्रुविहीन करे।” (वही 41)
भारत भूमि प्रत्येक दृष्टि से उल्लासधर्मा है। बताते हैं “यहां प्रचुर अन्न होते हैं। यहां ‘पंच कृष्टया’ निवास करते हैं। वर्षा समयानुकूल होती है। पर्जन्य (प्राकृतिक इकोलोजिकल समूह) पोषण करते हैं। इस भूमि को नमस्कार है।” (वही 42) ऋग्वेद के समाज में मनुष्यों के बड़े समूह पांच हैं। इन्हें पंचजनाः कहा गया है और पंचकृष्टया भी। वैसे अन्य समूह भी हैं। अथर्वा ने यहां ‘पंचकृष्टया’ का ही प्रयोग किया है। अथर्ववेद के काल में यहां अनेक विश्वासों वाले लोग रहते हैं। पृथ्वी सबका पोषण करती है। विचार और विश्वास का परिपूर्ण लोकतंत्र है। भूमि सूक्त का यह मंत्र (वही 45) बहुत लोकप्रिय है, “जनं विभ्रती बहुधा विवाचसं नाना धर्माणं पृथ्वी यथौकसं – भिन्न आस्था विश्वास व भाषा वाले समाज को पृथ्वी एक परिवार के रूप में पोषण व आश्रय देती है। यह पृथ्वी गाय दुग्ध की सहस्त्रधारा के समान हम सबको तमाम ऐश्वर्य देने वाली बने।” यहां पृथ्वी के पोषक व सुंदर बने रहने की कामना है।
अथर्वा का भावबोध गहरा है। इस भावबोध में यथार्थबोध की नींव हैं। कहते हैं कि “इस भूमि पर दो पैरों वाले हंस, गरूण आदि पक्षी रहते हैं। वायुदेव धूल उड़ाते हैं, पेड़ उखाड़ते हैं। वायु की तीव्र गति से अग्नि भी तीव्र गतिशील होते हैं। इस पृथ्वी पर शुक्ल-अरूण व कृष्ण पक्ष मिलकर चलते हैं और दिन रात भी परस्पर मिलें रहते हैं। यह पृथ्वी हमारी कल्याणकारी वृत्ति से हमे सुंदर प्रिय स्थान दें। (वही 51 व 52) पृथ्वी पहले अविकसित थी। बाद में विस्तीर्ण हुई। यह वैज्ञानिक सत्य है। अथर्वा कहते हैं “हे पृथ्वी पहले आपका विकास नहीं हुआ था। देवों ने आपसे विस्तृत होने की प्रार्थना की। उस समय आपने सबको आश्रय दिया और आपने दिशाओं की कल्पना की -तदानीम कल्पयथा। (वही 55) यहां दिशाएं कल्पित धारणा हैं। सही बात है। दिशाएं सापेक्ष हैं। भारत में हैं तो ब्रिटेन पश्चिम में है। ब्रिटेन के पश्चिम बैठे हैं तो ब्रिटेन पूरब में होगा।
भूमि आनंद और सृजन का क्षेत्र है। वह ऋषि की दृष्टि भूमि की हरेक गतिविधि पर है। कहते हैं, “इस भूमि पर ग्राम हैं, नगर हैं। सभाएं होती हैं। संग्राम हैं, समिति है। हम सर्वत्र आपकी स्तुति करते हैं। (वही 56) वैदिक समाज को पिछड़ा बताने वाले गल्ती पर हैं। वैदिक काल का समाज ग्रामीण ही नहीं है। इस समाज में नगर भी है। समाज सभ्य है। सभाएं भी होती हैं। विमर्श भी होे हैं। संग्राम का अर्थ युद्ध नहीं ग्रामों का मिलन है। संग्राम संभवतः सभा विमर्श के बड़े आयोजन थे। इसीलिए आगे कहते हैं, “हम जो भी बोले, जब भी बोले, वह मधुमय हों। हम मधुरता देखे, प्रिय और हितकर देखें। हम तेजस्वी होकर गतिशील बनें।” (वही 58)
ऋषि की अभिलाषा सामाजिक प्रीतिभाव की है। स्वस्थ व प्रसन्न पूर्ण समृद्ध समाज की है। ऋग्वेद की परंपरा यही है। ऋग्वेद में सोम से स्तुति है “जहां सदानीरा नदियां हैं, प्रचुर अन्न हैं सुन्दर राजव्यवस्था है, जहां मुद मोद प्रमोद है। हे सोम हमें वहां स्थान दें।” अथर्ववेद की भी अभिलाषा यही है। अथर्ववेद के भूमि सूक्त में ऋग्वेद की इसी अभिलाषा का विस्तार है। कहते हैं, “शांतिप्रद पृथ्वी सुखदायी अन्न दूध व सुंदर सामग्री देती है। वह हमें सभी ऐश्वर्य देने वाली हो।” (वही 59) पृथ्वी स्वस्थ तो हम सब स्वस्थ।
अथर्ववेद भारत के परमवैभव की अभिलाषा का काव्य अभिलेख है। भूमि सर्वसुख दाता हैं वैदिक समाज में ऋषि कवि की प्रतिष्ठा थी। अथर्ववेद में पृथ्वी सर्वगुण संपन्न है। सभी ऐश्वर्यो से समृद्ध है। वह समस्त विश्व का आश्रय व आधार है। अथर्वा के लिए पृथ्वी दिव्य है, देवी है और कवि है। (वही 63) कहते हैं कि यह पृथ्वी हमें कल्याणकारी प्रतिष्ठा से युक्त करे।” (वही) समृद्धि यश प्रतिष्ठा निश्चित ही आनंददाता है लेकिन उत्तम स्वास्थ्य के अभाव में सभी उपलब्धियां व्यर्थ हैं। अथर्वा का ध्यान राष्ट्रीय स्वास्थ्य पर भी है। भ्ूामि सूक्त (12.62) में कहते हैं “हे भूमि! आपमें उत्पन्न सभी प्राणी निरोग हों। क्षय, जीर्णता से मुक्त हों। हम सब दीर्घायु प्राप्त करें। राष्ट्र समाज के लिए त्याग करें।” भूमि सूक्त लोकमंगल का शपथ पत्र है। भूमि का आदर संरक्षण हम सबका कत्र्तव्य है। भूमि माता है। हम सब पुत्र हैं। स्वस्थ प्रसन्न माता के पुत्र स्वस्थ प्रसन्न व सौभाग्यशाली होते हैं।

(रविवार पर विशेष)
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं वर्तमान में उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष हैं।)