आशुतोष राणादस्तक-विशेषसाहित्यस्तम्भ

संतजी के तीन बंदर

आशुतोष राणा

तीन बंदर थे, बेहद उत्पाती..उनके तीन अलग-अलग दल थे। एक दल सिर्फ बुरा बोलता था, दूसरा दल सिर्फ बुरा देखता था, तीसरा दल सिर्फ बुरा सुनता था।
उन तीनों बंदर दलों की आपस में बिल्कुल नहीं पटती थी। जिससे पूरे जंगल में मंगल ना होकर, अमंगल का हाहाकार मचा रहता था।बचे हुए जंगलियों ने संत जी से शिकायत की कि, वे बंदरों को समझायें, सब लोग उन बंदरों से बहुत परेशान हैं।
इन बंदरों ने जंगल का सत्यानाश कर दिया है।एक दिन तीनों दलों के ‘बंदर मुखिया’ संत जी को मिल गए, वे तीनों ही आपस में अच्छे दोस्त थे लेकिन उनके दलगत बंदर एक-दूसरे के भयंकर दुश्मन थे।
संत जी ने उनसे कहा- देखो एक ही बिरादरी के होते हुए आपस में लड़ना अच्छी बात नहीं है, तुम लोग मिलजुल के रहा करो आज से तुम लोग बुरा मत बोलना, बुरा मत देखना, बुरा मत सुनना।बंदर संत जी की इज्जत करते थे, सो उन तीनों ने संत जी को प्रणाम किया और जो आज्ञा कहते हुए वहाँ से चले गए।
बंदरों में एका हो गया था, लेकिन इस एकता के बाद भी वे अंदर ही अंदर घुटने लगे क्योंकि बुरा बोलना, देखना, सुनना उनका संस्कार था लेकिन अपने गुरु की बात भी नहीं टाल सकते थे। तो उनकी मीटिंग बैठी कि क्या किया जाए? जिससे अपने संस्कार की रक्षा भी हो और गुरु जी की बात भी रह जाए।
सर्वसम्मति से निर्णय हुआ कि एक दल बिल्कुल बुरा नहीं बोलेगा, लेकिन वो बुरा देख सकता है और सुन सकता है।
दूसरा दल आज से बुरा नहीं देखेगा किंतु उसे बुरा सुनने और बोलने की स्वतंत्रता है।
तीसरा दल किसी भी कीमत पर बुरा नहीं सुनेगा लेकिन वह बुरा बोल और देख सकता है।
गुरुजी ने हमें मिलजुलकर रहने की हिदायत दी है, अगर हम तीनों एक साथ रहकर, मिलकर काम करें तो अपने संस्कार और शपथ दोनों की रक्षा हो जाएगी।

उन तीनों बंदरों ने सभा बुलाई और मंच पर साथ में बैठकर एक ने आँख बंद की, दूसरे ने कान और तीसरे ने अपने मुँह पर हाथ रखकर मुँह बंद कर लिया और एक फोटो खिंचवाकर, प्रमाण के लिए संत जी के पास भेज दी। साथ ही पूरे जंगल में इस फोटो के पोस्टर लगा दिए।

सम्पूर्ण जंगल में संत जी के तीन बंदरों की जय जयकार गूँज गयी किंतु थोड़े ही दिनों में ये जय-जयकार-हाहाकार में बदल गयी। जंगल में अब पहले से ज्यादा कोहराम मच गया था।

जंगली फिर भागे संत जी के पास, संत जी ने मुखियों को फटकार लगाई कि तुम लोग चालाकी करते हो? इससे तो अच्छा तब था जब तुम आपस में लड़े हुए थे। त्रेता युग में तुम्हारे पुरखों ने सहयोग किया था इसका ये मतलब नहीं की तुम उनके बलिदान का नाजायज फायदा उठाओ?

मुखियों ने मायूस होकर कहा ठीक है यदि आप यही चाहते हैं कि हम जीते जी देखना, बोलना, सुनना बंद कर दें तो यही होगा। आज से हम ना बुरा बोलेंगे ना सुनेंगे और ना ही देखेंगे। हम आपकी शपथ लेते हैं आप हमारे गुरु हैं, आपके आदेश का अक्षरश: पालन होगा। अब हमारे इतना करने के बाद भी कोई गड़बड़ हो तो हमसे मत कहिएगा। हमें कसम है हमारे देखने-सुनने-बोलने वाले पुरखों की, आज से हम सब गूँगे, बहरे और अंधे हो जाएँगे।

इस शपथ के कुछ दिन बाद जंगल का माहौल बिल्कुल ही बदल गया, चारों तरफ अब कोहराम ही नहीं हाहाकार, चीत्कार, अत्याचार, बलात्कार, भ्रष्टाचार, मिथ्याचार, दुराचार, व्यभिचार, कुप्रचार का बोलबाला हो गया।
जंगली परेशान हो गए कि अब किसके पास जाएँ? क्योंकि संत जी का तो देहांत हो चुका था और ये तीनों बंदर संत जी के साथ अपना फोटो चिपकाकर जंगल भर में इस बात का दावा कर रहे थे कि हम तो अपने गुरु को दिए गए वचन का पूरी निष्ठा के साथ पालन कर रहे हैं। हम गूँगे-बहरे-अंधे हैं इसलिए इस अव्यवस्था में हमारा कोई योगदान नहीं है।

लोगों ने उनसे तर्क किया, कहा- आप झूठ बोल रहे हैं ये आपका अपने गुरु के साथ धोखा है।
अपने ऊपर लगे इस आरोप का जवाब मुखियों ने जंगल में सभा बुलाकर भरी सभा में दिया, उन्होंने जंगलियों से पूछा- गुरुजी ने हमें बुरा बोलने को मना किया था, क्या हम बुरा बोलते हैं? हाथ उठाकर जवाब दीजिए..
जंगलियों ने हाथ उठाकर जवाब दिया नहींऽऽ…

क्या हम बुरा सुनते हैं?
हाथ फिर से उठे और आवाज आयी- नहींऽऽऽ….

क्या हम बुरा देखते हैं?
उठे हुए हाथ जोर से बोले- नहींऽऽऽऽऽ..
—-
तभी एक छोटा बंदर आया जिसके हाथ में उस्तरा था, सिर पर मुकुट था वह भावुकता से बोला- बंधुओंऽऽऽऽ हमें गुरुजी ने बुरा देखने, सुनने, बोलने के लिए मना किया था, लेकिन बुरा करने के लिए मना नहीं किया था।
हम उनके इस गूढ़ मंत्र को समझ गए थे कि बुरा देखने, सुनने, बोलने की चीज नहीं है, इसमें कोई फायदा नहीं हैं, खामखां दुश्मन भी खड़े हो जाते हैं, हम लोग अभी तक ऐसा करके मूर्खता ही कर रहे थे हमारी इस मूर्खता का परिणाम ये हुआ कि आप सब लोग हमारे विरोधी हो गए, हमें आपस में किसी भी किस्म का विरोध पसंद नहीं है इसलिए विरोध को मिटाने के लिए अब हम बुरा देखते, सुनते, बोलते नहीं हैं बल्कि करते हैं। सदियों से चला आ रहा विरोध पल भर में समाप्त नहीं हो सकता, बंधुओं, विरोध को समाप्त करने का सबसे सरल तरीका है अपने विरोधी को ही समाप्त कर दो। विरोधी के समाप्त होते ही विरोध खुद-ब-खुद समाप्त हो जाता है।
आप सभी विरोध मिटाना चाहते थे, हम वही कर रहे हैं, इसमें हमें आपका साथ चाहिए। सबका साथ ही सबका विकास है, असहयोग करने की सूरत में यह स्लोगन बदलकर ‘सबका हाथ सबका विनाश’ में बदल जाएगा। और ध्यान रहे इसके जिम्मेदार हम नहीं होंगे क्योंकि हम गूँगे, बहरे और अंधे हैं।

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