दस्तक-विशेषस्तम्भहृदयनारायण दीक्षित

स्वस्थ होना सुख है और रूग्ण होना दुख

हृदयनारायण दीक्षित

स्तम्भ : सुख सबकी कामना है। सामान्यतया अपने वातावरण व समाज की अनुकूलता सुख व प्रतिकूलता दुख कही जाती है लेकिन आयु-विज्ञान के महान ग्रंथ चरक संहिता (हिन्दी अनुवाद, चैखम्भा वाराणसी) में सुख और दुख की विशेष परिभाषा की गई है। चरक के अनुसार “स्वस्थ होना सुख है और रूग्ण (विकार ग्रस्त) होना दुख है।” सुखी रहने के लिए उत्तम स्वास्थ्य जरूरी है। चरक संहिता ने सुखी जीवन के लिए स्वास्थ्य को आवश्यक बताया है। स्वस्थ जीवन के तमाम स्वर्ण सूत्र चरक संहिता के पहले उपनिषदों में कहे गए थे। छान्दोग्य उपनिषद् में अन्न पचने और रक्त अस्थि तक बनने के विवरण हैं। महाभारत (शांति पर्व) में भी शरीर की आंतरिक गतिविधि का वर्णन है। चरक संहिता में स्वास्थ्य के लिए कठोर अनुशासन को जरूरी कहा गया है। बताते हैं “अपना कल्याण चाहने वाले सभी मनुष्यों को अपनी स्मरण शक्ति बनाए रखते हुए सद्व्रत्तों का पालन करना चाहिए।”
सद्व्रत ध्यान देने योग्य है। मनुष्य ने अपने व संपूर्ण समाज के स्वास्थ्य के लिए अनेक नियम बनाए हैं। व्यापक सामाजिक हित में ही ऐसे नियमों का सतत् विकास हुआ है। कोरोना वायरस का संक्रमण विश्वव्यापी है। दुनिया के सभी क्षेत्रों में भय है। यह भय असाधारण प्रकृति का है। यह किसी साधारण रोग के संक्रमण का भय नहीं है। यह मृत्यु भय है। प्रतिष्ठित चिकित्साविज्ञानी भी इसका कारण नहीं जानते। निवारण की बात अभी दिवास्वप्न है। चिकित्सा विज्ञानियों के अनुसार परस्पर दूर रहकर ही कोरोना से बचाव संभव है। यही वर्तमान चुनौती से जूझने का सद्व्रत है। मूलभूत प्रश्न कई हैं कि भारत की मनुष्य केन्द्रित चिंतनधारा में व्रत पालन की सुदृढ़ परंपरा के बावजूद हम में से अनेक परस्पर दूर रहने के सामान्य व्रत का भी पालन क्यों नहीं करते? इस व्रत के पालन की प्रार्थना प्रधानमंत्री ने हाथ जोड़कर की है तो भी व्रतपालन क्यों नहीं ? इस प्रार्थना के पीछे कानून की शक्ति है तो भी नहीं। इस व्रतभंग में मृत्यु की भी संभावना है तो भी व्रतभंग क्यों? इन प्रश्नों का उत्तर खोजना आधुनिक भारतीय चिंतन की बड़ी चुनौती है।
महाभारत में यक्ष द्वारा युधिष्ठिर से अनेक जीवनोपयोगी प्रश्न पूछे गए थे। उनमें मृत्यु सम्बंधी प्रश्न भी था। यक्ष ने पूछा “सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है-किम् आश्चर्यम्?” युधिष्ठिर ने कहा “सबकी मृत्यु निश्चित है तो भी लोग यह सत्य नहीं स्वीकार करते, अपनी हठ में बने रहते हैं।” कल्पना करें-महाभारत के इस अंश का कोरोना संदर्भ में नए सिरे से सम्पादन करे तो यह अंश संशोधित होकर कैसा होगा ? यक्ष प्रश्न नए रूप में पढ़ते हैं, “भारत के लोक जीवन में सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है? उत्तर होगा “सब लोग जानते हैं कि कोरोना की दवा नही। कोरोना मारक है। सब लोगों को पता है कि सामाजिक दूरी ही एक मात्र उपाय है। लोग मिले तो मरे। मुख खोले खड़ी प्रत्यक्ष मृत्यु के बावजूद लोग जीवन रक्षा का समान्य उपाय भी नहीं मानते।” क्या यही सबसे बड़ा आश्चर्य नहीं है।
यक्ष प्रश्नों जैसी कथाएं लोक प्रबोधन के लिए ही लिखी गई थीं। सरल और सुबोध भाषा में ही लिखी गई थीं। ज्वर साधारण बीमारी है। अथर्ववेद के ऋषि अनेक प्रकार के ज्वरों से परिचित थे। ज्वर अकेला नहीं होता। इसका अपना प्रिय परिवार भी साथ आता है। कहते हैं “ज्वर अपने भाई कफ के साथ आता है। खंासी उसकी बहिन है। वह बहिन के साथ आता है। इसका भतीजा यक्ष्मा (टी0बी0) है।” (5.22.12) सब आगे पीछे आते हैं। मनुष्य आयुर्विज्ञान के व्रतों का पालन करे तो बच सकता है। रोगी से दूर रहने पर रोग संक्रमण से जीवन का बचाया जा सकता है।
प्राण जीवन है। श्वसन तंत्र के रोग प्राणहीन करते हैं। प्राणों की रक्षा के लिए प्राणायाम की शोध हुई थी। प्राणायाम से स्वस्थ्य शरीर में रोग नहीं आते। फिर भी रोगाणुओं को पराजित करने की तमाम कारगर औषधियां खोजी गई थी। अथर्ववेद (19.37.1) में कहते हैं, यक्ष्मा सहित, “उस मनुष्य को कोई रोग पीड़ित नहीं करता, दूसरों के द्वारा दिए गए अभिशाप (संक्रमण) उसे स्पर्श तक नहीं करते, जिसके पास औषधरूप गुग्गुल की श्रेष्ठ सुगंधि संव्याप्त रहती है।” (आचार्य श्रीराम शर्मा का अनुवाद)
गुग्गुल साधारण वनस्पति है। आधुनिक आयुर्विज्ञानी इसे रोग निरोधक क्षमता बढ़ाने वाली प्रमुख औषधि बताते हैं। अथर्ववेद में इस औषधि का अनेकशः उल्लेख हुआ है। ऊपर के मंत्र के अनुसार गुग्गुल के प्रयोगकत्र्ताओं के पास कोई भी रोग नहीं आते। एक अन्य मंत्र (4.37.3) में भी गुग्गुल को अन्य औषधियों पीलु या भल, व जटमांसी को महत्वपूर्ण औषधि बताया गया है। रोग निरोधक शक्ति की चर्चा बहुत होती है लेकिन अथर्ववेद के आयुर्विज्ञान की उपेक्षा होती है। ब्लूमफील्ड जैसे कुछेक विद्वानों ने अथर्ववेद को जादू टोने वाला वेद बताया। विदेशी विद्वानों को सही मानने वाले भारतवासियों ने भी उन्हीं की राह वैदिक शोध की उपेक्षा की। नई पीढ़ी ने वेदों के वैज्ञानिक यथार्थवाद पर ध्यान नहीं दिया। उन्होंने प्राचीन साहित्य को आध्यात्मिक समझा। अथर्ववेद के भरे पूरे चिकित्सा विज्ञान की उपेक्षा जारी है। 
अथर्ववेद में वर्णित औषधियां प्रभावशाली हैं। इस वेद के प्रमुख रचनाकार द्रष्टा अथर्वा हैं। ऋषि जानते हैं कि “उसके पहले अथर्वा, कश्यप व अगस्त्य ने इन औषधियों से तमाम रोगाणुओं को नष्ट किया था।” (4.37.1) भारत में अथर्ववेद व इसके पहले भी चिकित्सा विज्ञान की सुदीर्घ परंपरा थी। अथर्ववेद में अनेक रोगों व उनके लक्षणों का विस्तार से वर्णन किया गया है। साथ में तत्सम्बंधी रोगों की तमाम औषधियां भी बताई गई हैं। एक मंत्र (6.127.3) में हृदय रोग का उल्लेख हैं, “जो रोग फैलकर हाथ, पैर, आंख, कान, नाक तक पहुंच जाते हैं, उन्हें और विद्रध नामक व्रण व हृदयरोग – हृदयामयम् को औषधियों द्वारा दूर करता हूं।” ब्लूमफील्ड ने भी हृदयामयम का अनुवाद “पेन इन दि हार्ट” किया है। अथर्ववेद के रचनाकाल में हृदय रोग की जानकारी बड़ी बात है।
औषधियां प्राणरक्षक हैं। प्राण से ही औषधियां लहराती हैं। एक सुंदर सूक्त (11.6) में प्राण को सबका स्वामी बताया गया है। कहते हैं, “हे प्राण! औषधियों के समक्ष गर्जन करते हैं, तब औषधियां शक्तिशाली होती हैं, विस्तार को प्राप्त होती हैं। प्राण औषधियों के हित में बादल रूप गर्जन करता है। औषधियों पर जल वर्षा करता है। औषधियां प्रसन्न मन कहती हैं – आपने हमारी आयु बढ़ाई है। सुगंधित बनाया है। (वही 1, 2, 3, 4 व 6) प्राण ही रेाग व मृत्यु के कारण हैं। (वही 9 व 11) प्राण की स्तुति करते हैं, “आप वर्षा द्वारा तृप्ति देते हैं। तब अथर्वा द्वारा रोपित, अंगिरावंशजों व मनुष्यों द्वारा निर्मित औषधियां प्रकट होती हैं।” (वही 16) प्राण से औषधियां हैं। औषधि से प्राण रक्षा है। इनके सदुपयोग का विधान है। संक्रमण से बचने बचाने का आचार हम सबका व्यवहार होना चाहिए। 
वैद्य लोकहित में चिकित्सा करते हैं। चरक संहिता में धनलोभी वैद्य की भत्र्सना है। प्राचीन चिकित्सा विज्ञान या आयुर्विज्ञान की आधुनिक चिकित्सा विज्ञान से तुलना बेमतलब है। दोनो वैज्ञानिक दृष्टिकोणों को एक साथ मिलाने से लोककल्याण की संभावना ज्यादा है। औषधि विज्ञान के विकास के कई चरण है। पहला ऋग्वेद के रचनाकाल से भी पूर्व है। ऋग्वेद में उल्लेख है कि “देवों पूर्वजों को तीन युग पहले औषधियों की जानकारी थी। ऋग्वैदिक काल दूसरा चरण है। इस काल में चिकित्सा विज्ञान का खासा विकास हो चुका था। अथर्ववेद तीसरा चरण है। इसमंे औषधि विज्ञान का समुचित विकास हुआ। चरक संहिता आयुर्वेद का प्रतिष्ठित ग्रंथ। है। आयुर्वेद चिकित्सा विज्ञान से भरापूरा है लेकिन जोर सदाचार पर है। औषधि प्रयोग ही पर्याप्त नहीं है। फिर सभी रोगों की औषधियां आधुनिक काल में भी नहीं खोजी जा सकी हैं। कोरोना भी ऐसी ही महामारी है। बचाव ही विकल्प है। स्वयं को अलग रखना ही बचाव है बावजूद इसके अनेक लोग परिपूर्ण बंदी में भी घर से बाहर टहलने के आत्मघात पर आमादा है। 
(रविवार पर विशेष)
(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार हैं एवं वर्तमान में ​उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष हैं।)

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