
चुनावी नतीजे यूपी में माया का खेल बना या बिगाड़ सकते हैं!
एजेंसी/ नई दिल्ली। कल यानि 19 मई 2016 को पांच राज्यों के परिणाम आ रहे हैं। एक्जिट पोल ने पहले ही माहौल गर्मा दिया है। 24 घंटे बाद चुनावी तस्वीर साफ हो जाएगी। जब मौसम चुनावी हो तो उत्तर प्रदेश का जिक्र कैसे छूट सकता है। यूपी विधानसभा चुनाव 2017 में होंगे लेकिन सभी दलों ने अभी से अपनी संभावनाएं तलाशनी शुरू कर दी हैं। इस बार मुकाबला जबरदस्त है। समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव के लिए कड़ा इम्तेहान है।
बीएसपी सुप्रीमो मायावती के हौसले बुलंद हैं और उनके मुकाबले फिलहाल कोई नहीं दिख रहा है। बीजेपी ने नया प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त कर दांव चला है, पर ये कितना असर करेगा, इसमें कई किंतु परंतु हैं। उधर, कांग्रेस भी पीके यानि प्रशांत किशोर के साथ मैदान में है। लेकिन चुनावी घमासान की धुरी मायावती ही हैं। सर्वे भी इसी ओर इशारा कर रहे हैं। आइए जानते हैं क्या मायावती की रणनीति और बीएसपी की संभावनाएं
अगर कल आने वाले चुनावी परिणाम बीजेपी के पक्ष में आते हैं, खासकर असम में बीजेपी सत्ता में आती है तो मायावती के लिए मुश्किलें बढ़ेंगी। शायद तब मायावती को कांग्रेस के साथ जाने का फैसला करना पड़े। तब यूपी में बीजेपी को रोकने के लिए माया को कांग्रेस की जरूरत पड़ सकती है। कांग्रेस ने असम में प्रशांत किशोर की राय को दरकिनार करते हुए बदरूद्दीन अजमल की एआईयूडीएफ से गठबंधन नहीं किया था। चुनावी नतीजे के बाद कांग्रेस-बीएसपी गठबंधन पर मजबूर हो सकते हैं। अब तक माया कहती आ रही हैं कि वह अकेली ही चुनाव लड़ेंगी।
यूपी चुनाव में चाहिए कांग्रेस का साथ
अलग-अलग सर्वे के अनुसार कहा गया है कि इस चुनाव में मायावती की बसपा 185 सीटों के साथ प्रदेश में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी। हालांकि यह 403 सीटों वाली विधानसभा में बहुमत से 17 सीट कम है। ऐसे में बहुमत के आंकड़े तक पहुंचने के लिए मायावती की बसपा को गठबंधन की जरूरत होगी। मायावती ने इस कदम से यह संकेत दे दिया है कि यूपी चुनाव में बसपा के लिए कांग्रेस तक पहुंच ज्यादा आसान है। हालांकि चुनाव पूर्व किसी तरह के गठबंधन की संभावना कम ही दिखती है।
कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मायावती कांग्रेस के साथ हमदर्दी दिखाकर यूपी में उसका लाभ लेना चाहती है। यूपी में किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत न मिलने की स्थिति में मायावती के पास बीजेपी और कांग्रेस का ही विकल्प होगा। लेकिन दलित छात्र रोहित वेमुला की मौत और जेएनयू घटनाक्रम के बाद से ही जिस तरह दलित विचारधारा पर दोनो के बीच टकराव रहा है, और मायावती ने उस स्थिति में इस बात की संभावना काफी कम है कि बसपा इस चुनाव में बीजेपी के साथ जाए।
ऐसे समय में कांग्रेस की विचारधारा मायावती के काफी करीब दिख रही है और संभावना है मायावती कांग्रेस के साथ जा सकती है। उत्तराखंड मुद्दे पर मायावती ने जिस तरह कांग्रेस के साथ जाने की वजह के लिए सांप्रदायिक ताकतों को कमजोर करने की बात कर रही हों, लेकिन इसके पीछे का मकसद यूपी विधानसभा चुनाव से ही जुड़ी है। प्रशांत किशोर की रणनीति के तहत अब तक कांग्रेस यूपी विधानसभा चुनाव अकेले लड़ने के मूड में है, लेकिन वोटों के गणित को समझते हुए आखिरी वक्त पर कांग्रेस और बसपा मिलकर चुनाव लड़ सकते हैं। ऐसी स्थिति में जहां अल्पसंख्यक वोटों के बिखराव से सपा के लिए मुश्किलें बढ़ेंगी।
इस गठबंधन का फायदा कांग्रेस को भी होगा और काफी समय से यूपी में जमीन तलाश रही पार्टी और कार्यकर्ताओं के लिए किसी एनर्जी ड्रिंक से कम नहीं होगा। मुसलमानों के मुलायम से मोहभंग की खबर के बारे में भनक लगते ही, मायावती ने भी मुसलमानो को अपनी तरफ खींचने के लिए मुलायम-मोदी दोनों पर हमला बोल रही हैं। जहां एक तरफ यूपी के मुस्लिम यह सोचकर कि मायावती ही अब बीजेपी को यूपी में सरकार बनाने से रोक सकती हैं,बसपा की तरफ रुख कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ पश्चिमी यूपी में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के चलते दलित बसपा को छोड़कर बीजेपी की तरफ रुख कर रहे हैं।
दलित वोटरों के साथ है भानात्मक कनेक्शन
बसपा के संस्थापक कांशीराम द्वारा यूपी की राजनीति में 1980 के दशक में उतारे जाने के बाद से मायावती ने दलित समाज पर एकछत्र राज किया है। दलित मतदाता मायावती के लिए जी जान से लगे रहते हैं, और हो भी क्यों न! मायावती ने दलितों को आवाज दी है, बोलने का मौका दिया है,और इसी वजह से समुदाय का डर भी खत्म हुआ है। ऐसा माना जाता है कि दलित समुदाय का मायावती के प्रति राजनीतिक नहीं, बल्कि भावनात्मक लगाव है। मायावती ने दलित वोट बैंक को इस कुशलता से अपने साथ जोड़ा है कि कई दलित बस्तियों में मायावती की पूजा होती है।
सवाल भी कम नहीं
समय-समय पर मायावती के दलित सशक्तिकरण के दावों पर भी सवाल उठते रहे हैं। दलितों के लिए बड़ी बड़ी बातें करने वाली मायावती के पास गिनाने के लिए अब तक कोई एक बड़ी योजना नहीं है, जिससे दलितों का कायापलट हुआ हो। आलोचक मानते हैं कि पार्कों और मेमोरियल बनवाने पर अरबों रुपए खर्च करने के बजाए इन पैसे को दलितों के आर्थिक उत्थान पर खर्च करना चाहिए था। इस बात से इंकार नहीं जा सकता कि एक तरफ मायावती के नेतृत्व वाली सरकारों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहने से तो दूसरी तरफ आय से अधिक धन जुटाने के आरोपों के कारण मायावती की लोकप्रियता कम हुई है।
मायावती के पहनावे और ‘आलीशान’ रहन-सहन भी सवालों के घेरे में रहे हैं। लेकिन, मायावती के पक्ष में एक बात जरूर है कि दलितों का मानना हैं कि जिस तरह मुलायम सिंह अपने यादव-मुस्लिम वोटर के नाम पर हमेशा तैनात रहते हैं, वैसे ही मायावती ने हमेशा दलित मुद्दों पर डटी रहती है।
इस चुनाव के लिए खास रणनीति
पिछली दो हारों से सबक लेते हुए मायावती इस बार हर विधानसभा सीट की समीक्षा में जुटी हैं। ऐसा माना जाता है कि 2012 और 2014 के चुनावों में उम्मीदवारों के चयन का तरीका भी सही नहीं था जिस कारण पिछले आम चुनाव में यूपी की 17 सुरक्षित सीटों में से मायावती एक भी सीट नहीं बचा पाईं थी। मायावती के सामने युवा दलित वोट बैंक को बचाए रखना भी एक चुनौती है। जब सभी राजनीतिक दल अंबेडकर को पूजने में लगे हैं, वहीं मायावती उस सोशल इंजीनियरिंग के फॉर्मूले की तलाश में है जिससे वह 2007 में सत्ता में आई थीं। लेकिन मायावती को यह याद रखना होगा कि जिस निचली और ऊंची जातियों के समीकरण ने उन्हें विधानसभा जिता दिया था उसी फॉर्मले से बसपा 2012 के विधानसभा और 2014 के लोकसभा चुनाव में करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा था।
क्या हैं राजनीतिक मायने
मायावती ने अपने फैसले से यह संकेत दे दिया है कि सीबीआई का भी कोई भय नहीं है। यही नहीं जिस तरह बीजेपी केशव मौर्य को अपना प्रदेश अध्यक्ष बनाकर दलित वोटों में सेंधमारी की कोशिश की है, उसका जबाव भी मायावती ने अपने अंदाज में दिया है। मायावती ने यह भी संकेत दे दिया है कि वह बीजेपी को बराबर की टक्कर देने में सक्षम हैं। यही नहीं, मायावती ने एक साथ दो निशानों पर तीर चलाया है। यूपी में लगभग 19% मुस्लिम वोट हैं, और बीजेपी के खिलाफ इस फैसले मायावती ने इस वोट बैंक पर भी अपना दावा ठोंक दिया है। इससे पहले 2002 में बीएसपी और बीजेपी का गठबंधन हुआ था, जो कि चल नहीं पाया था तो मायावती कांग्रेस के साथ चुनाव के बाद गठबंधन का रास्ता खुला रखना चाहती हैं।
क्या कहते हैं आंकड़े
2012 के यूपी विधानसभा के परिणाम पर गौर करें तो बसपा के मुकाबले सपा को सिर्फ 3.22 फीसदी अधिक वोट मिले थे और इस अंतर से ही सपा को 224 सीटों पर कामयाबी मिल गई, जबकि बसपा 80 सीटों पर सिमट गई। जाहिर है ऐसे में कई छोटी पार्टियां भी खेल बिगाड़ सकती है। पिछले चुनाव में पीस पार्टी के 208 उम्मीदवारों में चार ने जीत दर्ज की थी। कुल वोटों में 2.35 और लड़ी गई सीटों पर 4.54 फीसदी वोट प्राप्त करने वाली पीस पार्टी भी विधानसभा का खेल बिगाड़ सकती है। अभी चुनाव में काफी वक्त है और ऐसे में मतदाताओं, कार्यकर्ताओं के साथ नेताओं का भी दल-बदल होना तय है। इन परिस्थितियों में मायावती की नजरें भी किसी गठबंधन के तरफ होंगी इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता।