ट्रिपल तलाक के मुद्दे पर भाजपा के दोनों हाथ में लड्डू


भारतीय जनता पार्टी ने ट्रिपल तलाक के मुद्दे को जिस तरह से अंजाम दिया है। उसे देश में एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। गैर भाजपा दल हमेशा मुस्लिम नेताओं के प्रभाव में रहे हैं। वहीं भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हमेशा से मुस्लिमों का विरोध करने वाले के रुप में पहचाना जाता रहा है। स्वतंत्रता के 70 वर्षों के इतिहास में मुसलमानों ने कभी भी भाजपा और संघ के प्रति अपना भरोसा नहीं जताया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की जुगल जोड़ी किसी भी जोखिम से घबराती नहीं है। वह अपने आप को जोखिम में डालकर सभी को आश्चर्यचकित करते हुए जीतकर बाहर निकलने में माहिर है। ट्रिपल तलाक के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ है। कांग्रेस सहित देश के अन्य राजनीतिक दलों को मुस्लिमों के इस मामले में भाजपा के पीछे चलने के लिए विवश होना पड़ा है। भाजपा ने मुस्लिम महिलाओं के वोट बैंक में सेंध लगाने का जो मंसूबा बनाया था, उसमें भाजपा पूर्ण रुप से सफल होती दिख रही है।
28 दिसंबर 2017 को लोकसभा में तीन तलाक का बिल ध्वनिमत से पारित हो गया। इस बिल का विरोध असदुद्दीन ओवैसी ने किया। उन्होंने अपने 3 संशोधन प्रस्ताव भी लोकसभा में पेश किए । कांग्रेस ने भी इस बिल के कुछ प्रावधानों का विरोध करते हुए इसके लिए समिति बनाने की बात कही। ओवैसी ने अपने संशोधन प्रस्ताव पर मतदान की मांग की थी। जिस पर उन्हें कोई खास समर्थन नहीं मिला, यह बिल ध्वनिमत से लोकसभा में पास हो गया। राज्यसभा में भी इस बिल के पास होने की पूर्ण संभावना जताई जा रही है। क्योंकि कांग्रेस भी इस बिल का खुलकर विरोध करने के लिए अपने आप को सहज नहीं मान रही है। नरेंद्र मोदी की यह सबसे बड़ी जीत है। इस बिल के माध्यम से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुस्लिम समाज को दो फाड़ करने में सफलता हासिल कर ली है। मुस्लिम आबादी में लगभग आठ करोड़ मुस्लिम महिलाएं हैं। सरकार के इस कदम से आठ करोड़ महिलाएं भारतीय जनता पार्टी को कहीं ना कहीं अपनी हितेषी मानने के लिए विवश होंगी। विशेष रुप से नई उम्र की मुस्लिम महिलाओं की सोच पर भाजपा ने एक लोहार की तरह तगड़ी चोट की है। जिससे इसका असर बड़े पैमाने पर होना ही है। भाजपा के राज्यसभा सदस्य और विदेश राज्यमंत्री एमजे अकबर की तकरीर भी मुस्लिम नेता के रुप में कराते हुए कि इस्लाम खतरे में है या मुल्ला-मौलवी खतरे में हैं। कहलवाकर सरकार ने मुस्लिम कट्टरपंथियों और मुल्ला मौलवियों की विश्वसनीयता पर एक बड़ा प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। निश्चित रुप से मुस्लिम महिलाओं में इसका असर होगा, और इसके दीर्घकालीन परिणाम भाजपा के पक्ष में सामने आएंगे।
भाजपा ने प्रथम चरण एक सुनियोजित रणनीति के तहत सभी विपक्षी दलों को हांका लगाकर अपने पीछे चलाने विवश करके एक अप्रत्याशित सफलता हासिल कर ली है। भाजपा, मुस्लिम आबादी को पुरुषों और महिलाओं के बीच बांटने में पूर्णता सफल होती दिख रही है। आगे चलकर भाजपा के लिए इसमें एक बड़ा जोखिम भी हो सकता है। ट्रिपल तलाक अथवा तलाक के बाद सरकार यदि मुस्लिम महिलाओं के भरण-पोषण का पुख्ता इंतजाम नहीं कर पाई तो भाजपा को इसका दुहरा नुकसान उठाने के लिए भी तैयार रहना होगा। भाजपा ट्रिपल तलाक के मामले में आरोपी पुरुष को 3 साल के लिए जेल भेज देगी। उसके बाद यदि उसकी पत्नी को आर्थिक एवं सामाजिक स्वीकार्यता सरकार नहीं दे पाई, तो इसके बहुत गंभीर परिणाम सामने आएंगे। पाकिस्तान में आज जो हालत भारत से गये मुसलमानों की है। वही हालात मुस्लिम समाज की महिलाओं की अपने परिवारों में हो सकती है। इतिहास से भी भाजपा को भी सबक लेने की जरूरत है । भारत में आज मुस्लिमों की इतनी बड़ी आबादी केवल इस कारण है , कि जब मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा हिंदू महिलाओं को लूटकर ले जाया गया, और जब उन्हें छोड़ा, तो भारत में जाति वादी व्यवस्था ने उनको अछूत मानकर अपने पास रखने से मना कर दिया। जिसके कारण लूटी गई महिलाएं फिर उनकी शरण में जाने के लिए विवश हुई। जिसके कारण आज इतने बड़े पैमाने पर भारत में मुस्लिम आबादी है। और सैकड़ों हिन्दुओं को गुलामी में रहना पड़ा।
भारत की 95 फ़ीसदी मुस्लिम आबादी आर्थिक रुप से काफी कमजोर है। सरकार की ओर से पीड़ित मुस्लिम महिलाओं को यदि सरकार ने पर्याप्त आर्थिक सहायता और संरक्षण नहीं दिया। ऐसी स्थिति में भाजपा सरकार की विश्वसनीयता पर असर होगा। यदि केंद्र सरकार ने मुस्लिम महिलाओं को आर्थिक सहायता और संरक्षण दिया, और वह आर्थिक सहायता और संरक्षण यदि हिंदू समाज की महिलाओं को नहीं मिलेगा, तो इसमें एक बड़ा खतरा भारतीय जनता पार्टी को उठाना पड़ सकता है। अभी तक हिंदूवादी संगठन भाजपा के पक्ष में इसलिए खड़े हो रहे थे कि वह मुस्लिम विरोधी हैं अब भाजपा की एक नई छवि सामने आ रही है। जिस तरह ट्रिपल तलाक को लेकर मुस्लिम महिलाएं शोषित हो रही थी। कुछ इसी तरह की स्थिति हिंदू महिलाओं की भी हैं। भारत में पिछले कुछ वर्षों में हिंदुओं के बीच में भी बड़े पैमाने पर तलाक शुरू हो गए हैं। तलाक के बाद यहां एक बड़ी हिन्दू आबादी महिलाओं को आर्थिक सहायता और गुजारा भत्ता उपलब्ध नहीं करा पाती है। बहुत लोगों की ऐसी स्थिति नहीं है, कि वह आर्थिक सहायता दे सकें। ऐसी स्थिति में हिंदू महिलाओं का दबाव भी सरकार पर पड़ेगा। ट्रिपल तलाक को लेकर जिस तेजी के साथ सरकार ने मुस्लिम महिलाओं का साथ दिया है। उससे हिंदू महिलाएं भी प्रभावित होंगी और वह भी सरकार से अपेक्षा करेंगी कि सरकार उनकी आर्थिक और सामाजिक जरूरतों को पूरा करे। इसके दीर्घकालीन परिणाम क्या होंगे। अभी कहना मुश्किल है प्रथम चरण में भाजपा के दोनों हाथ में लड्डू है। भारत में स्वतंत्रता के बाद लोकतंत्र में वोटों के बंटवारे के लिए हिंदू, मुस्लिम, एसटी-एससी, पिछड़ा वर्ग के नाम पर जो ध्रर्वीकरण समय-समय पर भारतीय सामाजिक व्यवस्था में हुए। अब उसका नया रूप, महिला और पुरुषों के बंटवारे के रूप में देखने को मिल रहा है। भविष्य में महिला और पुरुषों, आधारित राजनीति महत्वपूर्ण साबित होगी। सरकार को यह भी ध्यान में रखना होगा। महिलाएं केवल आर्थिक रूप से नहीं, वरन सत्ता में भागीदारी के लिए भी खुलकर मैदान में है। ट्रिपल तलाक के मामले में महिलाओं की बड़ी जीत सत्ता में भागीदारी के लिए भी उग्र होंगीं।
(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए लेखक के निजी विचार हैं। दस्तक टाइम्स उसके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।)