दस्तक-विशेषराष्ट्रीय

डाक्टरी की पढ़ाई के नाम पर तमाशा क्यों

नीट पीजी कट-ऑफ विवाद : सरकार को अब ये साबित करना होगा कि इससे पढ़ाई के स्तर पर बुरा असर नहीं पड़ेगा

नीट पीजी 2025 के कट-ऑफ में भारी कमी ने देशभर में आक्रोश पैदा कर दिया, जिससे चिकित्सा योग्यता, रोगी सुरक्षा और भारत में स्नातकोत्तर डायग्नस्टिक ट्र्रेंनग के भविष्य को लेकर गंभीर्र ंचताएं पैदा हो गई हैं। आलोचकों का कहना है कि इतने कम अंकों पर रिक्त स्नातकोत्तर सीटों को भरना स्वास्थ्य सेवा मानकों और जनता के विश्वास को कमजोर करता है। लेकिन सरकार का तर्क है कि ये सब पहले से डाक्टर हैं। हर साल कई सीटें खाली रह जाती हैं, इसलिए कट-ऑफ कम करना पड़ता है, ताकि सीटें भरी जा सकें। इस विवाद पर दस्तक टाइम्स के संपादक दयाशंकर शुक्ल सागर की एक रिपोर्ट।

दुनिया के गरीब से गरीब मुल्क भी अपने डाक्टरों की योग्यता पर कोई समझौता नहीं करते। डाक्टर को इतना योग्य तो होना चाहिए कि वह रोगी के मर्ज की पहचान कर उसका इलाज कर सके। यह तभी संभव है जब डाक्टर अपनी पढ़ाई पूरी करे और अगर टॉप न करे तो कम से कम अच्छे नम्बरों से पास हो जाए। इससे कम में डाक्टरी जैसा पेशा संभव नहीं। अन्य इंजीनिर्यंरग, मैनेजमेंट जैसी लोकप्रिय नौकरियों में आप वक्त के साथ अपना कौशल बढ़ा सकते हैं क्योंकि उसमें किसी की जान का खतरा नहीं। लेकिन कम से कम डाक्टरी के पेशे के साथ यह संभव नहीं है। जानते-बूझते और पूरे होशोहवास में, नीतिगत फैसला करके अयोग्य डाक्टरों के हाथ में मरीज की जान के साथ खिलवाड़ करना जीवन जीने की आजादी के मौलिक अधिकारों के खिला़फ है। हालांकि सरकार का तर्क है कि ये सब पहले से डाक्टर हैं। हर साल कई सीटें खाली रह जाती हैं, इसलिए कट-ऑफ कम करना पड़ता है, ताकि सीटें भरी जा सकें। लेकिन सुप्रीम कोर्ट जवाब से पूरी तरह संतुष्ट नहीं। सभी पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट अब यह जानना चाहता है कि क्या कट-ऑफ बहुत कम करने से मेडिकल शिक्षा की क्वालिटी खराब होगी? सरकार को यह साबित करना होगा कि इससे पढ़ाई के स्तर पर बुरा असर नहीं पड़ेगा।

भारत में पोस्टग्रेजुएट मेडिकल कोर्सेज में एडमिशन के लिए आयोजित की जानी वाली नीट पीजी प्रवेश परीक्षा के कट-ऑफ के ताजा विवाद ने भारत के चिकित्सा जगत के सामने अब तक का सबर्से ंचताजनक सवाल खड़ा कर दिया है। कम अंकों वाले उम्मीदवार जोखिम भरे चिकित्सा क्षेत्रों में प्रवेश पा रहे हैं? सवाल है कि क्या हम चिकित्सा के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों की खाली सीटों के लिए मरीजों की सुरक्षा की बलि लेने जा रहे हैं? इसे लेकर देश में जबरदस्त गुस्सा है जो जायज़ भी है। सोशल मीडिया पर पिछले दिनों जो खबरें फैलीं वह डरावनी थीं। रोहतक के एक सरकारी मेडिकल कॉलेज में एमएस ऑर्थोपेडिक्स की सीट एक ऐसे उम्मीदवार को आवंटित की गई जिसने 800 में से केवल 4 अंक हासिल किए थे। तमिलनाडु के एक सरकारी मेडिकल कॉलेज में फिजियोलॉजी की सीट -12 अंक प्राप्त करने वाले उम्मीदवार को आवंटित की गई। जबकि दिल्ली के एक प्रमुख मेडिकल संस्थान में प्रसूति एवं स्त्री रोग की सीट 44 अंक प्राप्त करने वाले उम्मीदवार को मिली। सबसे खतरनाक यह कि जनरल सर्जरी की सीट केवल 47 अंक प्राप्त करने वाले उम्मीदवार को मिल गई। नीट पीजी की यह परीक्षा देने और ऐसे अंक हासिल करने वाले वे लोग हैं जिन्होंने बाकायदा पांच साल तक किसी मेडिकल कालेज में पढ़ाई पूरी कर एमबीबीसी डिग्री हासिल की है और वह बाकायदा डाक्टर बन चुके हैं। नीट पीजी उन्होंने इसलिए दिया ताकि किसी अस्पताल में वह मेडिकल ट्र्रेंनग लेकर एमएस या एमडी की डिग्री हासिल कर लें। स्नातकोत्तर यानी पीजी मेडिकल ट्र्रेंनग ही यह निर्धारित करती है कि बड़े अस्पतालों में कौन आईसीयू का संचालन करेगा, चिकित्सा प्रबंधन और किसी क्रिटिकल केस में मरीज का जीवन बचाने के बारे में निर्णय लेगा।

सरकार ने बदल दी अपनी ही पॉलिसी
नए साल में यह धमाका अचानक हुआ जिसने चिकित्सा जगत में सनसनी फैला दी। अयोग्यों की पात्रता कम करने की यह नीति सरकार के पहले के रुख से एकदम अलग थी। बहुत दूर नहीं 2022 की बात है। दिल्ली हाईकोर्ट में नीट पीजी के कट-ऑफ को कम करने की याचिका का विरोध करते हुए, केंद्र सरकार ने तर्क दिया था कि चिकित्सा शिक्षा के मानकों को बनाए रखने के लिए न्यूनतम योग्यता प्रतिशत जरूरी हैं। न्यायालय ने इस बात से सहमति जताते हुए चेतावनी दी थी कि चिकित्सा जैसे जीवन-मरण से जुड़े पेशे में मानकों में ढील देने से समाज पर गंभीर परिणाम हो सकते हैं। लेकिन 2026 में केन्द्र सरकार ने अचानक यूटर्न ले लिया। नीट पीजी 2025 के परिणाम 19 अगस्त, 2025 को घोषित किए गए थे। लेकिन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने 2025-26 शैक्षणिक सत्र के लिए 9 जनवरी, 2026 के एक पत्र में नीट पीजी पात्रता मानदंड को काफी कम करने का फैसला लिया। और राष्ट्रीय चिकित्सा विज्ञान परीक्षा बोर्ड (एनबीईएमएस) ने स्नातकोत्तर चिकित्सा परामर्श के लिए अर्हता प्रतिशत में भारी कमी की बाकायदा अधिसूचना 13 जनवरी को जारी कर दी। इसमें मानदंडों को नीचे गिराया गया। इन संशोधित मानदंडों के तहत, सामान्य वर्ग के लिए कट-ऑफ स्कोर पहले के 276 से घटाकर 103 कर दिया गया। अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए कट-ऑफ पहले के 235 से घटाकर -40 कर दिया गया।

कट-ऑफ को काफी कम करने के फैसले का तत्काल और विवादास्पद परिणाम सामने आया, जिसके तहत सरकारी संस्थानों में स्नातकोत्तर सीटें, यहां तक कि उच्च जोखिम वाली क्लिनिकल शाखाओं में भी, असाधारण रूप से कम अंकों वाले उम्मीदवारों को आवंटित की गईं। स्नातकोत्तर काउंर्संलग के तीसरे राउंड में इसका प्रभाव साफ तौर से सामने आया, जहां डायग्नोस्टिक और गैर-डायग्नोस्टिक दोनों विषयों में उम्मीदवारों ने एकल अंक से लेकर दो अंक तक के अंकों के साथ सरकारी संस्थानों में सीटें हासिल कीं। यहां तक कि प्रतिष्ठित कॉलेजों और प्रमुख विशिष्टताओं में भी असामान्य रूप से कम अंकों पर सीटें आवंटित की गईं। इसका असर यह हुआ कि बेहद कम और कुछ मामलों में नकारात्मक स्कोर वाले उम्मीदवार भी काउंर्संलग के लिए अर्हता हासिल करने में सफल हो गए। इसका प्रभाव सभी विषयों में दिखाई दिया। ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन में 10 अंकों, एनाटॉमी में 11 अंकों और यहां तक कि बायोकेमिस्ट्री में -8 अंकों के आधार पर सीटें आवंटित की गईं, खासकर आरक्षित और दिव्यांगजन श्रेणियों के तहत। साफ है इस संशोधित मानदंडों ने यह सुनिश्चित किया कि स्नातकोत्तर सीटें खाली न रह जाएं। सरकारी मेडिकल कॉलेज के एक वरिष्ठ संकाय सदस्य ने मौजूदा परामर्श प्रणाली को ‘गंभीर रूप से त्रुटिपूर्ण’ बताया और तर्क दिया कि व्यक्तिगत परीक्षाओं के बावजूद ऑनलाइन प्रवेश आयोजित करने से यह प्रक्रिया ‘योग्यता-आधारित चयन के बजाय लॉटरी’ में तब्दील हो गई।

कट-ऑफ क्यों करना पड़ा कम ?
इस विवाद ने जोर पकड़ा तो सरकार को भी संसद में जवाब देना पड़ा। अपने फैसले का दृढ़तापूर्वक बचाव करते हुए स्वास्थ्य राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल ने संसद में कहा कि ‘सीटों के बड़े पैमाने पर दुरुपयोग को रोकने के लिए यह कदम जरूरी था।’ आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, एमसीसी के माध्यम से पेश की गई 29,476 स्नातकोत्तर सीटों में से, दूसरे दौर के बाद 9,621 सीटें खाली रह गईं, जबकि डीएनबी सीटों सहित देश भर में लगभग 20,000 सीटें खाली रह गईं। पटेल ने लिखित जवाब में कहा, ‘पिछले शैक्षणिक वर्षों की तरह, जो अधिकतम सीट उपयोग सुनिश्चित करने में प्रभावी साबित हुए थे, योग्यता प्रतिशत को कम कर दिया गया है ताकि बहुमूल्य पीजी मेडिकल सीटें खाली न रहें।’ ‘बहुमूल्य पीजी मेडिकल सीटों’ से उनका मतलब था कि अस्पतालों में पीजी की ट्र्रेंनग के लिए एक बड़ा और महंगा इन्फ्रास्ट्रकचर तैयार है। यह एक तरह से एमबीबीएस स्नातकों की आगे की पढ़ाई का रास्ता खोलता है। जब पढ़ने वालों की संख्या की कम होगी तो संसाधनों का नुकसान होगा। सवाल सिर्फ संसाधनों के नुकसान का नहीं है। यह एक राजनीतिक मुद्दा भी है। अक्सर सरकारें इसलिए बदनाम की जाती हैं कि एससी एसटी की आरक्षित सीटों खाली रह जाती हैं। इसके लिए विपक्ष सरकार की इच्छाशक्ति को जिम्मेदार ठहराता है। इस तरह सरकारों को चाहें वह राज्य की हों या केन्द्र की उन्हें जातीय राजनीति का दबाव झेलना पड़ता है। इस तरह प्रशासनिक मजबूरी या राजनीतिक दबाव के रूप में शुरू हुआ यह मामला अब सरकार के लिए एक गंभीर नैतिक दुविधा में तब्दील हो गया है। इससे न केवल सरकार बल्कि पूरे देश को योग्यता, जवाबदेही और भारतीय चिकित्सा के भविष्य से जुड़े असहज सवालों का सामना करना पड़ रहा है।

खौ़फनाक संदेश
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि अयोग्य एमबीबीएस छात्रों को लोगों र्की ंजदगी के साथ खिलवाड़ की इजाजत दे दी जाए। यह संदेश ही ़खौ़फनाक है कि कम अंकों वाले उम्मीदवार जोखिम भरे चिकित्सा क्षेत्रों में प्रवेश पा रहे हैं, जहां निर्णय संबंधी गलतियां जानलेवा साबित हो सकती हैं। यह सवाल उन लाखों लोगों की सुरक्षा भी जुड़ा है जो अपना जीवन इस व्यवस्था के हाथों में सौंपते हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर व्यथित प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई, जिनमें से कुछ तीखी और्र ंचताजनक थीं। चिकित्सा जगत ने चेतावनी दी है कि स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा का मकसद उन्नत नैदानिक विशेषज्ञता का निर्माण करना है, न कि कमजोर मूलभूत प्रशिक्षण की भरपाई करना। बेहद कम प्रदर्शन करने वाले उम्मीदवारों को प्रमुख डायग्नोस्टिक विशेषताओं में प्रवेश देने से रोगी सुरक्षा को खतरा हो सकता है और भारत की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली की विश्वसनीयता और मानकों को स्थायी नुकसान पहुंच सकता है। कई डॉक्टर्स एसोसिएशन और यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ताओं का भी मानना है कि इस तरह के कमजोर योग्यता मानदंड, योग्यता आधारित चयन प्रणाली को कमजोर करते हैं, जो विशेष चिकित्सा प्रशिक्षण की रीढ़ है। उनके अनुसार, डर केवल शैक्षणिक गिरावट का नहीं है, बल्कि डॉक्टरों और चिकित्सा संस्थानों में जनता के विश्वास के धीरे-धीरे कम होने का भी है।

सुप्रीम कोर्ट शायद निकाले कोई रास्ता
विवाद बढ़ा तो योग्यता मानदंड को कम करने के फैसला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। सामाजिक कार्यकर्ता हरिश्रन देवगन ने डॉक्टरों सौरभ कुमार, लक्ष्य मित्तल और आकाश सोनी के साथ मिलकर सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की। इन याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा के लिए न्यूनतम पात्रता मानकों में ढील देना मनमाना और असंवैधानिक है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करता है। ये कदम मरीजों की सुरक्षा, जन स्वास्थ्य और चिकित्सा पेशे की गरिमा को गंभीर रूप से खतरे में डाल सकता है। याचिका में यह भी तर्क दिया गया है कि स्नातकोत्तर स्तर पर योग्यता मानकों को कम करना स्थापित कानूनी सिद्धांतों और राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) के वैधानिक जनादेश के विपरीत है। तर्क सुनने के बाद बेंच ने कहा- ‘यह मानकों के बारे में है। सवाल यह है कि क्या उन मानकों से समझौता किया जा रहा है?’

बैंच ने कहा- ‘हमें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि यह तरीका क्यों अपनाया गया। ये सभी नियमित डॉक्टर हैं।’ कोर्ट ने सरकार से जवाब तलब किया तो कुछ दिन बाद सरकार ने कोर्ट में तर्क दिया कि नीट पीजी देने वाले पहले से डॉक्टर हैं तो काबिलियत का सवाल ही नहीं। सरकार की तरफ से पेश हुए वकील एएसजी ऐश्वर्या भाटी अपना तर्क रखते हुए सुप्रीम कोर्ट को बताया कि हर साल कई सीटें खाली रह जाती हैं, इसलिए कट-ऑफ कम करना पड़ता है, ताकि सीटें भरी जा सकें। नीट-पीजी सिर्फ एक रैंक लिस्ट है, इसका मकसद यह चेक करना नहीं है कि डॉक्टर काबिल है या नहीं, क्योंकि वे पहले से ही डॉक्टर हैं। इसका मकसद उपलब्ध सीटों के लिए डॉक्टरों के बीच एक मेरिट लिस्ट तैयार करना है। सरकार ने कहा कि 2017 से ही सीटें भरने के लिए कट-ऑफ कम की जाती रही है। 2023 में तो इसे घटाकर ‘जीरो’ तक कर दिया गया था। सरकार ने अपने हलफनामे में कहा कि शैक्षणिक सत्र 2025-26 के लिए कुल उपलब्ध सीट लगभग 70,000 थीं, जो अभ्यर्थियों की कुल संख्या 2,24,029 के अनुरूप हैं। इस पर जस्टिस नरसिम्हा ने कहा कि हालांकि केंद्र सरकार का यह कहना उचित है कि नीट-पीजी परीक्षा एमबीबीएस में प्रवेश का माध्यम नहीं है और अभ्यर्थी पहले से ही डॉक्टर हैं, फिर भी कोर्ट ‘कट-ऑफ’ कम करने के प्रभाव पर विचार करना चाहेगा।

कोर्ट ने कहा कि शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ने वाला प्रतिकूल प्रभाव ही हमारी सबसे बर्ड़ी ंचता है। यह गुणवत्ता का मामला है। कोर्ट ने एनबीईएमएस से कहा कि उसको यह साबित करना होगा कि कट ऑफ में इतनी भारी कमी से शिक्षा की गुणवत्ता पर बहुत कम असर पड़ेगा। अब इस मामले पर अगली सुनवाई 24 मार्च को होगी लेकिन इनकी गुणवत्ता साबित करना भी आसान नहीं। यह सच है कि सबने डाक्टरी की पढ़ाई पूरी कर ली है। लेकिन इसके बावजूद ये अभ्यर्थी 800 में से चार नम्बर ला रहे हैं। कईयों को तो नेगेटिव मार्किंग के बावजूद दाखिला देना पड़ा। इसके बाद भी उन्हें उच्च मेडिकल शिक्षा में आगे पढ़ने का अवसर दिया जा रहा है। यह शिक्षा के नाम पर मज़ाक है।

Related Articles

Back to top button