उत्तर प्रदेशदस्तक-विशेष

बड़े नाटक का कमजोर रिहर्सल

अनिल सिन्हा
इसमें शक की कोई गुंजाइश नहीं है कि उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों के विधान सभा चुनाव 2019 में होने वाले आम चुनाव के छोटे संस्करण के रूप में सामने आए हैं। अगर आम चुनाव को बड़ा नाटक माना जाए तो ये चुनाव उसके रिहर्सल थे। लेकिन ये रिहर्सल बड़े ही कमजोर साबित हुए। इन्होंने न तो लोगों में कोई बड़ा उत्साह जगाया और न ही कोई ऐसा उदाहरण सामने लाया जो भविष्य की राजनीति में हमारी आस्था मजबूत करे। 2019 के आम चुनाव भारतीय लोकतंत्र के लिए अहम और दूरगामी प्रभाव वाले हैं। अगर इसकी तुलना पहले के किन्हीं चुनावों से हो सकती है तो वह है आपातकाल का बाद 1977 के चुनाव हैं जिसने भारतीय लोकतंत्र को तानाशाही से बचाया। आने वाले लोंकसभा चुनाव भी भारतीय लोकतंत्र के सामने खड़ी हो गईं ऐसी चुनौतियों के दौर में आ रही हैं। देश की संवैधानिक संस्थाओं पर लगातार प्रहार हो रहे हैं। सांप्रदायिक और कारपोरेट घरानों के इशारों पर नाचने वाली शक्तियां ताकतवर हो रही हैं। लोकतंत्र पर एक बड़ा खतरा मंडरा रहा है। लेकिन अभी-अभी हुए विधानसभा चुनावों में नेताओं और पार्टियों के कमजोर प्रदर्शन से यही लगता है कि देश की राजनीति में बड़ी तब्दीली का इरादा तो किसी पार्टी या नेता में नहीं ही बचा है, वे लोकतंत्र के सामने आ गए अभी के खतरों से टकराने में भी सक्षम नहीं हैं। चार राज्य-पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर तो अपनी स्थानीय समस्याओं में इस तरह उलझे हैं कि उनसे बड़ी चुनौतियों से लड़ने की उम्मीद करना उचित नहीं है। लेकिन उत्तर प्रदेश जैसा बड़ा राज्य, जो हमारी लोकसभा में अस्सी सीटें भेजता है, ने भी कोई आशा नहीं जगाई। पिछले आम चुनावों में इसने सत्तारूढ़ पार्टी के लिए 73 सदस्य चुने हैं। इस मिनी नाटक या रिहर्सल के मूल्यांकन में हमें सबसे पहले किरदारों पर गौर करना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी स्थानीय चुनावों से लेकर संसद के लिए हो रहे सभी चुनावी संघर्षों में मंच पर ऐसे धूम-धड़ाके के साथ उतरती है मानो वह सब कुछ बदल देगी। लेकिन युवा चेहरों के नाम पर इसने जिन्हें मैदान में उतारा है उसमें ज्यादातर पुराने नेताओं के पुत्र आदि ही हैं। मुख्यमंत्री का कोई उम्मीदवार भी वह नहीं दे पाई।
इस मामले में राज्य की सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी की स्थिति थोड़ी बेहतर रही। उसने अखिलेश यादव के रूप में एक भरोसे लायक चेहरा सामने लाया। अपनी बुद्धि या परिस्थितियों की वजह से अखिलेश ने उत्तर प्रदेश और देश के राजनीतिक मंच पर अपने लिए जगह बनाई है। पिता दशरथ के आदेश पर वनवास लेने वाले राम का अनुकरण करने के बदले उन्होंने एक विद्रोही की भूमिका निभाई और उद्दंड दिखाई देने से भी ख्ुाद को बचाया। मुलायम के परिवार की दो बहुओं-डिंपल और अपर्णा को छोड़ कर उनके परिवार के बाकी सदस्य के लिए भी गुम हो जाने की स्थिति पैदा हो गई है। इस चुनाव के खत्म होते-होते सपा का भीतर का माहौल पूरी तरह बदल जाने वाला है। मुलायम के संरक्षण में पले शिवपाल यादव सरीखे नेताओं की जगह अखिलेश की पसंद के लोग नेतृत्व की पहली कतार में नजर आएंगे।
कमोबेश यही स्थिति कांग्रेस की भी रहेगी। कांग्रेस की कमान अब पूरी तरह राहुल गांधी के हाथ में आ गई है। अगर सपा में मुलायम और उनके समकालीन पृष्ठभूमि में चले गए हैं तो कांग्रेस में सोनिया गांधी ने भी अपने को पीछे हटा लिया है। मुलायम ने मजबूरी में ऐसा किया है या जानबूझ कर यह कभी किसी खुलासे के जरिए ही बाहर आएगा। लेकिन सोनिया गांधी के मामले में यह साफ तौर पर जानबूझकर अपनाई गई रणनीति थी। उन्होंने राहुल गांधी को खुल कर सामने आने दिया। राहुल ने भी आत्मविश्वास का अच्छा प्रदर्शन किया। उन्होंने भाषण की ठीक-ठाक शैली विकसित कर ली है और अपने को बेहतर ढंग से अभिव्यक्त करने लगे हैं। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों ने उन्हें अभ्यास का अच्छा मौका दिया। हालांकि उनकी असली परीक्षा तो 2019 में होगी। कांग्रेस ने पहले की तरह प्रियंका गांधी के चेहरे का भी सीमित ढंग से ही उपयोग किया। राज्य में एक और सशक्त पार्टी है बहुजन समाज पार्टी। लेकिन इसका चेहरा लंबे समय से मायावती ही हैं और 2019 क्या, उससे आगे भी किसी और के सामने आने के आसार नहीं हैं। लेकिन अपने तेज राजनीतिक हमलों के बावजूद उन्होंने तीखेपन वाली अपनी पुरानी शैली को हावी नहीं होने दिया और गैर-जरूरी तू तू, मैं मैं से इन चुनावों को बचा लिया। अगर पूरे परिदृश्य पर नजर डालें तो उत्तर प्रदेश में आने वाले लोंकसभा चुनावों में ज्यादातर नए चेहरे ही सामने होंगे। एक और बात पर हमारी नजर जानी चाहिए कि पार्टियों में हावी व्यक्तियों ने कन्हैया कुमार जैसे किसी नए चेहरे को सामने नहंी आने दिया जो राजनीति में नई ऊर्जा पैदा कर सके।
क्या पुराने चेहरों के पृष्ठभूमि में चले जाने और कुछ नए चेहरों के सामने आने से राज्य की राजनीति बदलेगी? मेरी नजर में इस सवाल का उत्तर नकारात्मक ही है। फिलहाल चेहरों के बदलने से उत्तर प्रदेश या देश की राजनीति में किसी बुनियादी बदलाव की उम्मीद नहीं बंधती है। हम चुनावी मुद्दों पर गौर करें तो यही लगेगा कि सभी पार्टियों की आर्थिक नीतियां और कार्यक्रम एक ही छापेखाने से निकले हैं। सभी पार्टियां बुनियादी ढांचों-सड़क, बिजली, पानी की बातें करती हैं। वे युवाओं को रोजगार, वंंचत वर्गों को सामाजिक सुरक्षा-पेंशन और किसानों को मदद देने की बात करती हैं। हर एक का कहना है कि वह विकास की गति को तेज करेगी। हर पार्टी का यह दावा भी है कि यह काम केवल वही कर सकती है, दूसरी नहीं।
विचारधारा की ऐसी एकता हमारे लोकतंत्र में कभी नहीं दिखी थी। मेरे ख्याल में ऐसी वैचारिक एकता दुनिया के किसी और देश में भी नहीं है। यूरोप में भी नए पूंजीवाद और नस्लभेद के समर्थन में खड़ी हुई दक्षिणपंथी पार्टियों के सामने उदारवादी पार्टियां और समूह खड़े हैं जो उनके नस्ल भेद, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे मुद्दों को लेकर उनसे टकरा रहे हैं। कामगारों के अधिकार और पर्यावरण जैसे मुद्दों पर जबर्दस्त टकराव है। ट्रंप का विरोध इसका एक उदाहरण है लेकिन ऐसा टकराव भारत में नही दिखाई देता है। पांच राज्यों के चुनावों में भी यह टकराव कहीं नजर नहीं आया। पिछड़ों का नेतृत्व करने वाले अखिलेश या दलितों का नेतृत्व करने वाली मायावती के पास भी अपने समूहों को मुुफलिसी से बाहर निकालने का कोई आर्थिक खाका नहीं है जो उनके पीछे चल रहे लोगों की पीड़ा खत्म कर सके। राहुल गांधी जरूर मोदी पर खुला प्रहार करते हैं कि वह कारपोरेट घरानों और धन्ना सेठों के प्रतिनिधि हैं। लेकिन कांग्रेस की नीतियों में अमीरों के खिलाफ बड़ी लड़ाई लड़ने की कोई रणनीति नजर नही आती। देश में बाहरी पूंजी लाने और राज्यों में देश की बड़ी पूंजी लाने की नीति सभी पार्टी की है। इस नीति में कामगारों के हक कम करने, पानी और बिजली, जमीन लगभग मुफ्त देने की सहूलियतों का वायदा पूरी तरह शामिल है। आर्थिक विचारों में इस एकता के बावजूद कुछ पार्टियों के बीच के बारीक फर्क जो इन चुनावों में सामने आए हैं, उनकी चर्चा भी जरूरी है। 2019 के चुनावों तक पहुंचते-पहुंचते ये फर्क गहरे भी हो सकते हैं। ये फर्क नोटबंदी जैसे अलोकतांत्रिक फैसले के विरोध में नजर आते हैं। इस बात को साबित करने के लिए ज्यादा मेहनत की जरूरत नहीं है कि नोटबंदी का फैसला बड़ी पूंजी के आर्थिक संकट को दूर करने के लिए किया गया था। अर्थव्यवस्था के कमजोर होने और कारपोटेट घरानों की ओर से लिए गए कर्ज के वापस नहीं किए जाने से खस्ताहाल हुए बैंकों को चलाने के लिए पैसा जुटाने के लिए यह कदम उठाया गया है। बैंकों में नोट वापस आने से उद्योगों को कर्ज मिलना आसान हो जाएगा। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का यह कथन सोलह आने सही है कि यह एक’’संगठित लूट’’ थी जिसने हाथ और छोटी मशीन से काम करने वालों को भारी मुश्किलों में डाल दिया क्योंकि उनका कारोबार नगदी में चलता था।
भाजपा के विरोध में खड़ी पार्टियों ने इस मुद्दे को चुनाव-प्रचार के दौरान ताकत से उठाने की कोशिश की, भले ही मीडिया का पूरा सहारा नहीं मिलने और जरूरी तैयारी नहीं कर पाने के कारण इस विरोध को वे पूरी ऊंचाई नहीं दे पाए। चुनाव नतीजे ही बताएंगे कि नोटबंदी का कोई असर हुआ या नहीं। आर्थिक विचारों में भाजपा और बाकी पार्टियों के बीच के इन बारीक फर्कों को वामपंथी पार्टियां ज्यादा गहरा बना सकती थीं, लेकिन दुर्भाग्य से वे ऐसा नहीं कर पाईं क्योंकि तमाम कार्यक्रमों के बावजूद उत्तर भारत में पांव पसारने और गरीबों की पार्टी बनने का मौका वे हासिल नहीं कर पायीं।
आर्थिक विचारों के इस साम्य को छोड़ दें तो उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनावों से यह जरूर साबित हुआ कि समाज को बांटने वाले नारों का असर काफी कम हुआ है। मोदी के आते ही भाजपा और आरएसएस ने हिदुंत्व के एंजेंडे को राजनीति में लाने की कोशिश तेज कर दी थी। उन्होंने लव जिहाद, गोरक्षा और राष्ट्रवादी बनाम राष्ट्रद्रोही जैसे मुद्दों को लेकर न केवल बहस तेज कर दी थी, बल्कि अल्पसंख्यकों पर आक्रमण भी शुरू कर दिए थे। हिंदुत्व के असर का ही नतीजा था कि उत्तर प्रदेश और हरियाणा के जाट बहुल इलाकों में मुसलमानों तथा जाट के बीच का परंपरागत जोड़ पूरी तरह टूट गया था और गांवों तथा कस्बों में अल्पसंख्यकों का जीना मुश्किल हो गया था। लेकिन विधानसभा चुनावों के आते-आते हिंदुत्व की यह लपट धीमी हो गई। इसकी एक वजह चुनाव में जाति और मजहब के इस्तेमाल पर लगी सुप्रीम कोर्ट की रोक भी हो सकती है। इस रोक की वजह से भाजपा के योगी आदित्यनाथ और साक्षी महराज जैसे नेताओं को खुली छूट नही मिल पाई। भाजपा नेताओं को अपने को इस हद तक काबू में रखना पड़ा कि दादरी के चुनाव प्रचार में किसी ने अखलाक की हत्या का मामला नहीं उठाया। हां, यह कलंक भारतीय लोकतंत्र पर सदा के लिए लग गया कि भय के मारे अखलाक के परिवार ने वोट नहीं डाले।
ये हमारे लोकतंत्र की जड़ों के कमजोर होने के संकेत हैं। सांप्रदायिकता को हद में रखने का काम सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के फैसले से नहीं हुआ है, बल्कि आम लोगों के नकार का भी परिणाम है। प्रधानमंत्री मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने पाक के कब्जे वाली कश्मीर में की गई ’सर्जिकल स्ट्राइक’ के किस्से खूब सुनाए और कई टीवी चैनलों ने भी तीन तलाक समान नागरिक कायदा कानून और पाकिस्तान की ओर से भेजे जा रहे है आतंकवाद जैसे विभिन्न मुद्दों के जरिए सांप्रदायिकता को हवा देने की कोशिश की, लेकिन लोगों ने वैसा उत्साह नहीं दिखाया जिसकी उम्मीद वे कर रहे थे। लोग इस समस्या का हल बिना किसी राजनीतिक दखल के किस तरह कर सकते हैं यह पश्चिम उत्तर प्रदेश में नजर आया। दंगा प्रभावित क्षेत्रों में सांप्रदायिक विभाजन की कोशिश काफी पहले से चल रही थी और कैराना के पलायन जैसे मुद्दों को खूब उछाला जा रहा था। लेकिन बहुसंख्यक और ताकतवर जाट समुदाय ने आपस का वैमनस्य मिटाने का फैसला कर लिया। चुनाव के नतीजे कुछ भी हों, लेकिन बैर का दृश्य चुनावों में सामने नही आया। संभव है अजीत सिंह के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय लोक दल को कुछ सीटें भी मिल जाएं।
क्या इसका मतलब यह है कि यूपी के चुनावों में जाति और धर्म के भेद मिट गए? नहीं, ऐसा नहीं है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला भले ही चुनाव में इनके इस्तेमाल पर पाबंदी लगाने का है, राज्य की कई पार्टियां खुले तौर पर जातिवादी और सांप्रदायिक गोलबंदी के आधार पर खड़ी दिखीं। पीस पार्टी, महान दल, अपना दल, निषाद पार्टी और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी जैसी पार्टियां ऐसी ही हैं। इसके अलावा ओबेदुल्ला ओवैसी की एमआइएम पार्टी भी सामने आ चुकी हैं। अगर पीस पार्टी और ओवेसी की पार्टी खुले तौर पर मुसलिम हितों का वकालत करती है तो अपना दल कुर्मी, निषाद पार्टी मछुआरों और महान दल कुशवाहों और सुहेलदेव राजभरों की पार्टी है। इन पार्टियों के साथ हाथ मिलाने और उन्हें प्रश्रय देने में कोई पार्टी पीछे नहीं है। अपना दल से भाजपा ने हाथ मिलाया हुआ है और पीस पार्टी को सपा-कांग्रेस गठबंधन का सहारा है।
2019 के बड़े नाटक के इस रिहर्सल में चुनाव को साफ सुथरा बनाने की बरसों से चली आ रही जद्दो-जहद का क्या हाल है? करोड़पतियों और अपराधियों की संख्या पहले जैसी ही रहीं और सभी पार्टियों ने उनका स्वागत बाहें पसार कर किया। नोटबंदी को लेकर हुए बड़े-बड़े दावों के बावजूद चुनाव खर्च में किसी तरह की कमी आई नहीं दिखती। इसके बदले चुनाव काफी खर्चीला रहा। लोगों का मन बनाने का तरीका भी लगातार संगठित हो रहा है।
हर पार्टी ने अपना ‘वार रूम‘ चलाया जहां से दुश्मनों पर प्रहार के मिसाइल छूटते रहे। चुनाव प्रचार का काम विदेशों की छवि बनाने वाली कंपनियों के हाथ में था जो लोगों का मन बदलने का नुस्खा तैयार करती हैं। मैंने प्रचार विशेषज्ञ प्रशांत किशोर से सुना है कि चुनाव सभाओं में मंच पर बैठने वालों की संख्या और बोलने वालों का क्रम भी पहले से तैयार किया जाता है। भीड़ जुटाने का ठेका तो सालों पहले से दिया जा रहा है। अब ये नए खर्च भी इसमें जुड़ गए हैं। इस बेपनाह खर्च को रोकने का मौका चुनाव आयोग ने एक बार और गंवा दिया। मीडिया में पेड न्यूज के खिलाफ कार्रवाई का एक मामले को छोड़कर कोई दूसरा मजबूत उदाहरण दिखाई नहीं पड़ा। 2019 के दंगल के पहले मैदान को साफ-सुथरा करने का काम चुनाव आयोग नहीं कर पाया। हम बड़े नाटक के कमजोर रिहर्सल से ही रूबरू हुए।

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