मेरी कलम से…

रामकुमार सिंह
2019 के लोकसभा चुनावों की तैयारी में भाजपा जोर-शोर से लग गयी है जिसकी शुरुआत संघ ने ‘हिंदुत्व’ के चेहरे के रूप में योगी आदित्यनाथ को आगे करने के फैसले के रूप में की है, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा मगहर में कबीर की स्थली से अपनी चुनावी सभाओं की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। संघ के इस निर्णय में मोदी ने अपनी मौन सहमति जता दी है। जिससे यह साफ हो चुका है कि आगामी लोकसभा चुनावों में स्टार प्रचारक के रूप में योगी ही नरेंद्र मोदी के सारथी बनकर चुनावी रथ को हांकते नजर आयेंगे। भारतीय जनता पार्टी जानती है कि चुनावों की वैतरणी बिना ‘हिंदुत्व’ कार्ड के पार हो नहीं पायेगी। भाजपा और संघ के रणनीतिकार जानते हैं कि विपक्ष कितना भी एकजुटता दिखा ले उसकी काट ‘हिंदुत्व’ ही है। भारत की राजनीति को समझने वाले जानते हैं कि चुनावी मुद्दों में ‘विकास और भ्रष्टाचार मुक्त भारत’ बड़ा मुद्दा हो सकता है मगर जाति धर्म में बंटी भारतीय मानसिकता का दोहन धर्म-सम्प्रदाय के आधार पर ही किया जा सकता है। वर्तमान परिवेश में हिदू-मुस्लिम की खाई इतनी जबरदस्त बढ़ चुकी है कि उसको विकास या भ्रष्टाचार निवारण की बात करके पाटना मुश्किल है इसीलिए भारतीय राजनीति के रणनीतिकार सामने से तो विकास, रोजगार, ईमानदारी और जवाबदेही की बात करते है किंतु वे जानते हैं कि इन बातों से अपने पक्ष में वोट इकट्ठा नहीं किया जा सकता। इसीलिए जहां एक ओर विपक्ष सेकुलरिज्म के बहाने अपना वोट बैंक बनाने की जुगत में लगा है वहीं भाजपा उसकी काट के तौर पर हार्डकोर ‘हिंदुत्व’ की भावना को उभारकर बहुसंख्यक वोट बैंक को अपने पक्ष में करने की जुगत में लग गयी है। जनसमर्थन को और बढ़ाने के लिए भाजपा के पास नरेंद्र मोदी जैसा करिश्माई नेता मौजूद र्है ंकतु सत्ता में रहते हुए उत्पन्न हुईं शासकीय खामियों की भरपाई के लिए दूसरे सबसे चमकदार हिंदूवादी नेता योगी आदित्यनाथ की जरूरत है। राजनीतिक युद्ध में विजय हासिल करने के लिए भाजपा ने मोदी के प्रमुख सेनापति के रूप में योगी-मोदी की जोड़ी को प्रयोगात्मक तौर पर चुनावी समर में उतारने का फैसला किया है।
जम्मू-कश्मीर में पीडीपी से समर्थन वापसी की भाजपा रणनीति भी इसी ओर इशारा करती है। कश्मीर में लगातार बढ़ती आतंकी घटनाओं और पत्थरबाजों के सशक्त विरोध के चलते पूरे देश में केन्द्र सरकार की धूमिल हो रही छवि को समर्थन वापसी से एक ही झटके में साफ करने का प्रयास किया है जो कि पूरे देश के आम चुनावों में हिंदू-मुस्लिम के चश्मे से ही देखा जायेगा, जिसे भाजपा अपनी राजनीतिक सफलता के तौर पर पेश कर रही है। अब देखना यह होगा कि पिछले चुनावों में अचानक बनी मोदी की लोकप्रियता और लोक-लुभावन मुद्दे इस चुनाव में कितने असरदार साबित होंगे। मोदी-योगी की जुगलबंदी फिर से भाजपा को सत्तासीन कर पायेगी या पिछले मुद्दों-वादों की तासीर जनता कुछ नये परिणाम में पेश करेगी ये तो वक्त ही बतायेगा। किंतु चुनावी रणनीति का बिगुल बज चुका है और योगी आदित्यनाथ मोदी के सारथी बनकर विजयरथ की कमान संभाल चुके हैं। देखना यह है कि संघ और भाजपा का यह प्रयोग कितना सफल होता है।