उत्तराखंड

194 साल पुरानी खड़ी होली: पिथौरागढ़ में हिंदू-मुस्लिम की साझा विरासत, मंदिर से जुड़ा है अनोखा इतिहास

पिथौरागढ़ के पुराना चौक बाजार में मनाई जाने वाली खड़ी होली सामाजिक एकता और सांप्रदायिक सौहार्द की ऐसी परंपरा है, जो करीब 194 वर्षों से लगातार चली आ रही है। रंगों के इस पर्व में यहां हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग एक साथ सुर मिलाते हैं। ढोल की थाप पर खड़ी होली का गायन इस बात का प्रमाण है कि त्योहार केवल उत्सव नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने का माध्यम भी होते हैं।

गोरखा शासन के अंत के बाद बसा बाजार, 1939 में शुरू हुआ खड़ी होली गायन

1815 में गोरखा शासन समाप्त होने के बाद जब अंग्रेजों ने प्रशासन संभाला, उसी दौर में पुराना बाजार क्षेत्र में हिंदू और मुस्लिम परिवारों की बसासत एक साथ शुरू हुई। शाह, खत्री, थापा, सार्की, बर्मा, माहरा और कुछ मुस्लिम परिवार यहां आकर बसे और धीरे-धीरे बाजार आकार लेने लगा। अलग-अलग इलाकों से आए इन परिवारों ने मिलकर वर्ष 1939 में खड़ी होली गायन की परंपरा शुरू की। मुस्लिम समुदाय के लोग ढोल बजाते रहे, जबकि हिंदू समुदाय के लोग पारंपरिक खड़ी होली गाते रहे।

पांच से सात पीढ़ियों ने संभाली परंपरा की जिम्मेदारी

समय के साथ पुराना बाजार से धर्मशाला लाइन, सिमलगैर बाजार, नया बाजार और स्टेशन क्षेत्र तक यह परंपरा फैलती गई। इन परिवारों की पांच से सात पीढ़ियों ने अलग-अलग समय में इस होली को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी निभाई। पुराना बाजार के निवासी अकबर खान और भोला भाई बताते हैं कि उनके परिवारों की पांच से अधिक पीढ़ियां पुराना बाजार होली कमेटी से जुड़ी रही हैं। पार्षद सुशील खत्री के अनुसार, यह खड़ी होली सामाजिक सौहार्द का जीवंत उदाहरण है।

मंदिर और मस्जिद के बीच गूंजती है होली, शराब पर सख्त प्रतिबंध

नगर के एक प्राचीन शिव मंदिर और मस्जिद के बीच स्थित चौक बाजार की यह होली कई उतार-चढ़ाव से भी गुजरी है। पिछली शताब्दी के नब्बे के दशक में शराब के बढ़ते प्रचलन ने इस परंपरा को कई बार बाधित किया, लेकिन संकल्पबद्ध लोगों ने इस साझा विरासत को बचाए रखा। वर्तमान में होली में शराब पीकर आने पर पूर्ण प्रतिबंध है। युवा वर्ग इस नियम का सख्ती से पालन करवा रहा है और शराब के नशे में आने वालों को तुरंत बाहर कर दिया जाता है। होली कमेटी के सुनील वर्मा का कहना है कि नई पीढ़ी इस परंपरा के महत्व को समझ रही है और युवाओं को होली गायन का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है।

हाट कालिका मंदिर से जुड़ी है चीर बंधन की परंपरा

पुराना बाजार होली कमेटी का इतिहास गंगोलीहाट स्थित हाट कालिका मंदिर से जुड़ा बताया जाता है। जिले में हाट कालिका मंदिर और चौक बाजार, दोनों स्थानों पर एक ही दिन चीर बांधी जाती है। होली कमेटी के अध्यक्ष त्रिभुवन लाल साह के अनुसार, चौक बाजार की होली की चीर गंगोलीहाट मंदिर से लाई गई थी और तब से यहां चीर बंधन की परंपरा निरंतर निभाई जा रही है। चीर बांधते समय मां हाट कालिका का स्मरण किया जाता है।

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