दस्तक-विशेष

बौद्ध धर्म गुरु दलाई लामा का जन्मदिवस (6 जुलाई विशेष)

विवेक ओझा

नई दिल्ली: आज दुनिया भर में बौद्ध धर्म के सच्चे प्रतिनिधि और भारत सरकार के पुराने सहयोगी दलाई लामा का जन्मदिन है । 6 जुलाई को हर साल दुनिया भर के बौद्ध धर्मावलंबियों द्वारा हर्ष उल्लास के साथ दलाई लामा का जन्म दिवस मनाया जाता है क्योंकि उन्हें वैश्विक बौद्ध संस्कृति की वर्तमान डोर माना जाता है। दलाई लामा शब्द सुनकर आपके जेहन में पहली चीज क्या आती है ? आज उनके जन्मदिवस पर ये बात पूछी जाय तो उत्तर यही मिलेगा कि वो करुणा और त्याग की प्रतिमूर्ति हैं , वो बौद्ध धर्म की अस्मिता को साम्यवादी चंगुल से निकालने के लिए जद्दोजहद करने वाले आध्यात्मिक योद्धा हैं । या ये भी कह सकते हैं कि चीनी साम्यवादी बंधनों के बादल में फंसी मुक्ति की नीर हैं , जो तिब्बत की धरा पर आजादी की मूसलाधार बारिश करना चाहती है। चूंकि हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में उनकी निर्वासित सरकार कार्य करती है और दलाई लामा ने भारत की प्रादेशिक अखंडता और संप्रभुता, लद्दाख को भारत का अभिन्न हिस्सा कहकर चीन का प्रतिरोध भी किया , इसलिए केन्द्र सरकार से तिब्बती आध्यात्मिक नेता दलाई लामा को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न’ प्रदान करने की मांग भी हाल के वर्षों में भारत में की गई है।

भारतीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने आज यानी 6 जुलाई को फोन पर दलाई लामा को उनके 87वें जन्मदिन पर शुभकामनाएं दी हैं। उन्होंने दलाई लामा की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य के लिए भी प्रार्थना की।प्रधानमंत्री ने एक ट्वीट में कहा कि ; “धर्मगुरु दलाई लामा को आज फोन पर 87वें जन्मदिन की बधाई दी। हम उनके लंबे जीवन और अच्छे स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना करते हैं।”

गौरतलब है कि कोविड महामारी के पहले 2019 में  6 जुलाई को तिब्बती धर्म गुरु दलाई लामा यानि ग्यालवा तेनजीन ग्यात्सो ने अरुणाचल के तवांग घाटी के उगयेनलिंग गोंपा में अपना 84वां जन्मदिन मनाया था , यही स्थान छठवें दलाई लामा का जन्म स्थान भी है । 14वें और वर्तमान दलाई लामा का जन्म 6 जुलाई 1935 को उत्तरपूर्वी तिब्बत में हुआ था। वह नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित हैं और उन्हें करुणामय बोधिसत्व , अवलोकितेश्वर अथवा चेनरेजिग का स्वरूप माना जाता है ।

चीन ने तिब्बत से सद्गुणों के पलायन की पटकथा लिखी और भारत ने इन सद्गुणों को अंगीकार कर लिया । इसलिए तिब्बत और तिब्बती आध्यात्मिक धर्म गुरु दलाई लामा का मुद्दा भारत और चीन के बीच समय समय पर उभरता भी रहा है । 86 वर्षीय दलाई लामा के स्वास्थ्य के लिए भारत सहित दुनिया के तमाम बौद्ध धर्म प्रिय देश संवेदनशील रहे हैं । वहीं चीन हाल के वर्षों में उनके उत्तराधिकारी के चयन के मुद्दे को भी विवाद का विषय बनाने से बाज नहीं आया।  चीन खुले तौर पर कहता रहा है कि तिब्बती धर्मगुरू दलाई लामा का उत्तराधिकारी चीन से ही चुना जाएगा । 


 
हाल के समय में चीन भारत को चेतावनी देता रहा है कि दलाई लामा को अरुणाचल प्रदेश के तवांग क्षेत्र में जाने की अनुमति ना दे , वरना इसका दोनों देशों के संबंधों पर नकारात्मक असर पड़ेगा , और ऐसी चेतावनी कई बार दी गई है । भारत ने इसे अरुणाचल प्रदेश के संदर्भ में अपनी प्रादेशिक अखंडता और संप्रभुता में हस्तक्षेप माना है और दलाई लामा को कहीं भी आवाजाही की खुली आजादी देने की बात कही । 

 वर्ष 2019 में लद्दाख में दलाई लामा के जन्म दिवस  कार्यक्रमाें में तिब्बती झंडा लहराए जाने के दाैरान 6 जुलाई काे कुछ चीनी सैनिक वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पार कर भारतीय क्षेत्र में घुस आए। सुरक्षा अधिकारियाें द्वारा स्पष्ट किया गया कि  डेमचाेक सेक्टर में काेयुल गांव में एसयूवी से कुछ चीनी सैनिक घुसे और  तिब्बती झंडा लहराने पर विरोध जाहिर किया। चीनी सैनिक  करीब 1.5 किमी तक भारत के भूक्षेत्र के भीतर आ गए  थे। चीन खुले आम अरुणाचल प्रदेश को तिब्बत का एक हिस्सा और इसका सांस्कृतिक विस्तार होने का दावा करता रहा है। यह अरुणाचल प्रदेश के हिस्सों को कब्जे में करने की चीन की  चाल है।  दलाई लामा के जन्मदिन पर जहां लद्दाख में चीन की तरफ से बैनर दिखाए गए, वहीं नेपाल में भी दलाई लामा का जन्मदिन सेलिब्रेट करने की इजाजत नहीं मिली। चूंकि अरुणाचल प्रदेश के तवांग जिले में 17वीं सदी में छठवें दलाई लामा का जन्म हुआ था इसी आधार पर  चीन अरुणाचल  प्रदेश पर अपना दावा करता है और इसे दक्षिणी तिब्बत कहता है  जबकि इसी तर्क के सहारे चीन मंगोलिया के भूभागों  पर भी दावा कर सकता है कि उसके चौथे दलाई लामा वर्ष 1589 में वहां पैदा हुए थे। वास्तव में तिब्बत और मंगोलिया के बीच परम्परागत तौर पर धार्मिक संबंध, अरुणाचल और तिब्बत के संबंधों से अधिक प्रगाढ़ रहे हैं। 

1 अक्टूबर , 1949 को चीन के साम्यवादी नेता माओत्से तुंग ने पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना यानि पीआरसी के गठन की घोषणा की थी और पीआरसी का संस्थापक पिता और अध्यक्ष बना । तिब्बत में प्रचलित बौद्ध धर्म और उसकी धार्मिक स्वतंत्रता धर्म को अफीम कहने वाले मार्क्स के शिष्य माओ को रास नहीं आई , तिब्बत की अपनी स्वायत्तता बनाए रखने की मंशा ने माओ को 1950 में  तिब्बत पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित किया । चीन ने तिब्बत को अपना अभिन्न अंग माना और उससे 17 सूत्रीय समझौता करते हुए उसे अर्ध स्वायत्तता प्रदान किया । लेकिन तिब्बत अपनी धार्मिक आजादी के लिए कृत संकल्प था । तिब्बत में चीनी सेना के प्रति विद्रोह का भाव था । चीन ने तिब्बत के सांस्कृतिक अधिकारों के आंदोलनों को सैन्य कार्रवाई के जरिए कुचलने की कोई कोर कसर नहीं छोड़ी । ऐसे में बौद्ध तिब्बतियों और चीनी सैनिकों के बीच कई झड़पें होने लगीं । अंततः चीन ने माओ के निर्देश पर 1958 में तिब्बत पर पुनः सैन्य कार्रवाई को अंजाम दिया । ऐसे में 21 वर्षीय डरे सहमे 14वें दलाई लामा को तिब्बत छोड़ने की सलाह उनके शुभचिंतकों द्वारा दी गई ।  

30 मार्च , 1959 को दलाई लामा अपने डेढ़ लाख अनुयायियों के साथ भारत पहुंचे और भारत ने उन्हें राजनीतिक शरण दिया और उनकी निर्वासित सरकार को मान्यता दी । पंडित नेहरू ने दलाई लामा को सुरक्षा का पूर्ण आश्वासन दिया और उसके बाद हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में दलाई लामा ने अपना मुख्य केंद्र बनाया । दलाई लामा ने मानवता के हित में काम किए और 1989 में उन्हें शांति के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।  उन्होनें तिब्बत की आजादी के लिए अहिंसक लड़ाई चीन के खिलाफ जारी रखी । जबकि चीन तिब्बत पर पूर्ण नियंत्रण चाहता है । गौरतलब है कि भारत और चीन तभी पड़ोसी बने जब चीन ने तिब्बत पर अधिग्रहण किया । आज तिब्बत चीन और भारत दोनों के लिए सामरिक महत्व का हो गया है । तिब्बत से ब्रह्मपुत्र नदी का उद्गम है , चीन इसके जल पर अपने अधिकार का दावा करता है ।

भारत ने 29 अप्रैल , 1954 को चीन तिब्बत विवाद के समाधान के लिए पंचशील के सिद्धांत का प्रतिपादन किया था । भारत आज भी चीन से ये अपेक्षा करता है कि पंचशील के पांच बिंदुओं का वह अपने अंतर्राष्ट्रीय आचरण के दौरान पालन करे तो तिब्बत , डोकलाम, तवांग , नाथूला , कैलाश मानसरोवर , लेह लद्दाख के संदर्भ में विवादों का समाधान किया जा सकेगा । वास्तव में पंचशील एक रामबाण अस्त्र है । पंचशील कहता है कि एक दूसरे की प्रादेशिक अखंडता और पारस्परिक संप्रभुता का सम्मान , एक दूसरे पर आक्रमण ना करना , एक दूसरे के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप ना करना , समानता और पारस्परिक लाभ की मानसिकता रखना और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व पर बल देना जरूरी है । चीन ने अगर इसका पालन सही मायनों में कर दिया तो डोकलाम, मोतियों की लड़ी की उसकी नीति , ओबोर , मैरिटाइम सिल्क रूट , तिब्बत पर कब्जे की उसकी मानसिकता पर लगाम लग जायेगा । लेकिन चीन खुले तौर पर पंचशील सिद्धांत की धज्जियां उड़ाते नजर आता है । ऐसे में पंचशील की प्रासंगिकता खो नहीं जाती क्यूंकि भारत आज भी तिब्बत हो , भूटान हो या नेपाल सभी के मामलों में पंचशील के पांचों बिंदुओं को अपनाकर अपनी राजनयिक सज्जनता का परिचय देता रहता है ।  

2003 में वाजपेई सरकार ने तिब्बत को चीन का अंग मान लिया था उसके बाद से लगातार अरुणाचल प्रदेश के हिस्सों पर चीन अपना दावा करने लगा । तिब्बत को लेकर भारत में अलग अलग देशकाल में राजनेताओं के अलग अलग विचार रहे हैं । डॉ भीमराव अम्बेडकर ने तिब्बत के लिए कहा था यदि भारत ने तिब्बत को मान्यता दी होती , जैसी 1949 में चीन को दी गई थी तो आज भारत -चीन सीमा विवाद न होकर तिब्बत -चीन सीमा विवाद होता । डॉ राजेन्द्र प्रसाद ने कहा था -चीनियों ने तिब्बत को लूटा है । तिब्बत को चीन के लोह शिंकचे से आजाद कर उसे तिब्बतियों को सौपंना होगा। सबसे तल्ख टिप्पणी लोहिया जी ने की थी – कौन कौम अपने बडे देवी -देवताओं को परदेस में बसाती है , वह भी शिव और पार्वती को । मैकमोहन रेखा हिन्दुस्तान और चीन की रेखा तो है नहीं , हो रही तो कैलाश मानसरोवर उसकी रखवाली में रहेंगे । तिब्बत हमारा भाई है। इस प्रकार आज भी भारत सरकार का यही मत है कि तिब्बत में शांतिपूर्ण माहौल बनने चाहिए । दलाई लामा और बौद्धों के सांस्कृतिक अधिकार सुरक्षित होने चाहिए ।

(लेखक अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार हैं)

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