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स्लिम और फिट रहने के लिए खाएं ऐसा खाना

जरूरी नहीं है स्लिम और फिट रहने के लिए आपको हर दिन जीतोड़ मेहनत कर पसीना बहाना पड़े। आप अगर चाहें तो अपनी ‘थाली’ में कार्ब्स का संतुलन बनाकर भी खुद को फिट रख सकते हैं। इसके लिए बस आपको यह जान लेने की जरूरत है कि आपकी इस फैट बर्निंग थाली में कैसी डायट शामिल होनी चाहिए…

कैसे काम करता है लो कार्ब्स फूड?
-लो कार्ब्स फूड से मतलब ऐसे भोजन से है, जिसमें कार्बोहाइड्रेट की मात्रा बहुत कम हो। क्योंकि कार्बोहाइड्रेट का अधिक सेवन हमारे ब्लड में इंसुलिन की मात्रा बढ़ाने का काम करता है। इंसुलिन एक ऐसा हॉर्मोन होता है, जो कार्बोहाइड्रेट से ग्लूकोज निकालकर शरीर की कोशिकाओं में लाने का काम करता है।
-जबकि लो कार्ब्स फूड ब्लड में इंसुलिन की मात्रा कम कर ग्लूकोज के स्तर को नियंत्रित रखने में मदद करता है। ग्लूकोज के चलते शरीर में शुगर की मात्रा अधिक बढ़ सकती है। साथ ही इंसुलिन बॉडी में फैट स्टोर करने का काम भी करता है।
-यानी शुगर की मात्रा सीमित रखने और फैट को शरीर में जमा ना होने देने के लिए जरूरी है कि हम कार्बोहाइड्रेट का सेवन कम से कम करें। इसलिए हमें लो कार्ब्स डायट की तरफ अपना ध्यान रखना चाहिए।

किडनी पर असर डालती है हाई कार्ब्स डायट
-जो डायट कार्बोहाइड्रेट से भरपूर होती है, वह हमारे शरीर में किडनी को सोडियम बनाए रखने लिए बाध्य करती है। यही वजह है कि हाई कार्ब्स डायट लेने से किडनी में पानी की अधिकता हो जाती है और इससे किडनी की सेहत को नुकसान होता है। कई बार किडनी फेल होने का खतरा भी रहता है।
-आम बोलचाल की भाषा में इस बीमारी को पेट में पानी भर जाना कहते हैं। जबकि मेडिकल की भाषा में इस समस्या को नेफ्राजेनिक असाइटीस कहते हैं। असाइटीज पेट में पानी भर जाने की बीमारी है। लेकिन इसके कई प्रकार होते हैं। इनमें से नेफ्राजेनिक असाइटीस वह समस्या है, जिसमें किडनी के कारण पेट में पानी यानी फ्लूइड भरने की दिक्कत हो जाती है।

कमर का साइज कम करती है
-कई अलग-अलग स्टडीज में यह बात साबित हो चुकी है कि लो कार्ब्स डायट हमारी कमर के आस-पास जमा फैट को हटाकर हमें स्लिम रखने में मदद करती है।

  • पेट और कमर के निचले हिस्से के चारों तरफ से फैट जमा होता है, उसे मेडिकल की भाषा में आंत की चर्बी (Visceral Fat) और पेट की चर्बी (Belly Fat) भी कहा जाता है।

शुरुआत में आ सकती है दिक्कत
-जब हम हाई कार्बोहाइड्रेट युक्त आहार को छोड़कर लो कार्ब्स डायट की तरफ जाते हैं तो शुरुआत में हमारे शरीर को कुछ दिक्कत होती है। इससे आप असहजता और क्रेविंग अनुभव कर सकते हैं।

  • लेकिन जब शरीर को ऊर्जा बनाने के लिए कार्बोहाइड्रेट्स की जगह पहले से जमा वसा ( फैट) को उपयोग में लाने की आदत हो जाएगी तो आपकी परेशानी भी दूर हो जाएगी। शुरुआती स्तर पर होनेवाली इस समस्या को ‘लो कार्ब्स फ्लू’ (Low Carbs Flu) कहते हैं।
    -यह ‘लो कार्ब्स फ्लू’ बस शुरुआत के कुछ दिन रहता है और बाद में सब ठीक हो जाता है। इस दौरान आपको ऊर्जा की कमी और हर समय थकान महसूस हो सकती है। लेकिन कुछ ही दिन बाद आप खुद को लाइट और एनर्जेटिक महसूस करने लगते हैं।

सिर्फ कार्बोहाइड्रेट को दोष ना दें
-अगर आपको यह स्टोरी पढ़ते समय लग रहा है कि आपकी मोटापे की परेशानी का कारण सिर्फ कार्बोहाइड्रेट है तो आप सही नहीं सोच रहे हैं। क्योंकि कार्बोहाइड्रेट शरीर के लिए बहुत जरूरी होता है। हमें चलने से लेकर सांस लेने तक हर काम के लिए ऊर्जा इसी के कारण मिलती है।
-लेकिन अगर कार्बोहाइड्रेट का सेवन संतुलित मात्रा में ना किया जाए तो यह हमारे शरीर में फैट बढ़ने का काम करने लगता है। एक सामान्य व्यक्ति को हर दिन अपनी बैलंस डायट में 45 से 65 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट लेना चाहिए।

  • जो लोग शारीरिक श्रम अधिक करते हैं, जैसे किसान, मजदूर, खिलाड़ी आदि तो उन्हें अपनी डायट में इसकी मात्रा अधिक लेनी चाहिए। क्योंकि वे हर दिन बड़ी मात्रा में कैलरी बर्न करते हैं। जबकि सिटिंग जॉब करनेवाले लोगों के साथ ऐसा नहीं हो पाता है।

इन खाद्य पदार्थों से मिलता है कार्बोहाइड्रेट

  • कार्बोहाइड्रेट हमें साबुत अनाज, सोया बीन्स, चोकर युक्त आटा, डेयरी प्रॉडक्ट्स, मीठे फ्रूट्स आदि से मिलता है। ऐसे में आपको हर चीज खानी चाहिए लेकिन संतुलित मात्रा में और अपनी दिनचर्या को ध्यान में रखते हुए।
  • ध्यान रखें कि बाजार में मिलनेवाले प्रॉसेस्ड साबुत अनाज, जो पैकेड्स और डिब्बाबंद होता है। उसमें मंडी में मिलनेवाली खुले अनाज की तुलना में गुण काफी कम हो जाते हैं।
    -क्योंकि प्रॉसेसिंग के दौरान फाइबर, पोटैशियम, मैग्नीशियम, प्रोटीन जैसे गुणों में कमी आ जाती है। उदाहरण के लिए बाजार में मिलनेवाली ब्रेड की तुलना में घर में बनी आटा रोटी अधिक फायदेमंद होती है।

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