शहीद बेटे के अंतिम दर्शन के लिए बुजुर्ग माता-पिता को चलना पड़ा 4 किमी पैदल

बागेश्वर : किश्तवाड़ में आतंकियों से मुठभेड़ में शहीद हवलदार गजेंद्र सिंह गड़िया के अंतिम दर्शन के लिए बुजुर्ग माता-पिता को चार किमी पैदल चलना पड़ा। बागेश्वर जिले में शहीद के गांव तक सड़क न होने से पार्थिव शरीर वहां नहीं पहुंचाया जा सका। बुजुर्ग माता-पिता पहले चार किलोमीटर पैदल औऱ फिर 13 किलोमीटर गाड़ी से चलकर पहुंचे, तब बेटे के अंतिम दर्शन कर पाए।
रविवार को उत्तराखंड के बागेश्वर जिले के बीथी पन्याती गांव के हवलदार गजेंद्र सिंह गड़िया जम्मू-कश्मीर में आतंकी हमले में शहीद हो गए थे। मंगलवार को उनके पार्थिव शरीर को गांव लाया जाना था, लेकिन गांव तक सड़क नहीं होने से यह संभव नहीं हो पाया। ऐसे में पार्थिव शरीर को कपकोट डिग्री कॉलेज के मैदान में लाया गया। गांव से उनकी माता चंद्रावती देवी और पिता धन सिंह करीब चार किली पैदल चलकर सड़क तक पहुंचे। इसके बाद 13 किलोमीटर वाहन से कपकोट पहुंचे। यहां उन्होंने बेटे के अंतिम दर्शन किए।
गांव से कई अन्य लोग भी कपकोट पहुंचे, लेकिन बुजुर्गों-महिलाओं समेत कई लोग यहां नहीं पहुंच पाए। उधर, एसडीएम अनिल चन्याल ने बताया कि सेना के अधिकारियों और शहीद के पिता के बीच फोन पर हुई बातचीत के बाद डिग्री कॉलेज कपकोट का कार्यक्रम तय हुआ था। इसमें प्रशासन का कोई हस्तक्षेप नहीं है।
लोगों के अनुसार मरीजों, गर्भवती महिलाओं को डोली से सड़क तक ले जाना पड़ता है। पूर्व प्रधान सेवानिवृत्त कैप्टन भूपाल सिंह ने बताया कि तमाम प्रयासों के बाद भी सड़क नहीं बन पाई। पोथिंग के बलिया पालत तक सड़क है। वहां से एक किमी ढलान और तीन किमी की चढ़ाई तय करके बीथी पन्याती पहुंचना पड़ता है। कपकोट के पूर्व विधायक शेर सिंह गड़िया भी इसी गांव के मूल निवासी हैं।
शहीद गजेंद्र सिंह गड़िया का पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपटकर हेलीकॉप्टर से डिग्री कॉलेज मैदान में लाया गया। परिजनों की अश्रुपूरित विदाई के बाद शहीद की अंतिम यात्रा शुरू हुई। इसमें सैकड़ों की संख्या में लोग मौजूद रहे। भारत माता की जय के उद्घोष से कपकोट घाटी गूंज उठी। सरयू और खीरगंगा के संगम पर सैन्य सम्मान के साथ शहीद की अंत्येष्टि की गई।



