संपादकीय : दिसम्बर 2025

जितने सम्मानजनक तरीके से बिहार ने एनडीए को जनादेश दिया, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उतने ही सम्मानजनक ढंग से बिहार की सत्ता एक बार फिर संभाल ली। बिहार ने एक मुख्यमंत्री को इतने लंबे तक राज करने का जनादेश अब से पहले कभी नहीं दिया। बीजेपी ने भी उसी अंदाज में नीतीश कुमार की ताजपोशी की। बीजेपी बिहार में पहली बार सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी है। अब वह ये हैसियत बनाए रखना चाहेगी। बीजेपी की पूरी कोशिश होगी कि बिहार में अगला मुख्यमंत्री उन्हीं की पार्टी का हो। इसके लिए जरूरी है कि चुनाव में जो वायदे एनडीए ने जनता से किए हैं उन्हें वह पांच साल में पूरे करे। बिहार में बेरोजगारी, पलायन और गरीबी देश के किसी भी अन्य राज्य से ज्यादा है। उद्योग धंधे न के बराबर हैं। सारे प्राकृतिक संसाधन झारखंड ले गया। सिर्फ मुफ़्त अनाज, सस्ती बिजली और दिलकश योजनाओं की रेवड़ी बांट कर बहुत दिन तक राज नहीं किया जा सकता। बिहार को आत्मनिर्भर बनना होगा। इसके लिए बिहार में औद्योगीकरण का आंदोलन चलाना होगा ताकि रोजगार के नए मौके पैदा हों। पलायन रुके जो बिहार की एक बड़ी समस्या है। लेकिन इन सब के लिए बहुत अधिक धन की ज़रूरत है। शराबबंदी करके नीतीश सरकार ने अपने राजस्व के रास्ते रोक दिए हैं। सरकार को राजस्व बढ़ाने के अन्य ठोस उपाय करने होंगे।
बिहार चुनाव में शिकस्त खाए तेजस्वी, और प्रशांत किशोर जैसे राजनेता मजबूत विपक्ष के रूप में नीतीश सरकार को चुनौती दे सकते हैं। हालांकि आरजेडी के लिए ये कठिन और आत्मचिंतन का वक़्त है। बिहार में वापसी के लिए तेजस्वी को अपनी छवि पर ध्यान देना होगा और प्रशांत किशोर को अपने संगठन पर। इस चुनाव ने साफ कर दिया है कि अकेले सोशल मीडिया के दम पर भारत जैसे लोकतंत्र में चुनाव नहीं जीते जा सकते। इसके लिए ज़मीन पर कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। जैसी मेहनत उत्तराखंड में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी कर रहे हैं। राज्य में राजस्व बढ़ाने के लिए मुख्यमंत्री धामी ने उन सभी सेक्टरों में सुधार किए जहां से राजस्व आता है। वह चाहे खनन का क्षेत्र हो, परिवहन हो, पर्यटन हो या आबकारी विभाग। धामी सरकार ने युवाओं को रोजगार देने के सभी दरवाजे खोल दिए हैं। युद्ध स्तर पर खाली पड़े सरकारी पद भरे जा रहे हैं। धामी ने नए साल में 12 हजार सरकारी नौकरी देने का प्लान तैयार किया है। पलायन रोकने के लिए योग्य युवाओं को गांव-कस्बों के स्कूलों में शिक्षक बनाया जा रहा है।
बिहार चुनाव नतीजों का उत्तर प्रदेश में भी व्यापक प्रभाव पड़ा है। यूपी में समाजवादी पार्टी की हालत आरजेडी जैसी है। अखिलेश और तेजस्वी दोनों एक राह के मुसाफिर हैं। दोनों को राजनीतिक विरासत उनके दिग्गज पिता से मिली है। पिता के साए से बाहर निकल कर दोनों को अब अपनी अलग पहचान बनानी होगी। केंद्र सरकार की योजनाओं ने वोटरों का मिज़ाज बदल दिया है। समुदाय और जाति पर आधारित सारे राजनीतिक समीकरण पुराने और अप्रासंगिक होते जा रहे हैं। तमाम संकीर्णताओं को छोड़ नया भारत अब आगे बढ़ना चाहता है। बीते महीने सदाबहार और हरदिल अज़ीज़ अभिनेता धर्मेंद्र का निधन हो गया। इस अंक में श्रद्धांजलि स्वरूप उन पर विशेष सामग्री दी जा रही है। तस्वीरों के साथ वियतनाम का जीवंत यात्रा वृतांत इस अंक का एक और आकर्षण है। नया साल दरवाजे पर खड़ा है। पाठकों को नए साल की अग्रिम शुभकामनाएं।


