उत्तराखंडदस्तक-विशेषराज्य

पर्वतीय विकास और चारधाम कनेक्टिविटी का नया अध्याय

उत्तराखंड में बुनियादी ढांचा और सड़क परियोजनाएं

दस्तक टाइम्स ब्यूरो, देहरादून

उत्तराखंड, जिसे देवभूमि के नाम से जाना जाता है, अपनी आध्यात्मिक पहचान, प्राकृतिक सौंदर्य और सामरिक महत्व के लिए देश-दुनिया में जाना जाता है। लेकिन इस पहचान के साथ एक सच्चाई यह भी है कि राज्य का भौगोलिक स्वरूप अत्यंत चुनौतीपूर्ण है। ऊंचे-नीचे पर्वत, गहरी घाटियां, नदियां, भूस्खलन संभावित क्षेत्र और सीमित समतल भूमि, ये सभी कारक यहां बुनियादी ढांचे के विकास को जटिल बनाते हैं। राज्य गठन के बाद से ही उत्तराखंड के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही रही है कि दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों को कैसे मुख्यधारा के विकास से जोड़ा जाए। सड़कें केवल आवागमन का साधन नहीं होतीं, बल्कि वे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, पर्यटन, व्यापार, आपदा प्रबंधन और राष्ट्रीय सुरक्षा की जीवनरेखा होती हैं। उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्य में तो सड़कें सीधे तौर पर जीवन और विकास से जुड़ी हुई हैं। एक सड़क जहां किसी गांव को बाजार से जोड़ती है, वहीं दूसरी ओर वही सड़क आपात स्थिति में एंबुलेंस, राहत सामग्री और सेना की त्वरित पहुंच का माध्यम बनती है। पिछले कुछ वर्षों में केंद्र और राज्य सरकारों ने मिलकर उत्तराखंड में सड़क और बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में बड़े और दूरगामी फैसले लिए हैं। राष्ट्रीय राजमार्गों का विस्तार, नए बाइपास, वैकल्पिक मार्ग, सुरंगें और ऑल वेदर रोड जैसी परियोजनाएं इस बात का संकेत हैं कि अब विकास की दिशा केवल मैदानी क्षेत्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि पहाड़ों को भी समान प्राथमिकता दी जा रही है। इसी संदर्भ में ऋषिकेश बाईपास, अल्मोड़ा-दन्या-पनार घाट और जौलिकोट-खैरना-गैरसैंण-कर्णप्रयाग जैसी सड़क परियोजनाएं विशेष महत्व रखती हैं। ये परियोजनाएं न केवल पर्वतीय कनेक्टिविटी को बेहतर बनाएंगी, बल्कि चारधाम यात्रा, प्रशासनिक पहुंच, आर्थिक गतिविधियों और सामरिक सुरक्षा को भी नई मज़बूती देंगी।

उत्तराखंड क्षेत्र में सड़कों का इतिहास अपेक्षाकृत नया है। आजादी से पहले यहां सड़कें मुख्य रूप से सैन्य ज़रूरतों और सीमित प्रशासनिक उद्देश्यों के लिए बनाई गई थीं। आम नागरिकों, विशेषकर दूरस्थ गांवों तक सड़क पहुंचना एक दुर्लभ सुविधा थी। कई गांव दशकों तक पैदल मार्गों पर निर्भर रहे, जहां राशन, दवाइयां और अन्य जरूरी सामान खच्चरों या मानव श्रम से पहुंचाया जाता था। वर्ष 2000 में राज्य गठन के बाद उम्मीद जगी कि अब पहाड़ी क्षेत्रों की समस्याओं को प्राथमिकता मिलेगी। शुरुआती वर्षों में कई सड़क परियोजनाएं शुरू तो हुईं, लेकिन धन की कमी, तकनीकी चुनौतियां, पर्यावरणीय आपत्तियों और प्रशासनिक जटिलताओं के कारण अनेक योजनाएं धीमी रफ्तार से आगे बढ़ीं। हालांकि बीते एक दशक में परिदृश्य में बदलाव देखने को मिला। केंद्र सरकार की ओर से सीमावर्ती राज्यों पर विशेष ध्यान, चारधाम यात्रा का बढ़ता दबाव, आपदाओं से मिली सीख और सामरिक आवश्यकताओं ने उत्तराखंड के सड़क नेटवर्क को राष्ट्रीय प्राथमिकता की सूची में ला खड़ा किया।

ऋषिकेश उत्तराखंड का वह प्रवेश द्वार है, जहां से हर साल लाखों श्रद्धालु और पर्यटक चारधाम यात्रा पर निकलते हैं। बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री जाने वाला अधिकांश यातायात ऋषिकेश से होकर गुजरता है। इसके अलावा यह शहर योग, आध्यात्म और पर्यटन का भी बड़ा केंद्र है। बीते वर्षों में ऋषिकेश शहर पर यातायात का दबाव लगातार बढ़ा है। चारधाम यात्रा के दौरान भारी वाहनों, बसों और निजी गाड़ियों के कारण शहर में लंबे जाम लगना आम बात हो गई है। इससे न केवल यात्रियों को परेशानी होती है, बल्कि स्थानीय नागरिकों का दैनिक जीवन भी प्रभावित होता है। इन्हीं समस्याओं के समाधान के लिए ऋषिकेश बाइपास परियोजना का प्रस्ताव तैयार किया गया है। इस बाइपास का उद्देश्य चारधाम की ओर जाने वाले भारी और बाहरी यातायात को शहर के बाहर से निकालना है, ताकि ऋषिकेश के भीतर यातायात सुचारु रह सके। ऋषिकेश बाइपास के बन जाने से चारधाम यात्रा का समय घटेगा, दुर्घटनाओं की आशंका कम होगी और आपातकालीन सेवाओं की गति तेज होगी। इसके साथ ही शहरी प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण और ट्रैफिक तनाव में भी उल्लेखनीय कमी आने की उम्मीद है।

कुमाऊं मंडल का पर्वतीय भूभाग प्राकृतिक रूप से जितना सुंदर है, उतना ही चुनौतीपूर्ण भी है। अल्मोड़ा, दन्या और पनारघाट जैसे क्षेत्र आज भी सीमित सड़क विकल्पों के कारण विकास की दौड़ में पीछे रह जाते हैं। अल्मोड़ा-दन्या-पनारघाट सड़क परियोजना का उद्देश्य इन आंतरिक पर्वतीय क्षेत्रों को बेहतर और सुरक्षित मार्ग से जोड़ना है। वर्तमान में इन क्षेत्रों से जिला मुख्यालय या बड़े बाजारों तक पहुंचने में लंबा समय लगता है। बरसात और सर्दियों के मौसम में कई बार रास्ते अवरुद्ध हो जाते हैं, जिससे लोगों को भारी परेशानी उठानी पड़ती है। इस सड़क के विकसित होने से कृषि और बागवानी उत्पादों की ढुलाई आसान होगी। सेब, नाशपाती, मंडुवा, झंगोरा जैसे स्थानीय उत्पाद समय पर बाजार तक पहुंच सकेंगे, जिससे किसानों की आय बढ़ेगी। इसके अलावा शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बेहतर होगी, जो लंबे समय से पर्वतीय क्षेत्रों की सबसे बड़ी जरूरत रही है। गैरसैंण को उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किए जाने के बाद इसकी कनेक्टिविटी का मुद्दा और भी महत्वपूर्ण हो गया है। जौलिकोट, खैरना, गैरसैंण, कर्णप्रयाग सड़क परियोजना को इसी दृष्टि से देखा जा रहा है। यह मार्ग कुमाऊं और गढ़वाल मंडलों को जोड़ने वाला एक वैकल्पिक और रणनीतिक कॉरिडोर बनेगा। वर्तमान में इन दोनों क्षेत्रों के बीच यात्रा के लिए सीमित मार्ग उपलब्ध हैं, जिन पर मौसम और आपदा का सीधा असर पड़ता है। इस सड़क के बनने से गैरसैंण तक वर्षभर पहुंच सुनिश्चित होगी। प्रशासनिक कामकाज, विधानसभा सत्र, सरकारी बैठकों और विकास कार्यों में सुगमता आएगी। साथ ही यह मार्ग चारधाम यात्रा के लिए भी एक वैकल्पिक और सुरक्षित रास्ता प्रदान करेगा।

चारधाम ऑल वेदर रोड परियोजना उत्तराखंड के इतिहास की सबसे महत्वाकांक्षी सड़क परियोजनाओं में से एक है। इसका उद्देश्य चारों धामों तक चौड़ी, मजबूत और हर मौसम में चलने योग्य सड़कें तैयार करना है। इस परियोजना के तहत कई स्थानों पर सुरंगें, पुल, बाइपास और पहाड़ कटान के आधुनिक उपाय अपनाए जा रहे हैं। इससे भूस्खलन संभावित क्षेत्रों में जोखिम कम होगा और यात्रा अधिक सुरक्षित बनेगी। चारधाम ऑल वेदर रोड केवल तीर्थयात्रियों के लिए ही नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों के लिए भी जीवन रेखा साबित होगी। आपदा के समय राहत और बचाव कार्यों में यह सड़कें अहम भूमिका निभाएंगी। उत्तराखंड में सड़क निर्माण का सवाल हमेशा पर्यावरणीय चिंताओं से जुड़ा रहा है। हिमालयी क्षेत्र भूकंपीय दृष्टि से संवेदनशील है और यहां का पारिस्थितिक संतुलन बेहद नाजुक है। इसी कारण नई सड़क परियोजनाओं में पर्यावरणीय प्रभाव आकलन, आधुनिक ड्रेनेज सिस्टम, रिटेनिंग वॉल, स्लोप स्टेबिलाइजेशन और वनीकरण पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। सरकार का प्रयास है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाया जाए। उत्तराखंड की एक लंबी सीमा चीन से लगती है। सीमावर्ती क्षेत्रों तक सड़क पहुंच राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से अत्यंत आवश्यक है। नई सड़क परियोजनाएं सेना, आईटीबीपी और अन्य सुरक्षा बलों की त्वरित आवाजाही को सुनिश्चित करेंगी।

आपदा प्रबंधन की दृष्टि से भी मजबूत सड़क नेटवर्क अनिवार्य है। बाढ़, भूस्खलन या हिमस्खलन जैसी आपदाओं के समय सड़कें ही राहत पहुंचाने का एकमात्र साधन बनती हैं। ऋषिकेश बाइपास, अल्मोड़ा-दन्या-पनारघाट और जौलिकोट-खैरना-गैरसैंण-कर्णप्रयाग जैसी सड़क परियोजनाएं उत्तराखंड के समग्र विकास की आधारशिला हैं। ये परियोजनाएं केवल आवागमन को आसान बनाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि आर्थिक, सामाजिक, प्रशासनिक और सामरिक मजबूती का मार्ग प्रशस्त करती हैं। यदि इन योजनाओं को समयबद्ध, पारदर्शी और पर्यावरण संवेदनशील तरीके से पूरा किया जाता है, तो उत्तराखंड न केवल तीर्थ और पर्यटन का केंद्र बनेगा, बल्कि एक संतुलित और टिकाऊ विकास मॉडल के रूप में देश के सामने उभरेगा। मजबूत बुनियादी ढांचा ही उत्तराखंड के उज्ज्वल भविष्य की सबसे ठोस नींव है। उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों की सबसे बड़ी सामाजिक-आर्थिक चुनौती पलायन रही है। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और बाजार तक पहुंच के अभाव में लाखों लोग पहाड़ों से मैदानी क्षेत्रों की ओर पलायन कर चुके हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि समय रहते सड़क और बुनियादी ढांचे का मज़बूत जाल बिछाया गया होता, तो पलायन की यह त्रासदी इतनी गहरी न होती। सड़कें गांवों को केवल शहरों से नहीं जोड़तीं, बल्कि अवसरों से जोड़ती हैं। बेहतर सड़क कनेक्टिविटी होने पर स्थानीय स्तर पर स्वरोजगार, पर्यटन, कृषि आधारित उद्योग और लघु व्यापार विकसित हो सकते हैं। अल्मोड़ा-दन्या-पनारघाट और जौलिकोट-खैरना-गैरसैंण-कर्णप्रयाग जैसे मार्ग पहाड़ी अर्थव्यवस्था को नई गति देने की क्षमता रखते हैं।

इन मार्गों के विकसित होने से दुग्ध उत्पादन, बागवानी, औषधीय पौधों और पारंपरिक उत्पादों को बाजार से जोड़ने में आसानी होगी। इससे न केवल किसानों की आय बढ़ेगी, बल्कि युवाओं के लिए स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी सृजित होंगे। आपदा प्रबंधन की सीख और सड़क परियोजनाओं की भूमिका वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा ने उत्तराखंड के सामने सड़क और बुनियादी ढांचे की कमज़ोरियों को उजागर कर दिया था। राहत और बचाव कार्यों में देरी का एक बड़ा कारण दुर्गम क्षेत्रों तक पहुंच का अभाव था। इसके बाद आई आपदाओं-चमोली हिमस्खलन, जोशीमठ भूधंसाव और मानसूनी भूस्खलनोंने यह स्पष्ट कर दिया कि आपदा प्रबंधन के लिए मज़बूत सड़क नेटवर्क अनिवार्य है। नई सड़क परियोजनाओं को अब केवल यातायात सुविधा के रूप में नहीं, बल्कि आपदा प्रबंधन की रीढ़ के रूप में देखा जा रहा है। वैकल्पिक मार्ग, बाइपास और सुरंगें आपदा के समय जीवन रक्षक साबित हो सकती हैं। ऋषिकेश बाइपास और चारधाम ऑल वेदर रोड जैसी परियोजनाएं इसी सोच का परिणाम हैं। किसी सड़क को राष्ट्रीय राजमार्ग का दर्जा मिलने के बाद उसके विकास की गति और गुणवत्ता दोनों में बड़ा अंतर आता है। केंद्र सरकार से मिलने वाला वित्तीय सहयोग, आधुनिक तकनीक और उच्च मानकों का पालन इन परियोजनाओं को दीर्घकालिक बनाता है। उत्तराखंड में प्रस्तावित और स्वीकृत राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं से न केवल सड़कें चौड़ी होंगी, बल्कि पुलों, सुरंगों और सुरक्षा ढांचे का भी आधुनिकीकरण होगा। इससे यात्रा का समय घटेगा और दुर्घटनाओं में कमी आएगी। उत्तराखंड में सड़क और बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में हालिया प्रगति के पीछे केंद्र और राज्य सरकार के बीच बेहतर समन्वय एक महत्वपूर्ण कारक रहा है। केंद्र की रणनीतिक प्राथमिकताएं और राज्य की स्थानीय ज़रूरतें जब एक दिशा में काम करती हैं, तभी बड़े और टिकाऊ प्रोजेक्ट जमीन पर उतर पाते हैं।

ऋषिकेश बाइपास, गैरसैंण कनेक्टिविटी और कुमाऊं-गढ़वाल कॉरिडोर जैसी परियोजनाएं इसी समन्वय का परिणाम हैं। इन परियोजनाओं की नियमित समीक्षा और निगरानी यह संकेत देती है कि सरकार अब केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं रहना चाहती। उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था में पर्यटन और तीर्थाटन की अहम भूमिका है। चारधाम यात्रा, हिल स्टेशन, साहसिक पर्यटन और धार्मिक स्थल राज्य को सालभर जीवंत बनाए रखते हैं। लेकिन कमजोर सड़क व्यवस्था के कारण कई संभावनाएं अब तक पूरी तरह साकार नहीं हो पाईं। नई सड़क परियोजनाओं से न केवल चारधाम यात्रा सुगम होगी, बल्कि दूरस्थ पर्यटन स्थलों तक भी पहुंच आसान होगी। इससे पर्यटन का दबाव कुछ गिने-चुने स्थानों तक सीमित न रहकर पूरे राज्य में फैलेगा, जो सतत विकास की दृष्टि से आवश्यक है। हिमालयी राज्य में विकास हमेशा पर्यावरणीय बहस के केंद्र में रहता है। सड़क निर्माण से जुड़े पर्यावरणीय सवालों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि बिना बुनियादी ढांचे के पहाड़ों का विकास संभव नहीं है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि आने वाले दशक में उत्तराखंड की पहचान उसकी मज़बूत सड़कों और संतुलित बुनियादी ढांचे से तय होगी और यही उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।

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