अरावली के दुश्मन कौन?

अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा को लेकर चौतरफा हो रहा विरोध
देश की सबसे पुरानी पर्वतमाला अरावली को लेकर इन दिनों पूरे देश में बहस छिड़ी हुई है। सवाल सि़र्फ एक परिभाषा का नहीं, बल्कि उत्तर भारत के भविष्य, पर्यावरण और जीवन का है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि अरावली की नई परिभाषा बदलकर खनन को आसान बनाया जा रहा है, जिससे न केवल आने वाले वर्षों में ये पहाड़ पूरी तरह खत्म हो सकते हैं बल्कि इसके दूरगामी नतीजे दिल्ली और उत्तराखंड जैसे राज्यों को उठाने पड़ सकते हैं। दस्तक टाइम्स के संपादक दयाशंकर शुक्ल सागर की रिपोर्ट।
अरावली दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत शृंखलाओं में से एक है, जो राजस्थान, हरियाणा, गुजरात और राजधानी दिल्ली तक फैली हुई है। इसका ज्यादा हिस्सा राजस्थान में आता है जहां इसे आडावाला पर्वत के नाम से भी जाना जाता है। अरावली पर्वत शृंखला की अनुमानित उम्र करीब साठ करोड़ वर्ष है। अरावली पर्वतमाला के आस-पास सदियों से भील जनजाति निवास करती रही है। अरावली पर्वतमाला प्राकृतिक संसाधनों व खनिज़ से भरी हुई है और ये पश्चिमी रेगिस्तान के विस्तार को रोकने का काम करती है। यहां पाए जाने वाले प्राकृतिक संसाधन व खनिज़ पर खनन माफिया की हमेशा नज़र लगी रहती है। विवाद की जड़ राजस्थान में अरावली पर्वतमाला में बड़े पैमाने पर चल रहा खनन है। फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया यानी एफएसआई ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि अरावली की करीब 10 हजार पहाड़ियों में खनन होने से यह पर्वतमाला लगातार खत्म होती जा रही है और इसे रोके जाने की ज़रूरत है। 100 मीटर का फॉर्मूला राजस्थान में कई सालों से चल रहा है। इसी नियम की आड़ में अरावली की छोटी पहाड़ियों में बड़े पैमाने पर खनन हुआ। कई जगह तो पहाड़ के पहाड़ गायब हो चुके हैं। इस रिपोर्ट के बाद सेंट्रल इम्पॉवरमेंट कमेटी ने सुप्रीम कोर्ट से खनन पर रोक लगाने की सिफारिश की। कोर्ट ने इस बारे में केंद्र सरकार से जवाब मांगा तो जवाब में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक रिपोर्ट दाखिल कर बताया कि राजस्थान में रिचर्ड म़र्फी के लैंडफॉर्म सिद्धांत लागू है। देश में अब तक पहाड़ की कोई परिभाषा तय नहीं है।
खत्म हो रही पहाड़ियां
कुछ राज्य इस मामले में लैंड और हिल क्लासिफिकेशन के लिए रिचर्ड म़र्फी फॉर्मूला इस्तेमाल करते हैं। रिचर्ड म़र्फी ने 1968 के भूमि सुधार वर्गीकरण के तहत पहाड़ी क्षेत्रों की भूमि को उसकी उपयोग-क्षमता और ढलान के आधार पर परिभाषा तय की थी ताकि पहाड़ी इलाकों में जमीन को वर्गीकृत किया जा सके और वहां भूमि-सीमा नियम यथार्थ और न्यायपूर्ण बनाए जा सकें। इस सिद्धांत के तहत केवल 100 मीटर या उससे ऊंची पहाड़ी को ही पहाड़ और अरावली माना गया। तमाम मीडिया रिपोर्ट में सामने आया कि इसकी आड़ में अरावली को तेजी से नष्ट किया जा रहा है। दिल्ली से करीब 80 किलोमीटर दूर एनसीआर के भिवाड़ी के कैरानी इलाके में हालात बेहद गंभीर हैं। एफएसआई की रिपोर्ट में भी इस क्षेत्र का जिक्र है, जहां अरावली की पहाड़ियां लगभग गायब हो चुकी हैं। यहां 200 से 300 फीट ऊंचे पहाड़ों को खनन माफियाओं ने पूरी तरह खोद डाला है। पहाड़ियों के पास ही बड़े-बड़े क्रेशर प्लांट लगे हैं, जो वन विभाग की जमीन से सटे हुए हैं। दूर तक नज़र दौड़ाने पर अरावली का नामोनिशान नहीं दिखता। स्थानीय लोगों का कहना है कि आसपास के वैध लीजधारक 60 मीटर ऊंची पहाड़ी को अरावली से बाहर बताकर लीज पर ले लेते हैं और फिर आसपास की सारी पहाड़ियों को खोद देते हैं। 2003 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा अरावली में खनन पर रोक के बावजूद राजस्थान सरकार ने 2008 में इसी सिद्धांत के तहत खनन की अनुमति दी थी। ग्राउंड पर देखा गया कि कुछ खदानों में 500 मीटर तक खुदाई हो चुकी है। आरोप है कि वन विभाग और माइनिंग विभाग की मिलीभगत से इसका दुरुपयोग हुआ। 2008 से 2015 के दौरान कई लीज जांच में गलत पाई गईं, लेकिन तत्कालीन सरकारों में कोई ठोस कार्रवाई नहीं की।

सुप्रीम कोर्ट ने अरावली की पहाड़ियों में अवैध खनन रोकने के लिए केंद्र सरकार से जवाब मांगा था। अदालत का कहना था कि अभी अरावली की पहाड़ियों को लेकर कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है और सभी राज्य अपने हिसाब से यह तय करते हैं कि वो किस पहाड़ को पहाड़ मानेंगे और किस पहाड़ पर खनन करने की इजाज़त देंगे। कोर्ट ने केंद्र से पहाड़ की परिभाषा तय को लेकर जवाब देने को कहा। इसी आदेश पर केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने एक उच्च स्तरीय कमेटी बनाई थी। केंद्र सरकार की इस कमेटी ने रिचर्ड म़र्फी फॉर्मूला को सही माना। कमेटी की नई सिफारिशों के मुताबिक अगर किसी एक या उससे ज़्यादा पहाड़ों की ऊंचाई 100 मीटर से ज़्यादा है तो ऐसे मामलों में 500 मीटर के पूरे इलाके को अरावली रेंज माना जाएगा। उदाहरण के लिए अगर प्वाइंट क पर कोई पहाड़ है और उसकी ऊंचाई 100 मीटर से ज़्यादा है तो ऐसे मामले में उस पहाड़ के 500 मीटर के दायरे को अरावली रेंज मान लिया जाएगा और वहां किसी भी प्रकार के खनन की इजाज़त नहीं होगी। इसके अलावा अगर प्वाइंट क से कुछ दूर एक और पहाड़ की ऊंचाई 100 मीटर से ज़्यादा है तो उसके भी 500 मीटर के दायरे को अरावली रेंज में गिना जाएगा और वहां इस पूरे इलाके में खनन को रोकना सरकार का काम होगा।
यानी नए मानदंडों के कारण अरावली पर्वतमाला के उन बड़े भूभागों को बाहर कर दिया जाएगा जिन्हें भारतीय वन सर्वेक्षण (एफएसआई) के 3 डिग्री ढलान वाले फार्मूले के तहत अरावली पर्वतमाला के भाग के रूप में पहचाना गया है। यह फार्मूला अरावली राज्य की न्यूनतम ऊंचाई (राजस्थान के मामले में 115 मीटर) से ऊपर के उन सभी क्षेत्रों को अरावली पर्वतमाला मानता है जिनकी ढलान कम से कम 3 डिग्री है। राजस्थान में इस पर्वतमाला का लगभग दो-तिहाई हिस्सा है। एफएसआई के 3 डिग्री ढलान वाले फार्मूले के अनुसार, अरावली पर्वतमाला राजस्थान के 15 जिलों में 40,483 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली हुई है, जो इन जिलों के कुल 1,23,086 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल का लगभग 33% है। 100 मीटर की परिभाषा के अंतर्गत, एफएसआई द्वारा इन 15 जिलों में चिन्हित 1,18,575 अरावली पर्वतमालाओं में से 99.12% (1,17,527) पर्वतमालाएं, उनकी ढलानों और आसपास के क्षेत्रों सहित, इस दायरे से बाहर रह जाएंगी। इसके अलावा, पर्यावरण मंत्रालय द्वारा सर्वोच्च न्यायालय को सौंपी गई गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली में फैले 34 अरावली जिलों की सूची से कई जिलों को पूरी तरह से हटा दिया गया है। उदाहरण के लिए, राजस्थान का सवाई माधोपुर जिला, जो अरावली और्र ंवध्य पर्वत शृंखलाओं के संगम पर स्थित रणथंभोर बाघ अभ्यारण्य के लिए प्रसिद्ध है, इस सूची में शामिल नहीं है। इसी तरह, चित्तौड़गढ़ जिला भी गायब है, जो अरावली की एक ऊंची चट्टान पर बने किले के लिए प्रसिद्ध है और यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है। राजस्थान का नागौर जिला, जहां भारतीय वन सर्वेक्षण ने 1,110 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को अरावली क्षेत्र के रूप में चिह्नित किया है, उसे भी सूची से बाहर रखा गया है।
इसलिए हो रहा विरोध
सुप्रीम कोर्ट ने कमेटी की सिफारिश को मंजूरी दे दी और अरावली की परिभाषा को स्वीकार कर लिया। इस तरह अरावली पहाड़ियों की परिभाषा बदलने के बाद लगभग पूरे उत्तर भारत में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। पर्यावरणविदों का कहना है कि सि़र्फ ऊंचाई के आधार पर अरावली को परिभाषित करने से कई ऐसी पहाड़ियों पर खनन और निर्माण के लिए दरवाज़ा खुल जाने का ़खतरा पैदा हो जाएगा, जो 100 मीटर से छोटी हैं, झाड़ियों से ढकी हुईं हैं और पर्यावरण के लिए ज़रूरी हैं। इन सिफारिशों का विरोध करने वालों में स्थानीय लोग, किसान, पर्यावरण कार्यकर्ताओं के अलावा कुछ जगहों पर वकील और राजनीतिक दल भी शामिल हैं। पीपल ़फॉर अरावलीज़ समूह की संस्थापक सदस्य नीलम आहलूवालिया ने कहा कि नई परिभाषा अरावली की अहम भूमिका को कमज़ोर कर सकती है। उन्होंने कहा कि अरावली उत्तर पश्चिम भारत में ‘रेगिस्तान बनने से रोकने, भूजल को रीचार्ज करने और लोगों की आजीविका बचाने’ के लिए ज़रूरी है। विशेषज्ञों का कहना है कि छोटी-छोटी झाड़ियों से ढकी पहाड़ियां भी रेगिस्तान बनने से रोकने, भूजल रीचार्ज करने और स्थानीय लोगों के रोज़गार में अहम योगदान देती हैं। अरावली बचाने के आंदोलन से जुड़े पर्यावरण कार्यकर्ता विक्रांत टोंगड़ कहते हैं, ‘अरावली को सि़र्फ ऊंचाई से नहीं बल्कि उसके पर्यावरणीय, भूगर्भीय और जलवायु संबंधी महत्व से परिभाषित किया जाना चाहिए।’ उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहाड़ों और पहाड़ी प्रणालियों की पहचान उस काम से होती है जो उनके होने से संभव होते हैं न कि ऊंचाई के किसी मनमाने पैमाने से। वह कहते हैं, ‘ज़मीन का कोई भी हिस्सा जो भूगर्भीय रूप से अरावली का हिस्सा है और पर्यावरण संरक्षण या रेगिस्तान बनने से रोकने में अहम भूमिका निभाता है, उसे अरावली माना जाना चाहिए, चाहे उसकी ऊंचाई कितनी भी हो।’

कार्यकर्ता मांग कर रहे हैं कि सरकार अरावली क्षेत्रों को वैज्ञानिक मानकों से परिभाषित करे, जिसमें उसका भूगोल, पर्यावरण, वन्यजीव संपर्क और जलवायु संघर्ष क्षमता शामिल हो। इस जंग में विपक्षी दल भी कूद पड़े हैं। उनका कहना है कि नई परिभाषा से पर्यावरण और पारिस्थितिकी को गंभीर नु़कसान पहुंच सकता है। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि अरावली की रक्षा को दिल्ली का अस्तित्व बचाने से अलग नहीं किया जा सकता। राजस्थान कांग्रेस के नेता टीका राम जुल्ली ने अरावली को राज्य की जीवनरेखा बताया और कहा कि अगर यह न होती तो ‘दिल्ली तक का पूरा इला़का रेगिस्तान बन गया होता।’ इंडियन एक्सप्रेस ने भारतीय वन सर्वेक्षण के आंकड़ों के हवाले से लिखा है कि अरावली पर्वतमाला में मानचित्रित 12,000 से अधिक पर्वतीय संरचनाओं में से 1,100 से भी कम संरचनाएं 100 मीटर की ऊंचाई के मानदंड को पूरा करती हैं। इसका अर्थ यह है कि भूवैज्ञानिकों, पारिस्थितिकीविदों और स्थानीय समुदायों द्वारा ऐतिहासिक रूप से अरावली पर्वतमाला के हिस्से के रूप में मान्यता प्राप्त 90 प्रतिशत से अधिक भूभाग औपचारिक कानूनी संरक्षण से बाहर होने के खतरे में है। ये ‘वंचित’ संरचनाएं पारिस्थितिक रूप से महत्वहीन नहीं हैं। ये थार रेगिस्तान से धूल के परिवहन को कम करने वाले पवन अवरोधक के रूप में, जल-संकटग्रस्त जिलों में भूजल पुनर्भरण को सक्षम करने वाले सूक्ष्म जल संग्रहण क्षेत्रों के रूप में, और राजस्थान और हरियाणा में खंडित वन्यजीव आवासों को जोड़ने वाले गलियारों के रूप में काम करती हैं।
क्या कहना है सरकार का!
उधर केंद्र सरकार का कहना है कि नई परिभाषा का म़कसद नियमों को मज़बूत करना और एकरूपता लाना है। खनन को सभी राज्यों में समान रूप से नियंत्रित करने के लिए एक स्पष्ट और वस्तुनिष्ठ परिभाषा ज़रूरी थी। नई परिभाषा पूरे पहाड़ी तंत्र को शामिल करती है जिसमें ढलानें, आसपास की ज़मीन और बीच के इला़के शामिल हैं ताकि पहाड़ी समूहों और उनके आपसी संबंधों की सुरक्षा हो सके। केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने कहा कि यह मान लेना ़गलत है कि 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली हर ज़मीन पर खनन की इजाज़त होगी। सरकार का कहना है कि अरावली पहाड़ियों या शृंखलाओं के भीतर नए खनन पट्टे नहीं दिए जाएंगे और पुराने पट्टे तभी जारी रह सकते हैं, जब वे टिकाऊ खनन के नियमों का पालन करें। मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि ‘अभेद्य’ क्षेत्रों, जैसे कि संरक्षित जंगल, पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र और आद्र्रभूमि में खनन पर पूरी तरह रोक है। हालांकि इसका अपवाद कुछ विशेष, रणनीतिक और परमाणु खनिज हो सकते हैं, जिसकी अनुमति ़कानूनन दी गई हो। पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि 1,47,000 वर्ग किलोमीटर में फैली अरावली शृंखला का सि़र्फ लगभग 2% हिस्सा ही संभावित रूप से खनन के लिए इस्तेमाल हो सकता है और वह भी विस्तृत अध्ययन और आधिकारिक मंज़ूरी के बाद। उधर कई पर्यावरणविद् अदालत की नई परिभाषा को चुनौती देने के लिए ़कानूनी विकल्प तलाश रहे हैं।



