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संत रविदास : भक्ति, समानता और सामाजिक चेतना की अमर मशाल

मन ही मंदिर, कर्म ही पूजा

भारतीय संत परंपरा में कुछ नाम ऐसे हैं, जो केवल अपने समय की नहीं, बल्कि हर युग की अंतरात्मा बन जाते हैं। संत शिरोमणि गुरु रविदास ऐसे ही संत हैं, जिनकी वाणी आज भी समाज के भीतर जमी जड़ताओं को हिलाती है, जिनके दोहे आज भी मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने का कार्य करते हैं और जिनका जीवन आज भी यह सिखाता है कि ईश्वर मंदिरों में नहीं, मनुष्यता में वास करता है। “मन ही पूजा, मन ही धूप, मन ही सेऊँ सहज स्वरूप।” यह पंक्ति केवल आध्यात्मिक अनुभूति नहीं, बल्कि एक सम्पूर्ण सामाजिक दर्शन है। गुरु रविदास कहते हैं कि यदि मन निर्मल है, विचार शुद्ध हैं और कर्म न्यायपूर्ण हैं, तो वही मन मंदिर है, वही धूप-दीप है और वही ईश्वर की सच्ची उपासना है. संत रविदास भारत की आत्मा की आवाज हैं, एक ऐसी आवाज, जो शोर नहीं मचाती, पर सदियों तक गूंजती रहती है। उनका ‘बेगमपुरा’ आज भी अधूरा है, पर उसकी नींव हमारे हाथों में है। संत रविदास जयंती पर यही कामना, भक्ति विवेक के साथ हो, आस्था समानता के साथ हो, और परंपरा परिवर्तन के साथ।

सुरेश गांधी

भारतीय सभ्यता की सबसे बड़ी शक्ति उसकी संत परंपरा रही है। यह परंपरा केवल ईश्वर की उपासना तक सीमित नहीं रही, बल्कि समय-समय पर समाज के जड़ होते ढांचे को तोड़ने, मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने और सत्ता, व्यवस्था व पाखंड के विरुद्ध प्रश्न खड़े करने का साहस भी करती रही है। इसी विराट परंपरा के ऐसे ही अमर हस्ताक्षर हैं, संत शिरोमणि रविदास। संत रविदास जयंती केवल एक संत का जन्मदिन नहीं है। यह भारत की सामाजिक चेतना, समता-बोध और आत्मसम्मान की पुनर्पाठ का अवसर है। यह दिन हमें यह सोचने को विवश करता है कि क्या आज का भारत उस ‘बेगमपुरा’ के एक क़दम भी निकट पहुँचा है, जिसकी कल्पना एक साधारण दिखने वाले, पर असाधारण विचारों वाले संत ने सदियों पहले की थी। भक्ति आंदोलन को प्रायः केवल धार्मिक आंदोलन के रूप में देखा गया, लेकिन वास्तव में यह भारतीय समाज का सबसे बड़ा सामाजिक सुधार आंदोलन था। इस आंदोलन ने जाति, वर्ग, ऊँच-नीच और कर्मकांड की दीवारों को चुनौती दी। कबीर, नामदेव, दादू और रविदास जैसे संतों ने ईश्वर को सत्ता और पुरोहितवाद के कब्जे से मुक्त किया। संत रविदास ने भक्ति को करुणा, श्रम और समानता से जोड़ा। वे उस दौर में खड़े हुए जब समाज जन्म के आधार पर मनुष्य की हैसियत तय करता था। उन्होंने निर्भीक होकर कहा,

“रविदास जन्म के कारणै, होत न कोउ नीच,
नर कूँ नीच करि डारि है, ओछे करम की कीच।”

अर्थात मनुष्य की नीचता या महानता का पैमाना उसका जन्म नहीं, उसके कर्म होते हैं। संत रविदास का जन्म उस समय हुआ, जब भारतीय समाज जाति की कठोर दीवारों में कैद था। श्रम को हेय, पेशे को पहचान और जन्म को भाग्य मान लिया गया था। जिस पेशे से संत रविदास जुड़े, उसे समाज ने सदियों तक तिरस्कार की दृष्टि से देखा। परंतु इतिहास गवाह है कि जिन्होंने समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति को कुचलने की कोशिश की, उसी पायदान से एक ऐसा विचार उठा जिसने पूरी व्यवस्था को चुनौती दे दी। रविदास ने कभी तलवार नहीं उठाई, न कोई राजनीतिक सत्ता मांगी, न किसी विद्रोह का बिगुल फूंका। उन्होंने जो किया, वह कहीं अधिक प्रभावी था. उन्होंने विचार को हथियार बनाया, भक्ति को विद्रोह बनाया और करुणा को क्रांति का माध्यम।

संत रविदास का प्रभाव किसी एक परंपरा तक सीमित नहीं रहा। भक्त मीरा के जीवन में उनका मार्गदर्शन स्पष्ट दिखाई देता है। मीरा की भक्ति में जो निर्भीकता, सामाजिक मर्यादाओं से टकराने का साहस और प्रेम की निर्लेपता दिखती है, उसके पीछे रविदास की विचारधारा की छाया है। यह कोई संयोग नहीं कि संत रविदास के पद गुरु ग्रंथ साहिब में स्थान पाते हैं। यह भारतीय संत परंपरा की उस उदारता का प्रमाण है, जहाँ विचार को महत्व दिया गया, न कि जन्म या पहचान को। संत रविदास का जीवन श्रम की गरिमा का सबसे सशक्त उदाहरण है। उन्होंने कभी अपने पेशे से पलायन नहीं किया, न ही उसे छिपाया। उन्होंने यह सिखाया कि श्रम कोई अपमान नहीं, बल्कि साधना है। आज जब विकास की दौड़ में श्रमिक, कारीगर और मेहनतकश वर्ग हाशिये पर धकेले जा रहे हैं, तब संत रविदास का संदेश हमें यह याद दिलाता है कि सभ्यता का निर्माण महलों से नहीं, हाथों की मेहनत से होता है।

भक्ति जो पलायन नहीं, प्रतिरोध थी
भारतीय भक्ति आंदोलन को अक्सर एक आध्यात्मिक लहर मानकर सीमित कर दिया जाता है, लेकिन यह दृष्टि अधूरी है। भक्ति आंदोलन, विशेषकर संत रविदास की भक्ति, सामाजिक प्रतिरोध का सबसे सशक्त रूप थी। यह वह दौर था, जब धर्म कर्मकांडों की गिरफ्त में था, मंदिर सत्ता और जाति के नियंत्रण में थे, और ईश्वर तक पहुंच का रास्ता चुनिंदा लोगों के लिए आरक्षित कर दिया गया था। संत रविदास ने इस व्यवस्था को जड़ से हिलाते हुए कहा, ईश्वर किसी एक वर्ग, जाति या स्थान की बपौती नहीं है। वह वहाँ है, जहाँ मनुष्य है, जहाँ श्रम है, जहाँ सच्चाई है। उनकी भक्ति न तो भाग्य के आगे समर्पण थी, न ही शोषण को स्वीकार करने का औजार। वह सम्मान के साथ जीने की घोषणा थी।

काशी की धरती और संत रविदास
उत्तर प्रदेश की पावन नगरी काशी केवल मोक्ष की नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना की भी भूमि रही है। इसी धरती पर 15वीं शताब्दी में गुरु रविदास का जन्म हुआ। सीर गोवर्धनपुर क्षेत्र से उठी उनकी वाणी ने पूरे भारत में समता का उद्घोष किया। काशी में जन्मे रविदास ने देखा कि कैसे धर्म के नाम पर समाज को बाँटा जा रहा है। उन्होंने इसी काशी से यह ऐलान किया कि
“मन चंगा तो कठौती में गंगा।”

यानी पवित्रता किसी नदी या अनुष्ठान की मोहताज नहीं, वह मनुष्य के अंतःकरण में होती है. मतलब साफ है उन्होंने केवल ईश्वर की नहीं, बल्कि मनुष्य की मुक्ति का मार्ग दिखाया। जिनकी वाणी ने समाज की जड़ हो चुकी जाति-व्यवस्था पर सीधा प्रहार किया और जिनका जीवन स्वयं एक चलता-फिरता सामाजिक आंदोलन बन गया। रविदास ने जाति व्यवस्था के विरुद्ध केवल शब्दों का युद्ध नहीं छेड़ा, बल्कि अपने जीवन, अपने कर्म और अपनी साधना से उसे चुनौती दी। लोकमान्यताओं में कहा जाता है कि पूर्व जन्म में वे ब्राह्मण थे, किंतु पुनर्जन्म में उन्होंने उस जाति में जन्म लेना स्वीकार किया जिसे समाज सबसे निम्न समझता था, मानो स्वयं ईश्वर यह संदेश देना चाहता हो कि महानता जन्म से नहीं, चेतना से आती है। ऐसा कहा जाता है कि उनका जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ, जो मृत पशुओं के चमड़े से जुड़े कार्य करता था। लेकिन जिस समाज ने इस पेशे को तिरस्कार की दृष्टि से देखा, उसी समाज को रविदास ने यह समझाया कि श्रम अपवित्र नहीं होता, अपवित्र होता है श्रम के प्रति घृणा का भाव।

जाति व्यवस्था के विरुद्ध निर्भीक प्रतिरोध
गुरु रविदास का सबसे बड़ा योगदान था, जाति आधारित श्रेष्ठता के विचार पर प्रहार। उन्होंने स्पष्ट कहा कि किसी को केवल उसके पद, वर्ण या जन्म के कारण पूजनीय नहीं माना जाना चाहिए
“ब्राह्मण मत पूजिए जो होवे गुणहीन,
पूजिए चरण चंडाल के जो होने गुण प्रवीन।”
यह पंक्तियाँ केवल धार्मिक आलोचना नहीं, बल्कि सामाजिक क्रांति का घोष थीं। उस समय यह कहना साहस का कार्य था, जब समाज पूरी तरह वर्ण व्यवस्था में जकड़ा हुआ था।

कर्म, श्रम और आत्मसम्मान का दर्शन
गुरु रविदास को कभी भी धन या वैभव का मोह नहीं रहा। वे श्रम को ईश्वर की पूजा मानते थे। उनके लिए कर्म ही मनुष्य का धर्म था
“करम बंधन में बंध रहियो, फल की ना तज्यो आस,
करम मानुष का धर्म है, सत् भाखै रविदास।”
वे यह नहीं कहते कि फल की इच्छा छोड़ दो, बल्कि यह कहते हैं कि कर्म करते रहो, फल अपने आप आएगा। यह दर्शन आज के समय में भी उतना ही प्रासंगिक है, जब त्वरित सफलता और शॉर्टकट की संस्कृति हावी है।

मीराबाई और भक्ति की परंपरा
भक्ति आंदोलन में गुरु रविदास का प्रभाव इतना गहरा था कि संत मीराबाई ने उन्हें अपना गुरु माना। मीराबाई के भक्ति भाव और आत्मसमर्पण में रविदास की शिक्षाओं की स्पष्ट छाया दिखती है। यह तथ्य स्वयं में प्रमाण है कि रविदास का प्रभाव केवल समाज के एक वर्ग तक सीमित नहीं था।

रविदासिया पंथ और सामाजिक संगठन
गुरु रविदास की शिक्षाओं से प्रेरित होकर रविदासिया पंथ की स्थापना हुई। यह पंथ केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक संगठन भी रहा। इसके अनुयायियों ने सेवा, लंगर, शिक्षा और समानता को जीवन का आधार बनाया। हर वर्ष माघ मास की पूर्णिमा को संत रविदास जयंती मनाई जाती है। इस अवसर पर नगर कीर्तन, शोभायात्राएँ और लंगर आयोजित होते हैं। यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता का उत्सव होते हैं।

आधुनिक भारत में संत रविदास की प्रासंगिकता
आज जब समाज फिर से जातीय, धार्मिक और वैचारिक खाँचों में बँटने लगा है, संत रविदास की वाणी हमें आईना दिखाती है। वे हमें सिखाते हैं कि धर्म का अर्थ घृणा नहीं, करुणा है. भक्ति का अर्थ पलायन नहीं, कर्म है. ईश्वर का अर्थ सत्ता नहीं, संवेदना है. उनकी सोच संविधान के मूल्यों, समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्वकृसे भी मेल खाती है।

मनुष्यता ही सबसे बड़ा धर्म
गुरु रविदास का सम्पूर्ण जीवन इस बात का प्रमाण है कि मनुष्य होना ही सबसे बड़ी साधना है। उन्होंने समाज को बताया कि यदि मन पवित्र है, कर्म सही हैं और नीयत साफ है, तो वही ईश्वर की सच्ची पूजा है। आज संत रविदास जयंती केवल एक तिथि नहीं, बल्कि एक वैचारिक स्मरण है, कि हम अपने भीतर झाँकें,अपने कर्मों को सुधारें, और समाज को जोड़ने का कार्य करें। मन ही मंदिर बने, कर्म ही पूजा बने, यही संत रविदास की अमर विरासत है।

कबीर के समकालीन, विचारों के सहयात्री
गुरु रविदास कबीर के समकालीन थे। दोनों संतों ने मिलकर धर्म के पाखंड, बाह्याडंबर और जातिगत अहंकार पर चोट की। दोनों की वाणी में एक साझा स्वर सुनाई देता है, ईश्वर मंदिरों में नहीं, मनुष्य के भीतर निवास करता है।रविदास का दृष्टिकोण अत्यंत सकारात्मक और करुणामय था। लोकविश्वासों में उन्हें कुष्ठ रोग निवारक भी माना गया। यह चमत्कार चाहे शाब्दिक हो या प्रतीकात्मक, पर इसका संकेत स्पष्ट है, उनकी संगति से मनुष्य रोग से नहीं, हीनता से मुक्त होता था।

जीवन से पलायन नहीं, जीवन का शोधन
गुरु रविदास गृहस्थ थे। उनका विवाह श्रीमती लोना देवी से हुआ और उनके पुत्र का नाम विजयदास बताया जाता है। यह तथ्य अपने आप में महत्वपूर्ण है, क्योंकि रविदास का संतत्व संन्यास में नहीं, गृहस्थ जीवन की पवित्रता में प्रकट होता है। वे बताते हैं कि भक्ति जीवन से भागने का नाम नहीं, बल्कि जीवन को निर्मल बनाने की साधना है। उनकी वाणी सिख परंपरा में भी आदर के साथ समाहित की गई। गुरुग्रंथ साहिब में उनके भक्ति पदों का स्थान यह प्रमाणित करता है कि रविदास का दर्शन संकीर्ण नहीं, समावेशी और सार्वकालिक है।

ऐसा चाहूं राज मैं…
संत रविदास का सपना किसी एक धर्म या जाति का नहीं था, बल्कि समानता पर आधारित समाज का था,
“ऐसा चाहूं राज मैं, जहां मिलै सबन के अन्न।
छोट-बड़ेन सब सम बसैं, रविदास रहै प्रसन्न।”
यह पंक्तियाँ केवल कविता नहीं, बल्कि एक सामाजिक संविधान हैं, जहाँ भूख न हो, भेद न हो, और मनुष्य मनुष्य के बराबर हो।

पाखंड और तीर्थ-आडंबर का प्रतिकार
रविदास ने तीर्थों की नहीं, चित्त की शुद्धता को महत्व दिया,
“का मथुरा, का द्वारिका, का काशी-हरिद्वार।
रैदास खोजा दिल आपना, तह मिलिया दिलदार।”

उनके जीवन की एक प्रसिद्ध घटना इसी दर्शन को साकार करती है। शिष्यों द्वारा गंगा-स्नान के आग्रह पर उन्होंने श्रम से जुड़ा अपना वचन नहीं तोड़ा। उनका तर्क सीधा था, यदि मन कर्म में उलझा है, तो तीर्थ भी व्यर्थ है। यहीं से जन्मी वह अमर कहावत “मन चंगा तो कठौती में गंगा।” यह पंक्ति भारतीय आध्यात्मिक इतिहास की सबसे सशक्त लोकतांत्रिक उद्घोषणाओं में से एक है।

राम-कृष्ण भक्ति परंपरा के कवि
रविदास राम और कृष्ण भक्ति परंपरा के संत कवि थे। उनकी रचनाओं में आत्मसमर्पण, प्रेम और दास्य भाव का अद्भुत समन्वय है, “प्रभु जी तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग-अंग बास समानी…” उनकी भाषा सहज, लोकधर्मी और हृदयस्पर्शी है। यही कारण है कि उनके पद आज भी भजन बनकर जन-जन की जुबान पर हैं। मानव जीवन : हीरा, जिसे कोड़ी न बनाओ रविदास मानव जीवन को दुर्लभ और अमूल्य मानते हैं,

“रैनी गंवाई सोय करि, दिवस गंवायो खाय।
हीरा जनम अमोल है, कोड़ी बदले जाय।”
वे चेतावनी देते हैं कि यदि यह जीवन केवल भोग और अहंकार में नष्ट हो गया, तो यह सबसे बड़ी क्षति होगी।

मंदिर-मस्जिद से परे ईश्वर
धार्मिक संघर्षों के दौर में रविदास ने निर्भीक होकर कहा :- “रविदास न पूजै देहरा, अरु न मस्जिद जाय। जहं-जहं ईश का वास है, तहं-तहं शीश नवाय।” उनके लिए ईश्वर किसी संरचना में नहीं, बल्कि चेतना में था।

संत शिरोमणि की विरासत
मीराबाई जैसी भक्त कवयित्री ने उन्हें गुरु माना। यह तथ्य सिद्ध करता है कि रविदास का प्रभाव सामाजिक सीमाओं से परे था। उन्होंने न तो किसी विश्वविद्यालय में शिक्षा पाई, न किसी औपचारिक गुरु से दीक्षा ली, ईश्वर ही उनके गुरु थे, और जीवन उनकी पाठशाला। गुरु रविदास केवल संत नहीं थे, वे समाज के अंतःकरण थे। उन्होंने बताया कि जब तक जाति, घृणा और अहंकार रहेंगे, तब तक मानवता अपूर्ण रहेगी। आज जब समाज फिर से दीवारों में बंट रहा है, संत रविदास की वाणी हमें स्मरण कराती है. मन को निर्मल करो, कर्म को ऊँचा रखो, और मनुष्य को मनुष्य समझो, यही सच्ची भक्ति है।

बेगमपुरा का स्वप्न और भारत की आत्मा की तलाश
संत रविदास की रचनाओं में ‘बेगमपुरा’ का विचार भारतीय सामाजिक चिंतन की अनमोल धरोहर है। यह केवल एक आदर्श नगर की कल्पना नहीं है, बल्कि एक ऐसे समाज का खाका है, जहाँ डर, दुख, भेदभाव और अन्याय का कोई स्थान नहीं।
“बेगमपुरा सहर को नाउँ, दुख अन्दोह नहीं तिहि ठाउँ।”

यह पंक्तियाँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी उस समय थीं। ‘बेगमपुरा’ में कोई छोटा-बड़ा नहीं, कोई अछूत-छूत नहीं, कोई राजा-प्रजा नहीं। यह वह समाज है, जहाँ मनुष्य को मनुष्य होने का पूरा अधिकार है। आज जब लोकतंत्र के बावजूद समाज में असमानता, बहिष्कार और हाशिये की पीड़ा बनी हुई है, तब ‘बेगमपुरा’ एक प्रश्न भी है और दिशा भी।

आज की पीढ़ी के लिए संदेश
आज की युवा पीढ़ी, जो पहचान, सम्मान और अवसर की तलाश में है, उसके लिए संत रविदास का जीवन एक गहरा संदेश देता है संघर्ष से मत डरो, अपनी जड़ों से मत भागो और अपने विचारों से कभी समझौता मत करो। उनकी वाणी आज भी कहती है कि ईश्वर वहाँ नहीं, जहाँ अहंकार है; वह वहाँ है, जहाँ करुणा है।

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