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वंदे मातरम् का सम्मान : शहीदों की विरासत और राष्ट्रधर्म की पुकार

भारत की राष्ट्रीय चेतना केवल इतिहास की घटनाओं से नहीं, बल्कि उन भावनाओं और बलिदानों से निर्मित हुई है, जिन्होंने इस राष्ट्र की आत्मा को आकार दिया। ‘वंदे मातरम्’ ऐसा ही एक अमर स्वर है, जिसने गुलामी के अंधकार में स्वतंत्रता की मशाल जलाने का कार्य किया। यह गीत केवल मातृभूमि का वंदन नहीं, बल्कि उस संघर्ष और समर्पण की कहानी है, जिसमें असंख्य स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए। अंग्रेजी शासन के खिलाफ जब देश का जनमानस उठ खड़ा हुआ, तब वंदे मातरम् आंदोलन की धड़कन बन गया। क्रांतिकारियों की हुंकार, आंदोलनों की ऊर्जा और जनसभाओं की चेतना इसी गीत से सशक्त हुई। आज जब राष्ट्रीय जीवन में वंदे मातरम् के सम्मान को और अधिक औपचारिक स्वरूप देने की पहल हो रही है, तब यह केवल प्रशासनिक व्यवस्था नहीं, बल्कि राष्ट्र की ऐतिहासिक स्मृति को जीवित रखने का प्रयास भी है। यह गीत भारत की सांस्कृतिक अस्मिता, स्वतंत्रता संग्राम की विरासत और राष्ट्रधर्म की भावना का प्रतीक है। वंदे मातरम् का सम्मान केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि उन शहीदों के प्रति कृतज्ञता का भाव है, जिन्होंने राष्ट्र की स्वतंत्रता और गौरव के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया।

सुरेश गांधी

भारत की राष्ट्रीय चेतना का इतिहास केवल घटनाओं का क्रम नहीं, बल्कि भावनाओं, संघर्षों और बलिदानों का महाग्रंथ है। इस महाग्रंथ के पन्नों में कुछ प्रतीक ऐसे हैं, जो समय और सत्ता से परे जाकर राष्ट्र की आत्मा बन जाते हैं। ‘वंदे मातरम्’ ऐसा ही एक अमर प्रतीक है। यह गीत केवल शब्दों की रचना नहीं, बल्कि उस भारत माता का वंदन है, जिसके लिए असंख्य वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी। आज जब इस गीत के सम्मान को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर विमर्श और औपचारिक व्यवस्थाएं मजबूत हो रही हैं, तब इसे केवल सांस्कृतिक परंपरा नहीं, बल्कि शहीदों की विरासत और राष्ट्रधर्म की पुकार के रूप में समझना आवश्यक हो जाता है।

वंदे मातरम् की रचना 1870 के दशक में महान साहित्यकार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी। यह गीत उनके प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ में प्रकाशित हुआ। उस समय भारत अंग्रेजी शासन की दासता में जकड़ा हुआ था और राष्ट्रीय चेतना बिखरी हुई थी। वंदे मातरम् ने उस चेतना को एक सूत्र में बांधने का कार्य किया। इतिहास गवाह है कि 1905 में बंग-भंग आंदोलन के दौरान यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन का घोष बन गया। जब अंग्रेजों ने बंगाल को विभाजित करने का प्रयास किया, तब सड़कों पर उतरने वाले लाखों भारतीयों की जुबान पर केवल एक स्वर था, वंदे मातरम्। यह गीत आंदोलन की ऊर्जा बन गया और अंग्रेजी शासन को चुनौती देने का साहस पैदा किया।

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अनेक क्रांतिकारी संगठनों ने इस गीत को अपना प्रेरणा स्रोत बनाया। क्रांतिकारी खुदीराम बोस, बिपिन चंद्र पाल, अरविंद घोष, लाला लाजपत राय जैसे अनेक सेनानियों के आंदोलनों में यह गीत जनचेतना का माध्यम बना। कई ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं कि स्वतंत्रता सेनानी गिरफ्तारी के समय और फांसी पर चढ़ते हुए भी वंदे मातरम् का उद्घोष करते थे। यह गीत केवल राष्ट्रप्रेम का प्रतीक नहीं रहा, बल्कि स्वतंत्रता की लड़ाई का हथियार बन गया।

भारत की संविधान सभा ने 24 जनवरी 1950 को वंदे मातरम् के प्रथम दो छंदों को राष्ट्रीय गीत का दर्जा प्रदान किया। यह निर्णय गहन विचार-विमर्श के बाद लिया गया। संविधान सभा ने यह स्पष्ट किया कि राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ और राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ दोनों ही राष्ट्रीय गौरव के प्रतीक हैं। यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि संविधान निर्माताओं ने वंदे मातरम् को केवल साहित्यिक या सांस्कृतिक धरोहर नहीं माना, बल्कि इसे राष्ट्रीय अस्मिता का आधार स्वीकार किया। भारत की स्वतंत्रता की यात्रा में जिस गीत ने जनमानस को एकजुट किया, उसे राष्ट्रीय पहचान के प्रतीक के रूप में स्थान देना स्वाभाविक था। किसी भी राष्ट्र की पहचान उसके शहीदों के बलिदान से बनती है।

भारत की स्वतंत्रता लाखों ज्ञात-अज्ञात वीरों के संघर्ष का परिणाम है। इन शहीदों के लिए राष्ट्र केवल भूमि नहीं, बल्कि मां के समान था। वंदे मातरम् इसी मातृभूमि के प्रति समर्पण का गीत है। इतिहासकार बताते हैं कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह गीत जनसभाओं, जुलूसों और आंदोलनों का स्थायी हिस्सा बन चुका था। अंग्रेजी शासन ने कई बार इस गीत के गायन पर प्रतिबंध लगाने का प्रयास किया, क्योंकि यह जनता में विद्रोह की भावना जगाता था। प्रतिबंधों के बावजूद जब जनता वंदे मातरम् का स्वर बुलंद करती थी, तब वह केवल विरोध नहीं, बल्कि स्वतंत्रता की घोषणा होती थी। आज जब हम वंदे मातरम् का सम्मान करते हैं, तो वह केवल सांस्कृतिक अनुष्ठान नहीं होता। वह उन शहीदों के प्रति श्रद्धांजलि होती है, जिन्होंने इस गीत को अपनी सांसों में बसाया था। यह गीत राष्ट्र की सामूहिक स्मृति का हिस्सा है।

भारतीय दर्शन में राष्ट्र को केवल राजनीतिक इकाई नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक अवधारणा माना गया है। राष्ट्रधर्म का अर्थ केवल कानून पालन नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति कर्तव्य और सम्मान का भाव है। वंदे मातरम् राष्ट्रधर्म की उसी भावना को व्यक्त करता है। यह गीत भारत की प्रकृति, संस्कृति और मातृत्व के भाव का वर्णन करता है। इसमें राष्ट्र को देवी के रूप में चित्रित किया गया है, जो भारतीय परंपरा का मूल तत्व है। यही कारण है कि यह गीत केवल देशभक्ति नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आस्था का भी प्रतीक है। हर राष्ट्र अपने प्रतीकों के माध्यम से नागरिकों को जोड़ने का प्रयास करता है। राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत केवल औपचारिक प्रतीक नहीं होते, बल्कि वे नागरिकों में साझा पहचान का भाव पैदा करते हैं।

भारत जैसे विविधताओं वाले देश में राष्ट्रीय प्रतीकों का महत्व और बढ़ जाता है। यहां भाषा, धर्म, परंपरा और जीवनशैली में भिन्नता होने के बावजूद राष्ट्रभावना सभी को जोड़ती है। वंदे मातरम् इसी एकता का प्रतीक है। जब नागरिक इस गीत के सम्मान में खड़े होते हैं या इसे गाते हैं, तो वह राष्ट्र के प्रति सामूहिक सम्मान का प्रदर्शन होता है। यह परंपरा नई पीढ़ी में राष्ट्रीय गौरव और जिम्मेदारी की भावना पैदा करती है। आज का भारत वैश्विक स्तर पर तेजी से आगे बढ़ रहा है। तकनीकी विकास, आर्थिक प्रगति और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा के बीच राष्ट्रीय पहचान को मजबूत बनाए रखना आवश्यक है। वंदे मातरम् जैसी सांस्कृतिक धरोहरें इस पहचान को स्थायी आधार प्रदान करती हैं. नई पीढ़ी के लिए यह जरूरी है कि वह वंदे मातरम् को केवल ऐतिहासिक गीत न समझे, बल्कि स्वतंत्रता संघर्ष की जीवंत विरासत के रूप में स्वीकार करे। जब युवा पीढ़ी इस गीत के भाव को समझेगी, तभी राष्ट्रधर्म की भावना मजबूत होगी।

राष्ट्रीय गीत का सम्मान राष्ट्र की गरिमा से जुड़ा विषय है। लेकिन यह भी आवश्यक है कि इस सम्मान को संवेदनशीलता और संवाद के साथ आगे बढ़ाया जाए। भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था विविधताओं का सम्मान करती है। इसलिए राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। इतिहास बताता है कि जब राष्ट्रप्रेम स्वाभाविक रूप से जनमानस में बसता है, तब वह अधिक प्रभावशाली और स्थायी होता है। वंदे मातरम् का सम्मान तभी सार्थक होगा, जब वह नागरिकों के हृदय में आत्मगौरव का भाव उत्पन्न करे। वंदे मातरम् केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान की प्रेरणा और भविष्य की दिशा है। यह गीत भारत की आत्मा का स्वर है, जिसमें स्वतंत्रता संग्राम की गूंज, शहीदों का बलिदान और राष्ट्रधर्म की पुकार समाहित है। आज जब यह गीत राष्ट्रीय जीवन में सम्मान के साथ स्थापित हो रहा है, तब इसे विवाद नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता और ऐतिहासिक विरासत के रूप में देखना चाहिए। क्योंकि राष्ट्र केवल संविधान और सीमाओं से नहीं बनता, राष्ट्र उन भावनाओं से बनता है जो नागरिकों को एक सूत्र में बांधती हैं। वंदे मातरम् उसी सूत्र का अमर मंत्र है, जो शहीदों की स्मृति को जीवित रखता है, राष्ट्रधर्म का मार्ग दिखाता है और भारत की आत्मा को स्वर देता है।

यह अलग बात है देशभक्ति के प्रतीकों को लेकर भारत में समय-समय पर नई बहसें जन्म लेती रही हैं। अब गृह मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ को लेकर जारी नए निर्देशों ने फिर एक बार राष्ट्रभावना, सांस्कृतिक अस्मिता और संवैधानिक स्वतंत्रता के सवालों को ताश के पत्तों की तरह फेंटकर सामने रख दिया है। आदेश के मुताबिक सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रगान से पहले वंदे मातरम् बजाया जाएगा, पूरे छह छंद गाए जाएंगे और उपस्थित लोगों का खड़े होकर सम्मान करना आवश्यक होगा। यह निर्णय जितना भावनात्मक प्रतीकवाद से जुड़ा है, उतना ही संवेदनशील लोकतांत्रिक विमर्श को भी जन्म देता है। भारत की आत्मा में ‘वंदे मातरम्’ केवल गीत नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम की चेतना का उद्घोष रहा है। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ यह गीत आंदोलनकारियों की सांसों में बसता था। यह वह स्वर था जिसने गुलामी की जंजीरों को चुनौती देने का साहस दिया। इसलिए राष्ट्रीय गीत के सम्मान की बात स्वाभाविक रूप से करोड़ों भारतीयों की भावनाओं से जुड़ती है।

गृह मंत्रालय का यह कदम राष्ट्रप्रेम को औपचारिक स्वरूप देने की कोशिश माना जा सकता है। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या राष्ट्रप्रेम आदेशों से पैदा होता है या भावनाओं से? सरकार का तर्क है कि राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान राष्ट्र की एकता और अनुशासन का आधार होता है। राष्ट्रगान के लिए पहले से तय प्रोटोकॉल की तरह राष्ट्रीय गीत के लिए भी स्पष्ट दिशा-निर्देश होने चाहिए। यह सोच तार्किक प्रतीत होती है क्योंकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में राष्ट्रीय पहचान के प्रतीकों को गरिमा देना आवश्यक है। स्कूलों में वंदे मातरम् गाने पर जोर भी युवा पीढ़ी को देश के इतिहास और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने की दिशा में सकारात्मक पहल कही जा सकती है। लेकिन लोकतंत्र की खूबसूरती केवल अनुशासन में नहीं, बल्कि विविधता और स्वतंत्रता में भी होती है। भारत का संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति और विचार की स्वतंत्रता देता है। यही कारण है कि समय-समय पर राष्ट्रीय प्रतीकों को लेकर अनिवार्यता और स्वैच्छिकता की बहस उठती रही है। सुप्रीम कोर्ट भी कई मामलों में यह स्पष्ट कर चुका है कि देशभक्ति का मापदंड केवल औपचारिक अनुष्ठानों से तय नहीं किया जा सकता। ऐसे में वंदे मातरम् के गायन को लेकर अनिवार्यता का सवाल स्वाभाविक रूप से चर्चा का विषय बनेगा।

इतिहास भी बताता है कि वंदे मातरम् के छह छंदों को लेकर पहले भी बहस रही है। 1950 में केवल शुरुआती दो छंदों को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया गया था क्योंकि बाद के छंदों को लेकर कुछ समुदायों ने धार्मिक आपत्तियां जताई थीं। अब पूरे छह छंदों को अनिवार्य करने का निर्णय कहीं न कहीं पुराने विवादों को फिर से हवा दे सकता है। भारत जैसे बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक देश में संतुलन बनाए रखना हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है। इस फैसले का राजनीतिक पहलू भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। राष्ट्रीय प्रतीकों का इस्तेमाल अक्सर राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन जाता है। सत्ता पक्ष इसे राष्ट्रवाद को मजबूत करने वाला कदम बता सकता है, जबकि विपक्ष इसे भावनात्मक मुद्दों के जरिए जनमत प्रभावित करने की रणनीति के रूप में देख सकता है। लोकतंत्र में यह टकराव नया नहीं है, लेकिन इससे यह सवाल जरूर उठता है कि राष्ट्रभक्ति को राजनीतिक बहस से ऊपर कैसे रखा जाए। यह भी सच है कि देशभक्ति किसी आदेश या दंड के भय से नहीं, बल्कि आत्मीय भाव से जन्म लेती है। जब नागरिक स्वेच्छा से राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान करते हैं, तब वह सम्मान अधिक प्रभावशाली और स्थायी होता है। यदि किसी नियम को लागू करते समय संवाद और सहमति की प्रक्रिया कमजोर पड़ जाए, तो वह नियम सामाजिक विभाजन का कारण भी बन सकता है।

गृह मंत्रालय का यह निर्णय राष्ट्रभावना को औपचारिक स्वरूप देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसे किस संवेदनशीलता और संतुलन के साथ लागू किया जाता है। राष्ट्रप्रेम की जड़ें भावनाओं में होती हैं, और भावनाएं आदेशों से नहीं, विश्वास से मजबूत होती हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि वंदे मातरम् को केवल अनिवार्यता के दायरे में सीमित न रखा जाए, बल्कि इसे भारत की सांस्कृतिक विरासत, स्वतंत्रता संघर्ष और राष्ट्रीय एकता के प्रतीक के रूप में समझाया जाए। यदि यह गीत नई पीढ़ी के दिलों में गर्व और सम्मान का भाव पैदा करता है, तो यही इस आदेश की वास्तविक सफलता होगी। राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान देश की पहचान का हिस्सा है, लेकिन उस सम्मान की आत्मा लोकतांत्रिक मूल्यों और विविधता की स्वीकार्यता में बसती है। वंदे मातरम् की गूंज तभी सार्थक होगी, जब वह केवल समारोहों तक सीमित न रहकर नागरिकों के दिलों में स्वाभाविक रूप से बस सके।

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