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पत्नी को चाहिए था ट्रांसफर, हाई कोर्ट ने कहा- पुरुषों की परेशानियों को नजरअंदाज नहीं कर सकते; याचिका खारिज

नई दिल्ली। राजस्थान हाई कोर्ट की जोधपुर बेंच ने एक अहम मामले में फैसला सुनाया है। कोर्ट ने इस केस में पत्नी की ट्रांसफर याचिका खारिज कर दी और कहा महिलाएं पीड़ित होती हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पुरुषों की परेशानियों को नजरअंदाज कर दिया जाए।

जस्टिस रेखा बोराणा की सिंगल बेंच ने जयपुर की रहने वाली एक महिला का मामला सामने आया था। जस्टिस ने महिला की दायर की हुई ट्रांसफर अर्जी खारिज कर दी।

पुरुषों की परेशानियों को नहीं कर सकते नजरअंदाज
राजस्थान हाई कोर्ट ने कहा, समानता का मतलब दोनों पक्षों को बराबरी से देखना है। जस्टिस रेखा बोराणा ने कहा, अगर पत्नी का प्रार्थना पत्र स्वीकार होता है तो इससे पत्नी की तुलना में पति को ज्यादा परेशानी होगी।

पुरुष की तरफ से केस लड़ रहे एडवोकेट उदयशंकर आचार्य ने बताया, अदालत ने सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए संतुलित निर्णय दिया है। यह राजस्थान में अपने आप में पहला डिसीजन है, जिसमें सिविल ट्रांसफर एप्लीकेशन में पति की परेशानी को समझा गया है।

क्या है पूरा मामला?
राजस्थान हाईकोर्ट में एक महिला ने सिविल ट्रांसफर एप्लीकेशन के लिए याचिका दायर की थी। महिला का कहना है कि वह साल 2005 से अपने बच्चों के साथ जयपुर में रह रही है। अपना खर्च चलाने के लिए यहीं काम करती है।

पत्नी ने यह भी बताया कि दोनों के बीच अन्य मामले भी जयपुर में लंबित हैं, इसलिए तलाक का मामला भी जयपुर ट्रांसफर किया जाए। पति ने तलाक की अर्जी बीकानेर की फैमिली कोर्ट में दी है।

महिला के पति ने दलील दी कि वह अपने माता-पिता का इकलौता बेटा है। उसकी मां कैंसर से पीड़ित है और पूरी तरह बिस्तर पर है। पति ने बताया, उसके पिता की उम्र 80 साल से ज्यादा है। माता-पिता के इलाज और देखभाल की वजह से बार-बार जयपुर नहीं जा सकता।

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