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“निःशुल्क स्वास्थ्य शिविर नहीं, जन-जागरूकता का आंदोलन”

सीतापुर: स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में जब सरकारी संसाधन सीमित हों, ग्रामीण इलाकों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की पहुँच कम हो और आमजन दवाओं के बढ़ते खर्च से जूझ रहा हो, तब कोई भी जन-आधारित पहल केवल एक कार्यक्रम नहीं रह जाती बल्कि वह एक सामाजिक हस्तक्षेप बन जाती है। 08 फरवरी 2026 को सीतापुर जनपद के सिधौली स्थित नेशनल इंटर कॉलेज, अलादादपुर में आयोजित निःशुल्क स्वास्थ्य जाँच एवं परामर्श शिविर को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए।

ब्रह्मलीन पूज्य योगीजी की प्रेरणा और गुरुदेव ए.के. शुक्ला जी के निःस्वार्थ सेवा-संकल्प से संचालित योगीजी सेवा समिति द्वारा आयोजित यह शिविर केवल औपचारिक स्वास्थ्य परीक्षण का आयोजन नहीं था, बल्कि स्वास्थ्य के प्रति एक वैकल्पिक दृष्टि प्रस्तुत करने का प्रयास भी था। “योगीजी डिवाइन क्योर सेंटर” के तत्वावधान में आयोजित इस शिविर में सैकड़ों ग्रामीण एवं शहरी नागरिकों ने सहभागिता कर ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर और वजन की निःशुल्क जाँच कराई तथा विभिन्न रोगों पर विस्तृत परामर्श प्राप्त किया।

आज जब जीवनशैली जनित रोग।डायबिटीज, उच्च रक्तचाप, मोटापा, थायराइड, फैटी लिवर, माइग्रेन और मानसिक तनाव।तेजी से बढ़ रहे हैं, तब केवल दवा-आधारित उपचार पर्याप्त नहीं रह गए है। शिविर में अपनाई गई उपचार पद्धति।तप, सेवा, सुमिरन, प्राकृतिक चिकित्सा, योग एवं प्राणायाम तथा संतुलित जीवनशैली।स्वास्थ्य को समग्रता में देखने का संदेश देती है। यह दृष्टिकोण रोग के लक्षणों से आगे बढ़कर उसके मूल कारणों।असंतुलित आहार, अनियमित दिनचर्या, मानसिक तनाव और शारीरिक निष्क्रियता पर केंद्रित है।

योगीजी डिवाइन क्योर सेंटर के प्रमुख डॉ. कमल किशोर ने दवा-निर्भरता से उत्पन्न दुष्प्रभावों की ओर संकेत करते हुए प्राकृतिक चिकित्सा को स्थायी समाधान बताया। यह विचार विमर्श योग्य है कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और प्राकृतिक चिकित्सा के बीच संतुलन स्थापित कर ही एक टिकाऊ स्वास्थ्य मॉडल विकसित किया जा सकता है। ऐसे शिविर समाज को यह विकल्प देते हैं कि वह स्वास्थ्य को केवल अस्पताल और दवाओं के संदर्भ में न देखे, बल्कि स्वयं की जीवनशैली में परिवर्तन के रूप में भी समझे।

इस पहल का एक महत्वपूर्ण पक्ष इसका सामाजिक आयाम भी है। संजय तिवारी, डॉ. समर्पणा, संध्या मिश्रा, मुदिता शुक्ला, गीतेश मिश्रा, सोनम, संजीव रैना, अमित सक्सेना सहित अनेक सहयोगियों एवं साधकों ने जिस सेवा-भाव से दिनभर कार्य किया, वह बताता है कि सामुदायिक भागीदारी से ही स्वास्थ्य जागरूकता का विस्तार संभव है। विद्यालय प्रशासन एवं प्रधानाचार्य राजीव मिश्रा का सहयोग इस बात का उदाहरण है कि शिक्षा संस्थान केवल ज्ञान के केंद्र नहीं, बल्कि जनकल्याण के सशक्त मंच भी बन सकते हैं।

ग्रामीण भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की चुनौती केवल चिकित्सा संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि जागरूकता का अभाव भी है। यदि ऐसे शिविर नियमित रूप से आयोजित हों, तो वे निवारक स्वास्थ्य (preventive healthcare) की संस्कृति को मजबूत कर सकते हैं। नियमित जाँच, समय पर परामर्श और जीवनशैली सुधार के प्रति प्रेरणा।ये तीनों तत्व मिलकर बड़ी बीमारियों के खतरे को कम कर सकते हैं।

निस्संदेह, यह आवश्यक है कि प्राकृतिक चिकित्सा और योग-आधारित उपचार को वैज्ञानिक कसौटी पर भी परखा जाए और जहाँ आवश्यकता हो, आधुनिक चिकित्सा से समन्वय स्थापित किया जाए। किंतु समाज-आधारित, निःशुल्क और सेवा-प्रधान ऐसे प्रयासों को एक सकारात्मक पहल के रूप में स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि वे स्वास्थ्य को “अधिकार” से आगे बढ़ाकर “साझी जिम्मेदारी” में बदलने का प्रयास करते हैं।

सीतापुर के नेशनल इंटर कालेज अलादादपुर सिधौली में आयोजित यह शिविर केवल एक दिन का आयोजन नहीं, बल्कि एक विचार है।स्वास्थ्य को दान नहीं, जागरूकता और आत्मानुशासन के माध्यम से सशक्त बनाने का विचार है। यदि ऐसी पहलें निरंतरता के साथ आगे बढ़ती हैं, तो वे निश्चित रूप से समाज में रोगमुक्त, आत्मनिर्भर और स्वस्थ भारत की दिशा में सार्थक कदम सिद्ध हो सकती हैं।

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